पोलियो, गरीबी और तानों से लड़कर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचे नालंदा के पैरा पावरलिफ्टर

पटना/नालंदा: सफलता का रास्ता कभी आसान नहीं होता, लेकिन कुछ लोग अपने संघर्ष और हौसले से ऐसी मिसाल कायम कर देते हैं जो लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन जाती है। बिहार के नालंदा जिले के रहने वाले पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीतकर देश और बिहार का नाम रोशन करने वाले झंडू कुमार का जीवन संघर्ष, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प का अनूठा उदाहरण है।

आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके झंडू कुमार ने हाल ही में अपने जीवन के उन दर्दनाक पलों को साझा किया, जिन्होंने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। उन्होंने बताया कि उनका असली नाम अविनाश कुमार था, लेकिन बचपन में हुई एक घटना ने उनका नाम और पहचान हमेशा के लिए बदल दी।

पांच साल की उम्र में पोलियो ने बदल दी जिंदगी

झंडू कुमार ने बताया कि जब वह केवल पांच वर्ष के थे, तभी उन्हें पोलियो हो गया। इस बीमारी ने उनके शरीर को प्रभावित किया और सामान्य जीवन जीना उनके लिए कठिन हो गया।

उनके परिवार ने इलाज के लिए अपनी पूरी जमा-पूंजी खर्च कर दी। आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती गई और परिवार पर संकट गहराता चला गया। इलाज के बावजूद परिवार को उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिले।

उन्होंने कहा कि उस समय उनके माता-पिता ने उन्हें ठीक कराने के लिए हर संभव प्रयास किया, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण संघर्ष और बढ़ता गया।

गरीबी के बीच सुनने पड़े ताने

बीमारी के साथ-साथ परिवार को आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ा। झंडू कुमार ने बताया कि उस समय आसपास के कई लोग उनके परिवार का मजाक उड़ाते थे।

लोग कहते थे कि इस बच्चे ने अपने माता-पिता को "झंड" कर दिया है, यानी पूरी तरह आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया है। धीरे-धीरे लोग उन्हें "झंडू" कहकर बुलाने लगे।

शुरुआत में यह नाम उनके लिए पीड़ादायक था, लेकिन समय के साथ यही नाम उनकी पहचान बन गया। आज उसी नाम से देश और दुनिया उन्हें जानती है।

बदलना चाहते थे अपना नाम

झंडू कुमार ने बताया कि एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने अपना नाम बदलने का फैसला किया। उन्हें लगा कि पुराने नाम के कारण लोग उनका मजाक उड़ाते हैं और उन्हें असहज महसूस होता है।

इसी उद्देश्य से वह सरकारी दस्तावेजों में नाम बदलवाने के लिए ब्लॉक कार्यालय पहुंचे।

लेकिन वहां भी उन्हें निराशा का सामना करना पड़ा।

ब्लॉक कार्यालय का अनुभव

उन्होंने बताया कि जब ब्लॉक कार्यालय में कर्मचारियों ने उनका नाम पूछा और उन्होंने "झंडू कुमार" बताया तो वहां मौजूद कई लोग हंसने लगे।

उन्होंने कहा,

"स्टाफ ने पूछा कि नाम क्या है। जैसे ही मैंने 'झंडू' बताया, सभी हंसने लगे। उस समय मुझे बुरा नहीं लगा। मैंने सोचा कि अब यही मेरी पहचान है और फिर मैंने इसी नाम को अपना लिया।"

इस घटना के बाद उन्होंने नाम बदलने का विचार छोड़ दिया और उसी नाम के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया।

खेल को बनाया जीवन का लक्ष्य

शारीरिक चुनौतियों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद झंडू कुमार ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने पैरा पावरलिफ्टिंग को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया और कठिन परिस्थितियों में भी लगातार अभ्यास करते रहे।

संसाधनों की कमी, बेहतर प्रशिक्षण सुविधाओं का अभाव और आर्थिक समस्याओं के बावजूद उन्होंने मेहनत जारी रखी। परिवार का सहयोग और अपनी इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में पहचान बनानी शुरू की।

धीरे-धीरे उनकी प्रतिभा को पहचान मिली और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक का सफर तय किया।

कॉमनवेल्थ गेम्स में रचा इतिहास

झंडू कुमार की वर्षों की मेहनत का परिणाम तब सामने आया जब उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक जीतकर भारत और बिहार का गौरव बढ़ाया।

यह उपलब्धि केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष की जीत नहीं थी, बल्कि उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा बनी जिन्होंने कभी विपरीत परिस्थितियों में अपने सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया।

उनकी सफलता ने यह साबित कर दिया कि सीमित संसाधन और शारीरिक चुनौतियां किसी व्यक्ति की मंजिल तय नहीं करतीं, बल्कि उसका आत्मविश्वास और परिश्रम ही उसकी असली ताकत होता है।

युवाओं के लिए प्रेरणा

झंडू कुमार की कहानी आज बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुकी है।

उन्होंने कई मंचों पर युवाओं से कहा है कि कठिनाइयों से घबराने के बजाय उनका सामना करना चाहिए। जीवन में संघर्ष जितना बड़ा होगा, सफलता भी उतनी ही बड़ी होगी।

उनका मानना है कि यदि व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे तो कोई भी बाधा उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।

समाज के लिए एक संदेश

झंडू कुमार का जीवन समाज को भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसके नाम, शारीरिक स्थिति या आर्थिक परिस्थिति से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा, मेहनत और चरित्र से तय होता है।

जिस नाम का कभी मजाक उड़ाया जाता था, आज वही नाम देश के लिए सम्मान और गौरव का प्रतीक बन चुका है।

परिवार का योगदान

झंडू कुमार ने अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता और परिवार को दिया। उन्होंने कहा कि आर्थिक संकट के बावजूद उनके परिवार ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा।

उनके माता-पिता ने हर कठिन परिस्थिति में उनका हौसला बढ़ाया और उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित किया।

नालंदा के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार की कहानी संघर्ष, आत्मविश्वास और सफलता की प्रेरणादायक मिसाल है। बचपन में पोलियो, आर्थिक तंगी और समाज के तानों का सामना करने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उनका असली नाम अविनाश कुमार था, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें "झंडू कुमार" बना दिया। जिस नाम को लेकर कभी लोग उनका मजाक उड़ाते थे, आज वही नाम कॉमनवेल्थ गेम्स के कांस्य पदक विजेता के रूप में पूरे देश में सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, निरंतर मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर कोई भी व्यक्ति जीवन की सबसे कठिन बाधाओं को पार कर सफलता की नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है।