तीर्थ स्थल, हाट-बाजार, मेला और बूचड़खाने तक से होगी वसूली, पंचायतों की आय बढ़ाने की तैयारी
पटना: बिहार की ग्राम पंचायतों को आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में राज्य सरकार एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। अब पंचायतें अपने क्षेत्र में विभिन्न सेवाओं, संस्थानों और व्यावसायिक गतिविधियों पर टैक्स एवं शुल्क वसूल सकेंगी। इसके लिए पंचायतों को अलग-अलग श्रेणियों में कर लगाने का अधिकार दिया जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत एक रुपये से लेकर पांच हजार रुपये तक टैक्स और शुल्क निर्धारित किए जाएंगे।
नई व्यवस्था लागू होने के बाद पंचायत क्षेत्र में स्थित तीर्थ स्थल, हाट-बाजार, मेले, पशु बूचड़खाने, व्यावसायिक प्रतिष्ठान, दुकानों और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं पर निर्धारित शुल्क लिया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे पंचायतों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और स्थानीय विकास कार्यों के लिए उन्हें अतिरिक्त वित्तीय संसाधन मिलेंगे।
पंचायतों को मिलेगा अतिरिक्त राजस्व
वर्तमान समय में अधिकांश ग्राम पंचायतें राज्य और केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान पर निर्भर रहती हैं। अपने स्तर पर पंचायतों की आय बहुत सीमित होती है। ऐसे में कई विकास योजनाएं केवल सरकारी अनुदान मिलने पर ही पूरी हो पाती हैं।
नई कर व्यवस्था लागू होने के बाद पंचायतें अपने क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों और सुविधाओं से नियमित आय अर्जित कर सकेंगी। इस राशि का उपयोग सड़क, नाली, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, सफाई व्यवस्था, सामुदायिक भवन, पार्क और अन्य स्थानीय विकास कार्यों पर किया जा सकेगा।
किन-किन स्थानों पर लगेगा टैक्स
प्रस्तावित नियमों के अनुसार पंचायतें अपने क्षेत्र में निम्नलिखित स्थानों एवं गतिविधियों पर शुल्क या टैक्स लगा सकेंगी—
- तीर्थ स्थल एवं धार्मिक आयोजन स्थल
- हाट एवं साप्ताहिक बाजार
- वार्षिक एवं मौसमी मेले
- पशु बाजार
- पशु बूचड़खाना
- व्यावसायिक दुकानें
- गोदाम एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठान
- सार्वजनिक उपयोग की अन्य सुविधाएं
- व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े विभिन्न लाइसेंस
हालांकि प्रत्येक श्रेणी के लिए अलग-अलग शुल्क निर्धारित किया जाएगा। यह शुल्क गतिविधि की प्रकृति और आकार के अनुसार तय होगा।
एक रुपये से पांच हजार रुपये तक होगा शुल्क
सरकार द्वारा तैयार किए जा रहे प्रारूप के अनुसार विभिन्न सेवाओं एवं गतिविधियों पर एक रुपये से लेकर पांच हजार रुपये तक टैक्स या शुल्क निर्धारित किया जा सकता है।
छोटे व्यवसायों एवं ग्रामीण गतिविधियों पर न्यूनतम शुल्क रखा जाएगा, जबकि बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, बड़े आयोजनों या अधिक आय वाले संस्थानों पर अपेक्षाकृत अधिक शुल्क लगाया जा सकेगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य छोटे दुकानदारों या गरीब ग्रामीणों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना नहीं बल्कि पंचायतों के लिए संतुलित आय का स्रोत तैयार करना है।
तीर्थ स्थलों पर भी लागू होगी व्यवस्था
यदि किसी पंचायत क्षेत्र में धार्मिक स्थल, मंदिर, मठ या अन्य तीर्थ स्थल हैं, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं, तो वहां उपलब्ध सुविधाओं के रखरखाव और सफाई व्यवस्था के लिए भी पंचायत निर्धारित शुल्क वसूल सकेगी।
