पूर्णिया में धान की खेती: सीमांचल के कृषि प्रधान जिले में किसानों की आजीविका का मुख्य आधार और वर्तमान चुनौतियां

पूर्णिया: बिहार के उत्तर-पूर्व हिस्से में स्थित सीमांचल का पूर्णिया जिला अपनी उपजाऊ भूमि, प्रचुर जल संसाधनों और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए पूरे राज्य में विशेष पहचान रखता है। इस कृषि प्रधान जिले में धान की खेती (Paddy Cultivation) यहाँ के लाखों किसानों की आजीविका का सबसे प्रमुख और मजबूत आधार है। खरीफ सीजन के दौरान होने वाली धान की फसल पर न केवल किसानों के परिवारों का भरण-पोषण टिका होता है, बल्कि यह पूरे जिले के ग्रामीण और शहरी व्यापारिक चक्र को भी गति प्रदान करती है।

धान की खेती: पूर्णिया की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़

पूर्णिया की भौगोलिक स्थिति और यहाँ की कोसी, महानंदा और सौरा जैसी नदियों द्वारा लाई गई उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) धान की खेती के लिए वरदान साबित होती है। जिले के अमौर, बायसी, जलालगढ़, रुपौली, धमदाहा, कसबा और बैसा समेत सभी प्रखंडों में बड़े पैमाने पर धान की खेती की जाती है।

किसानों की प्राथमिकता: जिले के अधिकांश छोटे, सीमांत और बड़े किसान धान की पारंपरिक और उन्नत किस्मों की खेती से जुड़े हुए हैं।

रोजगार का जरिया: धान की रोपाई, निराई, कटाई और मड़ाई के सीजन में हजारों कृषि मजदूरों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलता है, जिससे ग्रामीण अंचल में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।

आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं का बढ़ता प्रभाव

समय के साथ पूर्णिया के किसानों ने खेती-किसानी के पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों को भी अपनाना शुरू कर दिया है। कृषि विभाग और आत्मा (ATMA) के सहयोग से किसानों को श्री पद्धति (SRI Method) से खेती, वैज्ञानिक तरीके से नर्सरी तैयार करने और उच्च उपज वाली प्रमाणित बीजों का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

इसके अलावा, सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं जैसे खाद-बीज पर अनुदान, डीजल अनुदान और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से किसानों को काफी सहूलियत मिल रही है। हालांकि, आज भी जिले के कई दूर-दराज के इलाकों में किसान पारंपरिक मानसूनी बारिश पर ही पूरी तरह निर्भर हैं।

इस सीजन की चुनौतियां: बारिश की बेरुखी और सिंचाई की समस्या

धान की फसल के शुरुआती दौर में यानी जुलाई के इस महीने में पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। पूर्णिया और आसपास के इलाकों में कभी मानसून की सक्रियता अच्छी रहती है, तो कभी बीच में अचानक लंबी खेंच (Dry Spell) देखने को मिल जाती है।

उमस और पानी की कमी: हाल के दिनों में तेज धूप और उमस बढ़ने के कारण खेतों में नमी तेजी से कम हुई है, जिससे धान की रोपाई के कार्य में लगे किसानों की चिंताएं बढ़ गई हैं।

नहरी और नलकूप व्यवस्था: जिन क्षेत्रों में सरकारी नहरी सिंचाई या बोरवेल (Tubewell) की सुविधा नहीं है, वहाँ के किसानों को महंगे डीजल के सहारे निजी पंपसेट चलाकर अपने खेतों की सिंचाई करनी पड़ रही है, जिससे उनकी लागत काफी बढ़ जाती है।

भविष्य की उम्मीदें और कृषि विशेषज्ञों की सलाह

कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले हफ्तों में मानसूनी हवाएं पूरी तरह सक्रिय रहती हैं और समय पर पर्याप्त बारिश मिलती है, तो पूर्णिया में धान की बंपर पैदावार होने की पूरी उम्मीद है।

विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि वे मौसम के मिजाज को देखते हुए जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान दें और धान की ऐसी किस्मों का चयन करें जो कम पानी में भी बेहतर पैदावार दे सकें। धान की यह फसल न केवल पूर्णिया के किसानों के घरों में समृद्धि लाती है, बल्कि राज्य और देश के खाद्य सुरक्षा भंडारों में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है।