"कांवर कंधे पर रखने के बाद अंदर से प्रसन्नता और ऊर्जा मिलती है" — शिवभक्ति में सराबोर हुए कांवरिए, हर तरफ गूंज रहे 'बोल बम' के जयकारे

भागलपुर, विशेष संवाददाता: सावन के पवित्र महीने में चारों तरफ भगवान भोलेनाथ की भक्ति की बयार बह रही है। उत्तरवाहिनी गंगा तट सुल्तानगंज से लेकर देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम तक जाने वाले कांवरिया पथ पर इन दिनों आस्था का ऐसा अद्भुत सैलाब उमड़ पड़ा है, जिसे देखकर हर कोई भक्तिमय हो रहा है। केसरिया वस्त्रों में लिपटे शिवभक्तों के कदम जब बाबाधाम की ओर बढ़ते हैं, तो उनके चेहरे की थकान और कठिन रास्ते की पीड़ा पूरी तरह गायब हो जाती है। कांवरियों का कहना है कि जब वे विधि-विधान से गंगा जल भरकर कांवड़ को अपने कंधे पर रखते हैं, तो शरीर के कष्ट पलभर में दूर हो जाते हैं और अंदर से एक अौलाैतिक प्रसन्नता व अपार ऊर्जा का अहसास होता है।

कंधे पर कांवड़ आते ही मिट जाती है सारी थकान

श्रावण मास के इस पावन अवसर पर भागलपुर के सुल्तानगंज से जल उठाकर मीलों का लंबा सफर तय करने वाले शिवभक्तों का उत्साह देखते ही बनता है।

अथक यात्रा और अटूट विश्वास: नंगे पांव, तपती धूप और छाले पड़े पैरों के साथ रोजाना दर्जनों किलोमीटर की पैदल यात्रा करना आसान नहीं होता। इसके बावजूद जब कांवरियों से बात की गई, तो उनका यही कहना था कि कंधे पर कांवड़ टिकते ही उन्हें किसी अदृश्य शक्ति का अहसास होता है।

ऊर्जा का संचार: एक युवा शिवभक्त ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, "शुरुआत में थोड़ा कठिन लगता है, लेकिन जैसे ही गंगा जल से सुसज्जित कांवड़ को कंधे पर रखते हैं, मन का सारा डर और शरीर की थकान छूमंतर हो जाती है। ऐसा लगता है कि भीतर से एक नई ऊर्जा मिल गई है जो हमें बिना रुके आगे बढ़ने की शक्ति दे रही है।"

भक्ति और अनुशासन का अनूठा संगम

कांवड़ यात्रा केवल एक शारीरिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह आत्म-संयम, अनुशासन और अटूट श्रद्धा की एक बड़ी तपस्या है:

कठोर नियमों का पालन: कांवरिए यात्रा के दौरान पूरी तरह सात्विक जीवन जीते हैं। वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण करते हैं और हर पल जुबान पर केवल 'बम-बम भोले' या 'हर हर महादेव' का नाम रहता है।

आपसी सहयोग की भावना: मार्ग में जाति, धर्म और ऊंच-नीच के सभी बंधन टूट जाते हैं। रास्ते में मिलने वाले सेवा शिविरों में अनजान लोग भी कांवरियों की सेवा अपने परिवार के सदस्य की तरह करते हैं। कोई पैरों की मालिश करता है तो कोई फलाहार कराता है, जिससे कांवरियों का हौसला और बढ़ जाता है।

प्रशासन और समाज की व्यापक तैयारियां

शिवभक्तों की इस ऊर्जा और उत्साह को बनाए रखने के लिए जिला प्रशासन और स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएं पूरी तरह मुस्तैद हैं:

जगह-जगह सेवा शिविर: कांवरिया मार्ग पर हर कुछ दूरी पर भव्य शिविर लगाए गए हैं जहां चिकित्सा, विश्राम, शुद्ध पेयजल और खान-पान की पुख्ता व्यवस्था है।

सुरक्षा और प्रशासनिक चौकसी: सुरक्षा के लिहाज से पुलिस बल और सीसीटीवी कैमरों से चप्पे-चप्पे पर नजर रखी जा रही है ताकि शिवभक्तों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।

कंधे पर कांवड़ और जुबान पर भोले का नाम—यह दृश्य केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस रूहानी ताकत का प्रतीक है जहां आस्था शारीरिक सीमाओं से परे हो जाती है। कांवरियों के इन उद्गारों से साफ है कि सच्ची श्रद्धा और शिव के प्रति समर्पण इंसान को कठिन से कठिन दौर में भी अडिग रहने की शक्ति देता है।