बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर की अनूठी पहल हानिकारक गाजर घास के खात्मा के लिए युद्धस्तर पर जागरूकता अभियान, 20 से 22 अगस्त तक होगा विशेष मंथन
भागलपुर: कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में देश भर में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर पर्यावरण संरक्षण और किसानों की हितरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर नजर आ रहा है। यूनिवर्सिटी परिसर और आसपास के ग्रामीण अंचलों में तेजी से फैल रही खतरनाक और आक्रामक खरपतवार 'गाजर घास' (Parthenium hysterophorus) के संपूर्ण उन्मूलन के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा एक व्यापक जागरूकता अभियान का शुभारंभ किया गया है। विभिन्न शैक्षणिक और व्यावहारिक कार्यक्रमों के माध्यम से इस जहरीली घास के दुष्प्रभावों के प्रति आम जनता, किसानों और विद्यार्थियों को जागरूक किया जा रहा है। इसी कड़ी में 20 से 22 अगस्त के बीच एक विशेष तीन दिवसीय अभियान का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें वैज्ञानिक विधियों और विमर्श के जरिए इसके खात्मे की पुख्ता रणनीति पर चर्चा होगी।
क्या है गाजर घास और क्यों है यह जानलेवा?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, गाजर घास पर्यावरण और जीव-जंतुओं के लिए एक धीमा जहर साबित हो रही है:
स्वास्थ्य और त्वचा पर दुष्प्रभाव: गाजर घास के संपर्क में आने से मनुष्यों में गंभीर त्वचा रोग (डर्मेटाइटिस), एलर्जी, श्वास संबंधी बीमारियां (अस्थमा) और आंखों में जलन जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
फसलों की पैदावार में भारी गिरावट: यह घास मिट्टी की उर्वरता को तेजी से चूसती है और फसलों के पोषण तत्वों को रोक लेती है, जिससे कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पशुधन के लिए खतरा: यदि मवेशी अनजाने में इस घास का सेवन कर लें, तो उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और दूध उत्पादन में भी गिरावट दर्ज की जाती है। यही कारण है कि बीएयू सबौर ने इसके उन्मूलन को एक बड़े सामाजिक और पर्यावरणीय अभियान के रूप में लिया है।
20 से 22 अगस्त तक आयोजित होने वाले विशेष कार्यक्रमों की रूपरेखा
तीन दिनों तक चलने वाले इस विशेष अभियान के दौरान कई अकादमिक और व्यावहारिक सत्र आयोजित किए जा रहे हैं:
वैज्ञानिक संवाद और विचार-विमर्श: 20 अगस्त से शुरू हुए इस महाअभियान के तहत कृषि वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और छात्रों के बीच विशेष संगोष्ठी (Seminars) का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें गाजर घास के जैविक और रासायनिक नियंत्रण पर मंथन हो रहा है।
छात्रों को वैज्ञानिक विधियों का प्रशिक्षण: विश्वविद्यालय के कृषि छात्रों को क्षेत्रवार जाकर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि कैसे बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए सुरक्षित तरीकों (जैसे उचित रसायनों का छिड़काव या जैविक नियंत्रण एजेंटों का प्रयोग) से इस खरपतवार को नष्ट किया जाए।
नुक्कड़ नाटक और जागरूकता रैलियां: छात्रों और स्वयंसेवकों द्वारा विभिन्न टोलियों में गांवों का दौरा कर नुक्कड़ नाटकों और नारों के माध्यम से किसानों को जागरूक किया जा रहा है ताकि वे अपने खेतों के आसपास इसे उगने न दें।
कुलपति और कृषि वैज्ञानिकों का संदेश
विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारियों का मानना है कि जनभागीदारी के बिना इस खरपतवार का खात्मा संभव नहीं है:
सामूहिक प्रयास की जरूरत: बीएयू के विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा है कि गाजर घास बहुत तेजी से अपनी वंशवृद्धि करती है, इसलिए फूल आने से पहले ही इसे उखाड़कर नष्ट करना बेहद जरूरी है।
किसानों को सलाह: किसानों को यह तकनीकी सलाह दी जा रही है कि वे निराई-गुड़ाई के समय दस्ताने और मास्क का उपयोग करें और इस घास को कंपोस्ट खाद में मिलाने से बचें।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर द्वारा 20 से 22 अगस्त के बीच चलाया जा रहा यह गाजर घास उन्मूलन अभियान केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा के लिए उठाया गया एक दूरदर्शी कदम है। छात्रों को वैज्ञानिक विधियों से प्रशिक्षित करने और समाज में अलख जगाने का यह प्रयास निस्संदेह सिल्क सिटी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को इस पर्यावरणीय संकट से मुक्ति दिलाने में मील का पत्थर साबित होगा।