कला और साधना का अद्भुत संगम; शारदा संगीत सदन में भव्यता के साथ मनाया गया गुरु पूजन उत्सव, छात्रों की गायन, वादन और नृत्य प्रस्तुतियों ने मोहा मन
भागलपुर, विशेष संवाददाता: सिल्क सिटी भागलपुर की सांस्कृतिक और कलात्मक धरती पर बुधवार की शाम एक बेहद पवित्र, आध्यात्मिक और मनमोहक आयोजन का गवाह बनी। शहर के प्रतिष्ठित कला संस्थान शारदा संगीत सदन में भारतीय संस्कृति की प्राचीन और महान 'गुरु-शिष्य परंपरा' को समर्पित गुरु पूजन उत्सव का आयोजन अत्यंत धूमधाम और भव्यता के साथ किया गया। इस विशेष सांस्कृतिक संध्या का कुशल संचालन जाने-माने संगीत मर्मज्ञ पंडित शंकर मिश्र नाहर और संस्थान की प्राचार्या शर्मिला नाहर ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम के दौरान संस्थान के प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं ने शास्त्रीय गायन, वादन और नृत्य की ऐसी त्रिवेणी प्रस्तुत की कि उपस्थित दर्शक और संगीत प्रेमी मंत्रमुग्ध हो गए।
क्यों खास है गुरु पूजन उत्सव? क्या है इसका सांस्कृतिक महत्व?
भारतीय शास्त्रीय कलाओं में 'गुरु' को केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि वह दिव्य प्रकाश माना गया है जो अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के मार्ग पर ले जाता है। शारदा संगीत सदन में आयोजित इस उत्सव का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना और गुरुओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना था:
गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन: आज के आधुनिक और मशीनी युग में जहां कलाएं पीछे छूट रही हैं, वहीं शारदा संगीत सदन जैसी संस्थाएं इस पवित्र परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। इस उत्सव के माध्यम से छात्रों ने यह साबित किया कि कला में सफलता का शॉर्टकट नहीं होता, इसके लिए गुरु का आशीर्वाद और कठोर साधना अनिवार्य है।
दीप प्रज्ज्वलन के साथ आध्यात्मिक शुरुआत: कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक रूप से मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन और माल्यार्पण के साथ हुआ। इसके बाद छात्रों और शिक्षकों ने मिलकर वेदमंत्रों और संगीत की धुनों के बीच अपने गुरुओं का पूजन किया, जिससे पूरा सभागार भक्तिमय और सकारात्मक ऊर्जा से भर उठा।
पंडित शंकर मिश्र नाहर और प्राचार्या शर्मिला नाहर का कुशल मार्गदर्शन
इस भव्य आयोजन की सफलता के पीछे संस्थान के दिग्गजों की मेहनत और दूरदर्शिता साफ झलक रही थी:
सटीक संचालन और मंच प्रबंधन: पंडित शंकर मिश्र नाहर और प्राचार्या शर्मिला नाहर ने जिस प्रकार से पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की और मंच का संचालन किया, वह सराहनीय रहा। संचालन के दौरान उन्होंने न सिर्फ आने वाली प्रस्तुतियों का परिचय दिया, बल्कि शास्त्रीय संगीत की बारीकियों और रागों के इतिहास से भी दर्शकों को अवगत कराया।
प्रेरणादायक संबोधन: इस अवसर पर उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए दोनों वक्ताओं ने कहा कि संगीत और कला एक साधना है। उन्होंने छात्रों से आह्वान किया कि वे अपनी पूरी निष्ठा के साथ रियाद करें, क्योंकि गुरु का आशीर्वाद तभी फलीभूत होता है जब शिष्य की लगन सच्ची हो।
छात्रों की त्रिविध प्रस्तुतियां: गायन, वादन और नृत्य का जादू
