दहशत में जीने को मजबूर ग्रामीण घर-बार छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन को विवश, मुखिया ने स्थिति का जायजा लेकर प्रशासन से लगाई गुहार
बिहार के सीमांचल और कोसी क्षेत्र में नदियाँ जहाँ एक तरफ जीवनदायिनी मानी जाती हैं, वहीं मानसून के दिनों में इनका रौद्र रूप स्थानीय लोगों के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं साबित होता। पूर्णिया और उसके आसपास के इलाकों से अक्सर नदियों के कटाव की खबरें सामने आती रहती हैं, लेकिन इस बार पूर्णिया जिले के पीपरा गांव के वार्ड संख्या 11 और 12 में कोसी नदी (Kosi River) द्वारा मचाया गया तांडव गंभीर चिंता का विषय बन गया है। इन दोनों वार्डों में कोसी नदी का कटाव इतनी तेज गति से शुरू हो गया है कि पल-पल जमीन का बड़ा हिस्सा नदी में समाता जा रहा है।
नदी के इस भयानक रूप को देखकर स्थानीय ग्रामीणों में भारी दहशत और अफरातफरी का माहौल कायम हो गया है। कई गरीब परिवार जिनके सिर से छत छिन चुकी है या जिनके घरों पर कटाव का सीधा खतरा मंडरा रहा है, वे अपने आशियानों को खुद उजाड़कर या सामान समेटकर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करने को मजबूर हो चुके हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पंचायत के मुखिया मौके पर पहुँचे, उन्होंने पीड़ित ग्रामीणों की दर्दनाक दास्तां सुनी और जिला प्रशासन से तत्काल राहत एवं बचाव कार्य शुरू करने की गुहार लगाई है। आइए पीपरा गांव में मची इस तबाही, कोसी नदी के कटाव के विकराल रूप, ग्रामीणों की पीड़ा और प्रशासनिक मोर्चे पर उठाये जाने वाले कदमों का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
भौगोलिक पृष्ठभूमि: कोसी का क्रूर कहर और पीपरा गांव की स्थिति
कोसी नदी को सदियों से 'बिहार का शोक' कहा जाता रहा है, क्योंकि यह नदी अपनी धारा बदलने और भारी तबाही मचाने के लिए कुख्यात है।
वार्ड संख्या 11 और 12 पर मंडराता खतरा: पीपरा गांव के ये दोनों वार्ड इस समय नदी के मुहाने पर खड़े नजर आ रहे हैं। कोसी की उफनती धारा सीधे तौर पर इन इलाकों की बस्तियों को अपनी आगोश में लेने के लिए आगे बढ़ रही है।
दिन-रात कट रही जमीन: ग्रामीणों के अनुसार, कटाव इतनी तेजी से हो रहा है कि देखते ही देखते उपजाऊ खेत, रास्ते और आशियाने नदी के पेट में समाते जा रहे हैं। हर गुजरते घंटे के साथ ग्रामीणों की धड़कनें बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि अगली रात उनका घर सलामत रहेगा या नहीं।
ग्रामीणों की दर्दनाक दास्तां: घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन
कटाव की इस विभीषिका ने दर्जनों परिवारों को बेघर कर दिया है, जिससे मानवीय संकट खड़ा हो गया है।
मजबूरी में आशियाना उजाड़ रहे लोग: जिन परिवारों के घर नदी के बिल्कुल करीब पहुँच चुके हैं, उन्होंने अपने हाथों से अपने घरों के टीन-टप्पर, दरवाजे और खिड़कियाँ निकालनी शुरू कर दी हैं। वे अपने सामान को बैलगाड़ियों, ट्रैक्टरों या सिर पर लादकर ऊंचे बांधों या रिश्तेदारों के यहाँ शरण लेने जा रहे हैं।
बच्चों और बुजुर्गों की फिक्र: इस विकट परिस्थिति में सबसे बुरा हाल छोटे बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों का है। खुले आसमान के नीचे शरण लेने को मजबूर इन परिवारों के सामने खाने-पीने और रहने की भारी समस्या उत्पन्न हो गई है। रोजगार का साधन छिन जाने के कारण उनके सामने जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है।
पंचायत के मुखिया की पहल और प्रशासन से गुहार
ऐसी आपदा की घड़ी में स्थानीय जनप्रतिधियों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। पीपरा गांव की इस दुखद स्थिति की सूचना मिलते ही पंचायत के मुखिया मौके पर पहुँचे।
पीड़ितों से मुलाकात और ढांढस: मुखिया ने वार्ड संख्या 11 और 12 का दौरा कर कटाव से प्रभावित एक-एक परिवार से मुलाकात की। उन्होंने ग्रामीणों की समस्याओं को पूरी गंभीरता से सुना और उन्हें ढांढस बंधाया कि इस संकट की घड़ी में वे अकेले नहीं हैं।
प्रशासनिक अधिकारियों से त्वरित संपर्क: मुखिया ने मौके से ही जिला प्रशासन और बाढ़ नियंत्रण विभाग के वरीय अधिकारियों को फोन कर वस्तुस्थिति से अवगत कराया। उन्होंने मांग की कि तत्काल प्रभाव से यहाँ बांस-बल्ला पाइलिंग और बालू की बोरियों (Geobags) से एंटी-इरोजन का काम शुरू किया जाए, ताकि बस्तियों को और अधिक टूटने से बचाया जा सके।
स्थायी समाधान की मांग और प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि हर साल बरसात के मौसम में उन्हें इस तरह के दर्द से गुजरना पड़ता है, लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई स्थायी उपाय नहीं किया जाता।
महज आश्वासन मिलने की टीस: ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि जब तक कटाव तबाही का रूप नहीं ले लेता, तब तक अधिकारी सुस्त रहते हैं। कटाव रुकने के बाद केवल आश्वासन देकर खानापूर्ति कर दी जाती है।
बचाव कार्यों की दरकार: इस समय पीपरा गांव के लोगों को तात्कालिक राहत सामग्री (जैसे सूखा राशन, पॉलीथिन शीट) के साथ-साथ नदी की धारा को मोड़ने या कटाव रोकने के लिए युद्ध स्तर पर तकनीकी उपायों की सख्त आवश्यकता है।
पूर्णिया जिले के पीपरा गांव के वार्ड संख्या 11 और 12 में कोसी नदी का तेज कटाव एक बहुत बड़ी मानवीय और प्राकृतिक आपदा का रूप ले चुका है। अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने को विवश हुए ग्रामीणों की यह पीड़ा प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। पंचायत के मुखिया द्वारा उठाये गए कदम और ग्रामीणों की गुहार पर अब जिला प्रशासन और जल संसाधन विभाग को बिना एक पल गंवाए एक्शन मोड में आना होगा। यदि समय रहते कटाव रोधी कार्य नहीं कराये गए, तो पूरा गांव नक्शे से गायब हो सकता है, इसलिए सरकार को तुरंत राहत और बचाव कार्यों के साथ-साथ स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।