मुंगेर: हरियाली बढ़ाने के लिए पिछले 5 वर्षों में रोपे गए 20 लाख से अधिक पौधे; देखभाल के अभाव में 30 से 40 प्रतिशत पौधे सूखे, दावों की खुली पोल

मुंगेर (बिहार): बिहार के मुंगेर जिले में पर्यावरण संरक्षण और हरित आवरण को बढ़ाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं। जिले में हरियाली बढ़ाने के उद्देश्य से पिछले 5 वर्षों के दौरान विभिन्न योजनाओं के तहत 20 लाख से अधिक पौधों का वृहद पैमाने पर रोपण किया गया था। हालांकि, जमीनी हकीकत इन दावों की कलई खोलती नजर आ रही है क्योंकि पौधों के संरक्षण में गंभीर कमी और उचित देखभाल न मिलने के कारण इनमें से 30 से 40 प्रतिशत पौधे या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या नष्ट हो चुके हैं।

प्राप्त विस्तृत विवरण के अनुसार, सरकारी महकमों द्वारा पौधारोपण पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद मॉनिटरिंग के अभाव में अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। आइए जानते हैं इस स्थिति के मुख्य बिंदुओं और जमीनी सच्चाई का एक विस्तृत विश्लेषण।

5 वर्षों में 20 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य बनाम हकीकत

प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच सालों में जिले की तस्वीर बदलने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किए गए।

विशाल पौधारोपण अभियान: जिले के विभिन्न प्रखंडों, जंगलों और ग्रामीण इलाकों में पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए 20 लाख से अधिक पौधे रोपने के लक्ष्य को कागजों पर पूरा दिखाया गया।

बड़ी संख्या में पौधों का नष्ट होना: विभागीय आंकड़ों के इतर जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि सही समय पर सिंचाई, सुरक्षा (ट्री-गार्ड) और देखरेख न होने के कारण 30 से 40 प्रतिशत पौधे दम तोड़ चुके हैं।

 संरक्षण के अभाव और प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल

पौधे लगाने भर से पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य पूरा नहीं होता, बल्कि उनके बड़े होने तक उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना अनिवार्य है।

फंड की बर्बादी: जानकारों का मानना है कि यदि पौधों के रखरखाव के लिए ठोस मैकेनिज्म तैयार किया जाता, तो आज मुंगेर का हरित आवरण और अधिक समृद्ध होता।

जिलेवासियों में निराशा: पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि सिर्फ कागजी आंकड़ों पर ध्यान देने के बजाय धरातल पर पौधों की जीवन रक्षा के लिए सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि सरकारी धन का सदुपयोग हो सके।

मुंगेर जिले में हरियाली बढ़ाने के नाम पर पिछले 5 वर्षों में 20 लाख पौधे लगाने के आंकड़े भले ही बड़े हों, लेकिन 30 से 40 प्रतिशत पौधों का सूख जाना प्रशासनिक लापरवाही को स्पष्ट करता है। यदि समय रहते वन विभाग और अन्य संबंधित महकमों ने मृतप्राय व्यवस्था में सुधार नहीं किया, तो पर्यावरण को हरा-भरा बनाने का यह अभियान सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।