इससे तीर्थ स्थलों पर पेयजल, शौचालय, सफाई, प्रकाश व्यवस्था और अन्य नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाया जा सकेगा।
हाट और मेलों के लिए अलग शुल्क
ग्रामीण क्षेत्रों में लगने वाले साप्ताहिक हाट और वार्षिक मेलों से बड़ी संख्या में व्यापारी और आम लोग जुड़े रहते हैं। अब इन आयोजनों के लिए भी पंचायतें निर्धारित शुल्क ले सकेंगी।
इस राशि का उपयोग हाट परिसर की सफाई, सुरक्षा, पेयजल, पार्किंग, शौचालय और अन्य आवश्यक सुविधाओं के विकास में किया जाएगा।
पशु बाजार और बूचड़खानों पर भी शुल्क
पशु व्यापार और बूचड़खानों से जुड़ी गतिविधियों पर भी पंचायतें शुल्क वसूल सकेंगी। इससे इन स्थानों पर स्वच्छता, स्वास्थ्य संबंधी मानकों और बुनियादी सुविधाओं में सुधार किया जा सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह राशि सही तरीके से खर्च की जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
पंचायतों की वित्तीय स्थिति होगी मजबूत
राज्य सरकार का उद्देश्य पंचायतों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है ताकि वे केवल सरकारी अनुदान पर निर्भर न रहें।
स्वयं की आय बढ़ने पर पंचायतें स्थानीय जरूरतों के अनुसार त्वरित निर्णय लेकर विकास कार्य करा सकेंगी। इससे छोटे-छोटे कार्यों के लिए उच्च स्तर से स्वीकृति का इंतजार भी कम करना पड़ेगा।
पारदर्शिता पर रहेगा विशेष जोर
नई व्यवस्था में टैक्स संग्रह और उसके उपयोग की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रखने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। पंचायतों को प्राप्त होने वाली राशि का लेखा-जोखा सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा।
इसके अलावा पंचायत प्रतिनिधियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वसूली गई राशि का उपयोग केवल सार्वजनिक हित और विकास कार्यों में ही किया जाए।
ग्रामीणों और व्यापारियों की क्या होगी जिम्मेदारी
नई व्यवस्था लागू होने के बाद पंचायत क्षेत्र में व्यापार करने वाले व्यवसायियों और संबंधित गतिविधियों से जुड़े लोगों को निर्धारित शुल्क का भुगतान करना होगा।
हालांकि सरकार इस बात का भी ध्यान रखेगी कि कर की दरें संतुलित रहें और छोटे व्यापारियों या गरीब परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े।
विकास कार्यों को मिलेगी नई गति
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पंचायतों की आय बढ़ती है तो गांवों में विकास योजनाओं को तेजी मिलेगी। पंचायतें स्थानीय स्तर पर सड़क मरम्मत, जल निकासी, स्वच्छता, स्ट्रीट लाइट, सामुदायिक भवन, खेल मैदान, सार्वजनिक शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाओं के निर्माण पर अधिक खर्च कर सकेंगी।
इसके अलावा प्राकृतिक आपदा या आपात स्थिति में भी पंचायतों के पास तत्काल खर्च करने के लिए अपना वित्तीय संसाधन उपलब्ध रहेगा।
सरकार का उद्देश्य
राज्य सरकार का कहना है कि पंचायतों को मजबूत बनाना ग्रामीण विकास की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है। पंचायतों के पास यदि स्वयं का पर्याप्त राजस्व होगा तो वे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार योजनाओं को तेजी से लागू कर सकेंगी।
नई कर व्यवस्था का उद्देश्य केवल राजस्व बढ़ाना नहीं बल्कि ग्राम पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, जवाबदेह और विकासोन्मुख बनाना है। यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो आने वाले वर्षों में बिहार की पंचायतों की वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल सकता है।