सुल्तानगंज के सरस्वती विद्या मंदिर ने निकाली भव्य कांवर यात्रा झांकी; शिव-पार्वती के स्वरूप में सजे नन्हें बच्चों ने मोहा मन, 'बम-बम भोले' के जयकारों से गूंजा पूरा शहर

सुल्तानगंज/भागलपुर (विशेष संवाददाता): देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम जाने वाले कांवरियों और शिव भक्तों की आस्था के सैलाब से सराबोर सुल्तानगंज की पावन नगरी इन दिनों पूरी तरह से शिवमय हो चुकी है। विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले (Shravani Mela) के इस पावन अवसर पर शहर के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान सरस्वती विद्या मंदिर की ओर से एक बेहद आकर्षक, भव्य और प्रेरणादायी कांवर यात्रा झांकी निकाली गई। विद्यालय के छात्र-छात्राओं और आचार्यों के संयुक्त प्रयासों से निकाली गई इस झांकी ने पूरे मेला क्षेत्र में चार चांद लगा दिए। विद्यालय परिसर से प्रारंभ होकर मिर्जागांव मार्ग से गुजरने वाली इस यात्रा में नन्हें-मुन्नों बच्चों द्वारा भगवान शिव और माता पार्वती का जीवंत रूप धारण करना आकर्षण का मुख्य केंद्र रहा। इस दौरान समूचा सुल्तानगंज क्षेत्र 'हर-हर महादेव' और 'बम-बम भोले' के जयकारों से गूंज उठा।

श्रावणी मेला और सुल्तानगंज की पौराणिक महत्ता

श्रावणी मेले के दौरान उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर बसे सुल्तानगंज का महत्व किसी से छिपा नहीं है:

अजगैबीनाथ धाम की भूमि: उत्तर वाहिनी गंगा से जल भरकर लाखों-करोड़ों श्रद्धालु देवघर के लिए अपनी कांवर यात्रा की शुरुआत यहीं से करते हैं।

सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन: इस दौरान पूरा शहर आध्यात्मिकता के रंग में रंग जाता है। ऐसे में स्थानीय विद्यालयों द्वारा इस प्रकार के धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए बच्चों को अपनी प्राचीन संस्कृति, परंपरा और सनातन मूल्यों से जोड़ने का अनूठा प्रयास किया जाता है।

सरस्वती विद्या मंदिर की झांकी: भक्ति और कला का अनूठा संगम

सरस्वती विद्या मंदिर द्वारा निकाली गई इस कांवर यात्रा झांकी की भव्यता देखते ही बनती थी। विद्यालय के प्रांगण से जब यह यात्रा शुरू हुई, तो पूरा वातावरण भक्तिरस से ओत-प्रोत हो गया:

शिव और पार्वती के जीवंत स्वरूप: विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने पौराणिक कथाओं के अनुरूप भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय और गणेश जी का मनमोहक रूप धारण किया था। छोटे-छोटे बच्चों के चेहरे पर साक्षात भोलेनाथ का तेज और मासूमियत देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो गया।

कांवर सजावट और डीजे की धुन: बच्चों ने अपने कंधों पर छोटे-छोटे सुंदर कांवर उठा रखे थे। ढोल-नगाड़ों की थाप और शिव भजनों की गूंज के साथ जब यह झांकी आगे बढ़ी, तो सड़क के दोनों ओर खड़े श्रद्धालुओं ने हाथ जोड़कर इसका स्वागत किया।

विद्यालय परिसर से मिर्जागांव तक निकला उत्साह का कारवां

यह भव्य झांकी निर्धारित मार्ग से होते हुए आगे बढ़ी:

मार्ग का रूट: विद्यालय परिसर से निकलकर यह कांवर यात्रा मिर्जागांव और आसपास के प्रमुख मार्गों से गुजरी। मार्ग में जगह-जगह स्थानीय दुकानदारों और नागरिकों ने पुष्प वर्षा कर बच्चों का स्वागत किया।

अनुशासन और सहभागिता: विद्यालय के प्रधानाध्यापक, शिक्षकों और आचार्यों की देखरेख में बच्चे अत्यंत अनुशासित ढंग से कतारबद्ध होकर चल रहे थे। बच्चों का यह उत्साह इस बात का प्रमाण था कि उन्हें अपनी संस्कृति और पर्वों से कितना लगाव है।

आयोजन के पीछे की सोच: संस्कार और राष्ट्रीय चेतना

सरस्वती विद्या मंदिर प्रबंधन का मानना है कि इस तरह के आयोजन केवल धार्मिक उत्सव नहीं हैं, बल्कि ये बच्चों में चरित्र निर्माण और सामाजिक समरसता की नींव रखते हैं:

बाल मन पर संस्कारों की छाप: जब बच्चे खुद भगवान शिव और देवी-देवताओं का रूप धरते हैं, तो उनके भीतर त्याग, तपस्या, सेवा और समर्पण जैसे गुण स्वतः विकसित होते हैं।

सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण: आज की आधुनिक पीढ़ी को अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं से जोड़े रखने के लिए ऐसे आयोजनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों की प्रतिक्रिया

सुल्तानगंज आने वाले दूर-दराज के कांवड़ियों और स्थानीय निवासियों ने सरस्वती विद्या मंदिर के इस प्रयास की मुक्तकंठ से प्रशंसा की:

"अलौकिक दृश्य": कांवरियों ने कहा कि उन्होंने रास्ते में कई झांकियां देखीं, लेकिन स्कूली बच्चों द्वारा निकाली गई यह अनुशासित और भव्य झांकी उनके लिए सबसे खास और यादगार अनुभव रही।

अभिभावकों में गर्व की भावना: बच्चों के अभिभावकों ने कहा कि उन्हें इस बात का गर्व है कि उनका विद्यालय शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को धार्मिक और सांस्कृतिक संस्कारों से भी ओत-प्रोत कर रहा है।

सुल्तानगंज में श्रावणी मेले के दौरान सरस्वती विद्या मंदिर द्वारा निकाली गई यह कांवर यात्रा झांकी और बच्चों द्वारा शिव-पार्वती का स्वरूप धारण करना इस बात का प्रतीक है कि हमारी संस्कृति की जड़ें आज भी कितनी मजबूत और जीवंत हैं। विद्यालय परिसर से मिर्जागांव तक गूंजे 'बम-बम भोले' के नारों ने सुल्तानगंज की पावन धरा को और अधिक पवित्र बना दिया। यह आयोजन आने वाले समय में बच्चों के मन में धर्म, संस्कृति और सेवा भाव का जो दीप प्रज्वलित करेगा, वह निश्चित रूप से सराहनीय और वंदनीय है।