मुजफ्फरपुर: राज्य सूचना आयोग का BRABU पर बड़ा एक्शन; विवेक कुमार को समय पर आरटीआई के तहत सूचना नहीं देने पर जताई कड़ी नाराजगी, लापरवाही पर विश्वविद्यालय को पत्र जारी कर आर्थिक क्षति के मामले में मांगा जवाब
मुजफ्फरपुर (बिहार): बिहार के शैक्षणिक और प्रशासनिक गलियारों से इस वक्त एक बहुत ही बड़ी और अहम खबर सामने आ रही है। बिहार राज्य सूचना आयोग (State Information Commission) ने बीआरएबीयू (भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय - BRABU) की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। आयोग ने विश्वविद्यालय प्रशासन को एक कड़ा पत्र जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि आरटीआई (सूचना का अधिकार) आवेदक विवेक कुमार को समय पर मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई। इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही के कारण अभ्यर्थी विवेक कुमार को भारी मानसिक और आर्थिक क्षति (Financial Loss) उठानी पड़ी है। आयोग के इस सख्त रुख से विश्वविद्यालय प्रशासन में हड़कंप मच गया है।
पारदर्शिता और जवाबदेही के मोर्चे पर विश्वविद्यालयों की भूमिका पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आइए इस पूरे प्रकरण, राज्य सूचना आयोग की सख्ती और विश्वविद्यालय की लापरवाही के विभिन्न पहलुओं का एक विस्तृत, विश्लेषणात्मक और बिंदुवार विवरण समझते हैं।
मामला क्या है? विवेक कुमार द्वारा मांगी गई सूचना और देरी
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'सूचना का अधिकार' (RTI) नागरिकों का एक मौलिक अधिकार है, जिसके माध्यम से वे सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थानों से पारदर्शिता की मांग कर सकते हैं।
आरटीआई आवेदन: मुजफ्फरपुर स्थित बीआरएबीयू के अंतर्गत एक छात्र/अभ्यर्थी विवेक कुमार ने अपने शैक्षणिक या अन्य प्रशासनिक कार्यों से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालय में आरटीआई के तहत आवेदन दिया था।
तय समय सीमा का उल्लंघन: कानून के अनुसार, आवेदन मिलने के निर्धारित दिनों के भीतर लोक सूचना अधिकारी (PIO) को वांछিত सूचना उपलब्ध करानी होती है, लेकिन बीआरएबीयू प्रशासन द्वारा इस तय समय सीमा का पालन नहीं किया गया।
विवि का सुस्त रवैया: बार-बार अनुरोध और नियमानुसार समय बीत जाने के बावजूद जब विश्वविद्यालय ने कोई संतोषजनक जवाब या दस्तावेज नहीं दिया, तो आवेदक विवेक कुमार ने न्याय के लिए बिहार राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया।
राज्य सूचना आयोग की कड़ी नाराजगी और पत्र की मुख्य बातें
राज्य सूचना आयोग ने मामले की गंभीरता को समझते हुए इसे प्रशासनिक लापरवाही और आवेदक के अधिकारों का हनन माना है।
आयोग द्वारा पत्र जारी: राज्य सूचना आयोग ने बीआरएबीयू के कुलसचिव (Registrar) और संबंधित लोक सूचना अधिकारी को एक कड़ा पत्र लिखकर स्पष्टीकरण मांगा है।
आर्थिक और मानसिक क्षति का जिक्र: आयोग ने अपने पत्र में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि समय पर सूचना न मिलने के कारण अभ्यर्थी विवेक कुमार को अनावश्यक रूप से कोर्ट-कचहरी और आयोग के चक्कर काटने पड़े, जिससे उन्हें प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक हानि और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है।
लापरवाही पर जवाब तलब: आयोग ने विश्वविद्यालय से यह सवाल पूछा है कि क्यों न इस गंभीर लापरवाही और जनहित के अधिकार के हनन के लिए संबंधित दोषी अधिकारियों पर नियमानुसार आर्थिक जुर्माना (Penalty) लगाया जाए।
बीआरएबीयू (BRABU) की कार्यप्रणाली पर उठते गंभीर सवाल
मुजफ्फरपुर का बीआरएबीयू अक्सर किसी न किसी विवाद या प्रशासनिक सुस्ती के कारण सुर्खियों में रहता है।
पेंडिंग आरटीआई मामले: विश्वविद्यालय में आरटीआई आवेदनों के निस्तारण में लंबे समय से कोताही बरती जाती रही है। कई मामलों में महीनों और वर्षों तक छात्रों को उनके जवाब नहीं मिलते हैं।
पारदर्शिता का अभाव: सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रति संवेदनशीलता न होने के कारण छात्रों को अपने ही वैध दस्तावेजों और जानकारियों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
सजा से बचने की कोशिश: अक्सर देखा गया है कि जब आयोग की सख्ती बढ़ती है, तब विश्वविद्यालय के अधिकारी कागजी खानापूर्ति करने में जुट जाते हैं, लेकिन इस बार आयोग के कड़े रुख से अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
छात्र संगठनों और शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया
राज्य सूचना आयोग के इस कदम का शिक्षाविदों और छात्र संगठनों ने स्वागत किया है, साथ ही विश्वविद्यालय प्रशासन पर निशाना साधा है।
छात्रों के अधिकारों की जीत: छात्र नेताओं का कहना है कि आयोग का यह पत्र इस बात का प्रमाण है कि विश्वविद्यालय प्रशासन किस तरह छात्रों के भविष्य और उनके कानूनी अधिकारों के साथ खिलवाड़ कर रहा है।
क्षतिपूर्ति की मांग: विभिन्न हलकों से यह मांग उठ रही है कि विवेक कुमार को हुई आर्थिक क्षति की भरपाई लापरवाह अधिकारियों के वेतन से की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी ऐसी लापरवाही न दोहराए।
मुजफ्फरपुर के बीआरएबीयू द्वारा आरटीआई आवेदक विवेक कुमार को समय पर सूचना न देने के मामले में राज्य द्वारा उठाया गया यह कदम प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक आवश्यक और कड़ा संदेश है। सूचना का अधिकार कानून लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ है, और जब विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान इसका उल्लंघन करते हैं, तो आयोग का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। इस मामले में आयोग की सख्ती से उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में बीआरएबीयू प्रशासन अपने कामकाज में पारदर्शिता लाएगा और छात्रों के हितों के प्रति अधिक जवाबदेह बनेगा।