जमीन के नीचे भारी पत्थरों के चलते थर्मल पावर और औद्योगिक परियोजनाओं की पाइलिंग कार्य अटका, ऊर्जा एजेंसी ने जताई चिंता

भागलपुर: बिहार के सिल्क सिटी भागलपुर और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में आधारभूत संरचनाओं (Infrastructure) और ऊर्जा परियोजनाओं के विकास कार्यों के सामने एक अजीबोगरीब और गंभीर तकनीकी संकट खड़ा हो गया है। हाल ही में सामने आई जमीनी रिपोर्ट के अनुसार, कई प्रमुख विकास परियोजनाओं और ऊर्जा संयंत्रों (Power Projects) के निर्माण स्थलों पर जमीन के नीचे विशाल चट्टानों और कठोर पत्थरों की मौजूदगी के कारण भारी-भरकम पाइलिंग (Piling) का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। स्थिति यह है कि आधुनिक मशीनों और रिग्स (Rigs) के जरिए भी इन चट्टानों को भेद पाना मुश्किल हो रहा है, जिससे ऊर्जा और निर्माण एजेंसियों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।

क्या है पूरा मामला? पाइलिंग में आ रही तकनीकी अड़चनें

किसी भी बड़े औद्योगिक संयंत्र, थर्मल पावर यूनिट, चिमनी या मल्टी-स्टोरी संरचना की नींव को मजबूत बनाने के लिए जमीन में गहरी पाइलिंग करनी पड़ती है। इसके तहत कंक्रीट और स्टील के मजबूत खंभों को धरती के भीतर कई फीट गहराई तक धंसाया जाता है ताकि भारी-भरकम ढांचे का वजन संभाला जा सके।

कड़े पत्थरों की चट्टानी परत: भागलपुर क्षेत्र के विशिष्ट भू-गर्भीय (Geological) स्वरूप के कारण कुछ विशेष निर्माण स्थलों पर मिट्टी के नीचे अचानक बहुत मजबूत और मोटी पथरीली परतें (Bedrock/Boulders) मिल रही हैं।

मशीनों का फेल होना: सामान्य पाइलिंग रिग्स और बोरिंग मशीनें इन कठोर चट्टानों को काटने में असमर्थ साबित हो रही हैं। कई स्थानों पर ड्रिलिंग बिट्स (Drilling Bits) टूटने की घटनाएं भी सामने आई हैं, जिसके कारण काम की गति लगभग ठप पड़ गई है।

ऊर्जा एजेंसी और निर्माण कंपनियों की बढ़ी परेशानी

इस भू-तकनीकी समस्या (Geotechnical Issue) के सामने आने के बाद परियोजना की देखरेख कर रही प्रमुख ऊर्जा एजेंसियों और निर्माण कंपनियों के इंजीनियरों की नींद उड़ गई है। समय पर प्रोजेक्ट पूरा न होने का दबाव और लगातार बढ़ते खर्च ने एजेंसियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

समय सीमा पर असर: यदि पाइलिंग का कार्य समय पर पूरा नहीं हुआ, तो पूरी परियोजना की डेडलाइन (Deadline) आगे खिसक जाएगी, जिससे सरकार और जनता को मिलने वाले लाभ में देरी होगी।

लागत में भारी वृद्धि: इन कठोर पत्थरों को तोड़ने के लिए विशेष प्रकार की हाई-ड्रिलिंग मशीनों, अत्याधुनिक जैम्बो रिग्स और ब्लास्टिंग या अत्याधुनिक कटिंग टूल्स की आवश्यकता पड़ रही है, जिससे निर्माण लागत (Project Cost) काफी अधिक बढ़ रही है।

विशेषज्ञों की राय और समाधान की तलाश

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए ऊर्जा एजेंसी ने देश के नामी भू-विज्ञानी (Geologists) और फाउंडेशन इंजीनियरिंग विशेषज्ञों की एक विशेष टीम को मौके पर बुलाया है। टीम द्वारा साइट का जियो-फिजिकल सर्वे (Geophysical Survey) कराया जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि जमीन के किस हिस्से में कितनी गहराई तक ये पत्थर फैले हुए हैं।

वैकल्पिक तकनीक का इस्तेमाल: विशेषज्ञों का सुझाव है कि जहां बोरिंग संभव नहीं है, वहां पर 'ड्रिफ्ट बोरिंग' या हाइड्रोलिक ब्रेकर तकनीक का उपयोग किया जाए ताकि चट्टानों को काटकर नींव का रास्ता साफ किया जा सके।

प्रशासनिक और तकनीकी तालमेल: ऊर्जा एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थानीय प्रशासन और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ उच्च स्तरीय बैठकें शुरू कर दी हैं, ताकि जल्द से जल्द इस अड़चन को दूर करके निर्माण कार्य को पटरी पर लाया जा सके।

औद्योगिक विकास पर संभावित प्रभाव

भागलपुर जैसे उभरते औद्योगिक और ऊर्जा क्षेत्र में इस प्रकार की तकनीकी बाधाएं विकास की रफ्तार को धीमा कर सकती हैं। हालांकि, ऊर्जा एजेंसी और निर्माण कंपनियों ने यह स्पष्ट किया है कि वे इस चुनौती से पार पाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और जल्द ही आधुनिक विकल्पों के जरिए पाइलिंग के काम में तेजी लाई जाएगी, ताकि प्रोजेक्ट समय सीमा के भीतर सुरक्षित ढंग से पूरे किए जा सकें।