सुल्तानगंज से देवघर तक आस्था की अनूठी मिसाल; लखीसराय के सुबोध कुमार सिंह घुटने के बल तय कर रहे हैं 98 किलोमीटर की कठिन कांवर यात्रा, देखकर भावुक हो रहे लोग
भागलपुर, विशेष संवाददाता: विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले के दौरान सिल्क सिटी सुल्तानगंज और कांवरिया पथ पर देश-विदेश से आने वाले शिवभक्तों की अगाध आस्था के कई रंग देखने को मिलते हैं। कोई सैकड़ों किलोमीटर की दूरी दंडवत करते हुए तय कर रहा है, तो कोई कठिन साधना के साथ बाबा बैद्यनाथ के दरबार की ओर बढ़ रहा है। इसी बीच, सुल्तानगंज के कांवरिया मार्ग पर एक ऐसा दृश्य इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है, जिसे देखकर वहां से गुजरने हर शख्स की आंखें नम हो जा रही हैं और दिल में श्रद्धा से सिर झुक जा रहा है। लखीसराय जिले के रामचंद्रपुर गांव निवासी सुबोध कुमार सिंह ने अपनी अगाध श्रद्धा और मन्नत पूरी होने के विश्वास के साथ घुटने के बल कठिन कांवर यात्रा शुरू की है। उनकी यह अनूठी और कष्टसाध्य साधना श्रावणी मेले में आने वाले तमाम श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा और चर्चा का मुख्य विषय बन गई है।
कठिन राह और अडिग हौसला: पैरों के छाले भी नहीं डिगा सके कदम
सुल्तानगंज के उत्तरवाहिनी गंगा तट से जल उठाने के बाद जब कांवरियों का जत्था देवघर के लिए रवाना होता है, तो लगभग 98 किलोमीटर लंबी यह पदयात्रा सामान्य इंसानों के लिए भी शारीरिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जाती है:
घुटने के बल चलने का संकल्प: ऐसे में लखीसराय के रामचंद्रपुर निवासी सुबोध कुमार सिंह द्वारा सामान्य तरीके से चलने के बजाय घुटने के बल चलकर यह सफर तय करना किसी चमत्कारिक दृढ़ इच्छाशक्ति से कम नहीं है। उनके घुटनों पर सुरक्षा के लिए बंधे पैड और पट्टियां इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यह यात्रा कितनी कठिन और पीड़ादायक है, लेकिन बाबा भोलेनाथ के प्रति उनकी भक्ति इस दर्द को पूरी तरह से मात दे रही है।
मौसम की मार भी नहीं तोड़ पाई हिम्मत: श्रावण मास के शुरुआती दिनों में कभी चिलचिलाती धूप और तपती बालू, तो कभी अचानक मूसलाधार बारिश कांवरिया पथ के रास्तों को और भी दुष्कर बना देती है। इसके बावजूद सुबोध कुमार सिंह के कदम रुक नहीं रहे हैं। बारिश के दौरान जब पूरा रास्ता कीचड़ से सन जाता है, तब भी वे पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
राह चलते लोगों की आंखें हो रहीं नम, हर कोई कर रहा है नमन
सुबोध कुमार सिंह की इस निष्ठावान यात्रा को जो भी देख रहा है, वह भावुक हुए बिना नहीं रह पा रहा है:
सेवा शिविरों और श्रद्धालुओं का समर्थन: कांवरिया पथ पर सेवा में जुटे स्वयंसेवक और अन्य शिवभक्त जब सुबोध को इस तरह घुटने के बल चलते देखते हैं, तो वे स्वतः उनकी मदद के लिए आगे आते हैं। लोग उन्हें फल, पानी और प्राथमिक उपचार की पेशकश करते हैं तथा उनके सफर के मंगलमय होने की कामना करते हैं।
आस्था का जीवंत उदाहरण: रास्ते में मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में कई कांवरियों को अलग-अलग मन्नतों के साथ यात्रा करते देखा है, लेकिन सुबोध कुमार सिंह जैसी तपस्या और समर्पण की मिसाल विरले ही देखने को मिलती है। उनकी यह यात्रा यह साबित करती है कि इंसान के भीतर यदि अटूट विश्वास हो, तो शारीरिक कष्ट भी छोटे पड़ जाते हैं।
क्यों खास है सुल्तानगंज से देवघर की यह 98 किलोमीटर की यात्रा?
सुल्तानगंज से देवघर तक की यह कांवर यात्रा हिंदू सनातन संस्कृति में विशेष महत्व रखती है:
पहला चरण: श्रद्धालु सुल्तानगंज के उत्तरवाहिनी गंगा घाट पर पहुंचकर पवित्र जल ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि यहां की गंगा उत्तर की ओर बहती है, जो मोक्ष और शुद्धि का प्रतीक है।
कठिन अनुशासन: इस पूरी यात्रा के दौरान कांवरियों को कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। कांवर को जमीन पर नहीं रखना होता है और पूरी यात्रा 'बोल बम' के जयकारों के साथ तय होती है। सुबोध कुमार सिंह इन सभी पारंपरिक नियमों का पालन करते हुए अपनी इस विशेष साधना को अंजाम दे रहे हैं।
लखीसराय के रामचंद्रपुर से आए सुबोध कुमार सिंह की यह यात्रा महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मानव की अदम्य इच्छाशक्ति, भगवान के प्रति समर्पण और अटूट विश्वास का सबसे बड़ा दस्तावेज बन गई है। सुल्तानगंज से देवघर के बीच की उनकी यह घुटने के बल तय होने वाली यात्रा श्रावणी मेला 2026 की सबसे मार्मिक और प्रेरणादायक कहानियों में शुमार हो चुकी है, जो आने वाले कई दिनों तक श्रद्धालुओं के जेहन में जिंदा रहेगी।