नवगछिया से सुल्तानगंज तक विकास कार्यों की 'सुस्त रफ्तार', जोनल स्तर पर फंड निकासी के बावजूद धरातल पर काम अधूरा
भागलपुर: सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और उनके धरातल पर क्रियान्वयन के बीच की खाई कितनी गहरी है, इसकी बानगी भागलपुर जिले के प्रमुख अनुमंडलों में देखने को मिल रही है। 'हिन्दुस्तान' की विशेष पड़ताल में यह खुलासा हुआ है कि नवगछिया, सबौर, कहलगांव और सुल्तानगंज में कई महत्वपूर्ण विकास परियोजनाएं लंबे समय से अधूरी पड़ी हैं। हैरत की बात यह है कि इन योजनाओं के लिए जोनल स्तर पर फंड की निकासी हो चुकी है, लेकिन निर्माण कार्यों की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है।
फंड का बंदरबांट या विभागीय उदासीनता?
सरकारी फाइलों में इन क्षेत्रों का विकास तेज गति से हो रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां करती है। पड़ताल में सामने आया है कि कई बुनियादी ढांचागत परियोजनाएं, जिनमें सड़कें, सामुदायिक भवन और जल निकासी प्रणालियां शामिल हैं, अपने निर्धारित समय से महीनों और कहीं-कहीं सालों पीछे चल रही हैं। जोनल स्तर पर बड़ी धनराशि का आवंटन और निकासी होने के बावजूद, काम की गुणवत्ता और गति पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो गए हैं।
क्षेत्रवार पड़ताल की स्थिति
1. नवगछिया: सड़क और नाले का जाल, पर पानी की निकासी गायब
नवगछिया अनुमंडल में कई सड़कों का निर्माण कार्य आधा-अधूरा छोड़ दिया गया है। मुख्य बाजार क्षेत्र में नाला निर्माण के लिए आवंटित राशि का उपयोग तो हुआ, लेकिन नाले का अंत कहाँ होगा, यह आज तक तय नहीं है। नतीजा यह है कि हल्की बारिश में भी मुख्य सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ठेकेदारों और विभागीय मिलीभगत के कारण भुगतान तो समय पर हो जाता है, लेकिन काम अधूरा रह जाता है।
2. सबौर: कृषि विश्वविद्यालय के आसपास विकास की धीमी गति
सबौर क्षेत्र, जो कृषि शिक्षा का केंद्र माना जाता है, वहां भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। ब्लॉक कार्यालय के समीप संपर्क पथों की जर्जर स्थिति इसका प्रमाण है। जोनल फंड से इन सड़कों के लिए राशि जारी की गई थी, लेकिन पैचवर्क के नाम पर खानापूर्ति कर दी गई। यहां के निवासियों का कहना है कि प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति में व्यस्त है, जबकि जनता धूल और कीचड़ भरी सड़कों पर चलने को मजबूर है।
3. कहलगांव: तटवर्ती विकास की परियोजनाएं ठंडे बस्ते में
कहलगांव में एन.टी.पी.सी. और सरकारी सहयोग से शुरू की गई कई पर्यटन और तटवर्ती विकास की योजनाएं दम तोड़ रही हैं। गंगा घाट के सौंदर्यीकरण के लिए जोनल स्तर से फंड निकला, पर निर्माण कार्य बीच में ही छोड़ दिया गया। ईंट-पत्थर आज भी घाटों पर बिखरे पड़े हैं, जो प्रशासन की विफलता की कहानी कह रहे हैं।
4. सुल्तानगंज: श्रावणी मेला की तैयारी बनाम अधूरा काम
श्रावणी मेला के नजदीक आते ही सुल्तानगंज में विकास की धमक सुनाई देने लगती है। कांवड़ यात्रा के मार्ग पर कई स्थानों पर स्ट्रीट लाइट और सड़क चौड़ीकरण का काम जोनल फंड से प्रस्तावित था। पड़ताल में पाया गया कि कई स्थानों पर सिर्फ पोल लगा दिए गए हैं, जिनमें तार का कनेक्शन ही नहीं है। श्रद्धालुओं के लिए बने कई विश्राम स्थल अभी भी निर्माणाधीन हैं, जबकि फंड का एक बड़ा हिस्सा पहले ही निकाला जा चुका है।
जवाबदेही पर मौन
जब 'हिन्दुस्तान' की टीम ने संबंधित विभागीय कार्यालयों में इस मुद्दे पर जानकारी मांगी, तो अधिकांश अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी मढ़ते नजर आए। जोनल स्तर पर फंड निकासी की पुष्टि तो हो रही है, लेकिन कार्य प्रगति रिपोर्ट (Progress Report) में गोलमोल जवाब दिए जा रहे हैं।
ठेकेदारों की मनमानी: कई स्थानों पर ठेकेदारों को काम पूरा करने का अल्टीमेटम दिया गया है, लेकिन इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
प्रशासनिक ढिलाई: मॉनिटरिंग सेल की निष्क्रियता के कारण काम की गुणवत्ता की जांच नहीं हो पा रही है।
जनता का आक्रोश और भविष्य की राह
इन क्षेत्रों के आम नागरिकों में भारी आक्रोश है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब सरकार पैसा दे रही है, तो विकास क्यों नहीं दिख रहा? उन्होंने मांग की है कि एक उच्चस्तरीय जांच कमेटी बनाई जाए जो जोनल स्तर से हुए खर्च का ऑडिट करे और जो भी दोषी हो, उस पर कार्रवाई हो।
विकास की ये अधूरी इमारतें और सड़कें केवल ईंट-पत्थर नहीं हैं, बल्कि ये उन करोड़ों रुपयों का प्रतीक हैं जो जनता की गाढ़ी कमाई से टैक्स के रूप में दिए गए थे। नवगछिया, सबौर, कहलगांव और सुल्तानगंज की यह स्थिति प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाती है। यदि समय रहते इन कार्यों को पूरा नहीं किया गया, तो यह सरकारी खजाने की बर्बादी तो होगी ही, साथ ही इन क्षेत्रों के विकास का सपना भी अधूरा ही रह जाएगा।
प्रशासन को अब 'देर आए, दुरुस्त आए' की तर्ज पर काम करना होगा, अन्यथा आने वाले समय में यह मुद्दा एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।