गुरु पूजन उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण छात्र-छात्राओं द्वारा दी गई प्रस्तुतियां थीं। कार्यक्रम को तीन प्रमुख हिस्सों में बांटा गया था, जिसने उपस्थित सभी लोगों को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया:
1. गायन (Vocal): सुरों की साधना और बंदिशें संगीत संध्या की शुरुआत पारंपरिक सरस्वती वंदना से हुई, जिसके बाद छात्रों ने एक से बढ़कर एक शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय बंदिशें प्रस्तुत कीं।
बच्चों ने रागों के विभिन्न स्वरों, आलापों और तानों का बेहद सधा हुआ प्रदर्शन किया।
गुरुओं की महिमा का बखान करने वाले भजनों और सूफियाना गीतों ने श्रोताओं के दिलों को छू लिया। बाल कलाकारों के गले से निकले सुरों की मिठास ने यह बता दिया कि आने वाले समय में भागलपुर के ये नौनिहाल संगीत जगत में बड़ा नाम रोशन करेंगे।
2. वादन (Instrumental): थिरकते साज और ताल की जुगलबंदी गायन के पश्चात वादन कला का ऐसा दौर शुरू हुआ जिसने पूरे सभागार में जोश भर दिया।
हारमोनियम, गिटार, सितार और तबले की थाप पर जब छात्र-छात्राओं ने अपनी उंगलियां चलाईं, तो पूरा माहौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
विशेष तौर पर तबला वादन की प्रस्तुति के दौरान ताल के चक्रों (तीनताल और झपताल) का जो संयोजन पेश किया गया, उसने शास्त्रीय संगीत के जानकारों को भी दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया।
3. नृत्य (Dance): भाव-भंगिमाओं और मुद्राओं का अद्भुत प्रदर्शन कार्यक्रम का अंतिम और सबसे आकर्षक चरण नृत्य प्रस्तुतियां रहीं। पारंपरिक और शास्त्रीय नृत्य शैलियों पर आधारित प्रस्तुतियों ने समां बांध दिया:
रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे नर्तक-नर्तकियों ने अपने सुंदर भाव, नयन-नक्श के संचालन (अभिनया) और तेज पाद-संचालन (फुटवर्क) से पौराणिक कथाओं और गुरु वंदना को जीवंत कर दिया।
नृत्य की हर एक मुद्रा में अनुशासन और समर्पण साफ झलकता था, जिसे देखकर अभिभावकों और अतिथियों ने मुक्तकंठ से सराहना की।
दर्शकों की भारी भीड़ और अभिभावकों की प्रतिक्रिया
शारदा संगीत सदन का मुख्य सभागार खचाखच भरा हुआ था। शहर के प्रबुद्ध नागरिक, कला प्रेमी, और छात्र-छात्राओं के अभिभावक इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बने:
अभिभावकों की आंखें नम: अपने बच्चों को मंच पर इतनी आत्मविश्वासी और परिपक्व प्रस्तुति देते देख कई अभिभावकों की आंखें गर्व और खुशी से नम हो गईं। उन्होंने कहा कि ऐसे संस्थान बच्चों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
कला जगत में सराहना: स्थानीय कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने कहा कि भागलपुर में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में शारदा संगीत सदन का योगदान अतुलनीय है। इस प्रकार के आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं।
शारदा संगीत सदन में बुधवार की शाम मनाया गया यह गुरु पूजन उत्सव केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह संगीत, कला, निष्ठा और समर्पण का एक महाकुंभ था। पंडित शंकर मिश्र नाहर और प्राचार्या शर्मिला नाहर के नेतृत्व में छात्रों ने जिस प्रकार अपनी कला का प्रदर्शन किया, उसने यह साबित कर दिया कि भागलपुर की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित और उज्ज्वल हाथों में है। यह संध्या सिल्क सिटी के इतिहास में एक यादगार सांस्कृतिक मील का पत्थर बनकर हमेशा के लिए दर्ज हो गई है।