स्वास्थ्य व्यवस्था की एक और कड़वी सच्चाई: IGIMS में प्रशिक्षण के दौरान खुलासा; बिहार के पीएचसी के 80 फीसदी डॉक्टरों को नहीं आता सीपीआर (CPR) का सही तरीका, सदर अस्पतालों के चिकित्सक भी सीख रहे हुनर

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था और ग्रामीण स्तर पर मरीजों को मिलने वाली चिकित्सा सेवाओं को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। राजधानी पटना के प्रतिष्ठित संस्थान इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS - Indira Gandhi Institute of Medical Sciences) में इन दिनों बिहार के विभिन्न प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और सदर अस्पतालों के चिकित्सकों को विशेष प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया जा रहा है। ये डॉक्टर बारी-बारी से आईजीआईएमएस पहुंच कर आधुनिक चिकित्सा तकनीकों का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

इसी प्रशिक्षण सत्र के दौरान एक ऐसा चौंकाने वाला तथ्य उजागर हुआ है, जिसने स्वास्थ्य विभाग के दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार, पीएचसी (PHC) में तैनात 80 फीसदी डॉक्टरों को आपातकालीन स्थिति में मरीज की जान बचाने के लिए बेहद जरूरी माने जाने वाले 'सीपीआर' (CPR - Cardiopulmonary Resuscitation) का सही तरीका तक नहीं आता है। यह खुलासा न केवल चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में इलाज कराने वाले आम मरीजों की जान पर मंडराते खतरे को भी उजागर करता है। आइए इस गंभीर मामले, इसके कारणों और स्वास्थ्य महकमे में चल रहे इस प्रशिक्षण अभियान का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।

पृष्ठभूमि: क्यों हो रहा है आईजीआईएमएस में डॉक्टरों का विशेष प्रशिक्षण?

बिहार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा यह महसूस किया गया कि जमीनी स्तर यानी ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और रेफरल अस्पतालों में पदस्थापित डॉक्टरों को क्रिटिकल केयर (Critical Care) और आपातकालीन चिकित्सा प्रबंधन में दक्ष बनाने की सख्त जरूरत है।

आपातकालीन सेवाओं को मजबूती देना: दिल का दौरा (Heart Attack), सांस रुक जाना या किसी अचानक दुर्घटना के बाद मरीज को तुरंत रिस्पॉन्स देने के लिए 'बेसिक लाइफ सपोर्ट' (BLS) और 'एडवांस्ड कार्डियक लाइफ सपोर्ट' (ACLS) का ज्ञान होना हर डॉक्टर के लिए अनिवार्य माना जाता है।

आईजीआईएमएस की भूमिका: इसी उद्देश्य के तहत बिहार के अलग-अलग जिलों के पीएचसी और सदर अस्पतालों के चिकित्सकों को बैचवार आईजीआईएमएस भेजा जा रहा है, ताकि विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में उन्हें लाइफ सेविंग स्किल्स (Life Saving Skills) सिखाई जा सकें।

चौंकाने वाला खुलासा: 80% पीएचसी डॉक्टरों को नहीं आता सीपीआर

जब आईजीआईएमएस में प्रशिक्षण की शुरुआत हुई और डॉक्टरों का व्यावहारिक परीक्षण (Practical Assessment) किया गया, तो जो आंकड़े सामने आए, वे बेहद डरावने थे।

सीपीआर की बुनियादी जानकारी का अभाव: सीपीआर (CPR) यानी कार्डियोपल्मोनरी रिसुसिताॅम किसी भी मरीज की बंद पड़ी सांस या रुक चुके दिल की धड़कन को कृत्रिम तरीके से चालू रखने की पहली और सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यदि गोल्डन आवर्स (Golden Hours) के दौरान मरीज को सही तरीके से सीपीआर मिल जाए, तो जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन परीक्षण में यह पाया गया कि ग्रामीण पीएचसी में कार्यरत 80 प्रतिशत चिकित्सकों को यह भी नहीं पता कि सही दबाव, सही तकनीक और सही गति से सीपीआर कैसे दिया जाता है।

मरीजों की जान पर जोखिम: सोचिए, जिस डॉक्टर के भरोसे गांव का एक आम मरीज अपनी गंभीर हालत में पीएचसी पहुंचता है, यदि उसी डॉक्टर को जीवन रक्षक प्रक्रिया यानी सीपीआर का ही सही ज्ञान न हो, तो मरीज की जिंदगी भगवान भरोसे ही कही जाएगी।

क्यों पैदा हुई ऐसी स्थिति? चिकित्सा शिक्षा और व्यवस्था की खामियां

इस खुलासे के बाद स्वास्थ्य विशेषज्ञों और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई है।

सिद्धांत और व्यवहार में अंतर: मेडिकल की पढ़ाई के दौरानता किताबों में सीपीआर और इमरजेंसी मैनेजमेंट पढ़ाया तो जाता है, लेकिन वर्षों तक केवल ओपीडी (OPD) में सामान्य सर्दी-जुकाम या पेट दर्द की दवाइयां लिखते-लिखते डॉक्टरों के हाथ से प्रैक्टिकल अनुभव छूट जाता है।

रीफ्रेशर कोर्स की कमी: स्वास्थ्य विभाग द्वारा समय-समय पर ग्रामीण डॉक्टरों के लिए इस तरह के रिफ्रेशर कोर्सेस या अनिवार्य प्रशिक्षण शिविर का आयोजन न किया जाना भी इसका एक बड़ा कारण है। जब तक डॉक्टर अपनी प्रैक्टिस में आधुनिक तकनीकों से अपडेट नहीं रहते, तब तक उनकी क्षमताएं क्षीण होने लगती हैं।

सदर अस्पतालों और पीएचसी के डॉक्टरों की भागीदारी

भले ही शुरुआती आंकड़े डराने वाले हों, लेकिन राहत की बात यह है कि अब सरकार और आईजीआईएमएस प्रशासन ने इस दिशा में ठोस कदम उठाया है।

बारी-बारी से पहुंच रहे हैं डॉक्टर: रोस्टर के अनुसार, मुजफ्फरपुर समेत बिहार के विभिन्न जिलों के सदर अस्पतालों और पीएचसी के चिकित्सक आईजीआईएमएस पहुंचकर इस प्रशिक्षण का हिस्सा बन रहे हैं।

प्रशिक्षण का महत्व: इस ट्रेनिंग के दौरान डॉक्टरों को न केवल सीपीआर सिखाया जा रहा है, बल्कि उन्हें यह भी बताया जा रहा है कि आईसीयू (ICU) में जाने से पहले किसी गंभीर मरीज को अस्पताल के शुरुआती घंटों में कैसे संभाला जाए।

बिहार के पीएचसी और सदर अस्पतालों के डॉक्टरों द्वारा आईजीआईएमएस में लिया जा रहा यह प्रशिक्षण एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके साथ ही सामने आया यह सच कि "80 फीसदी डॉक्टरों को सीपीआर का सही तरीका नहीं आता" हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत को आईना दिखाता है। यह इस बात का संकेत है कि केवल कागजों पर अस्पताल चलाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माने जाने वाले पीएचसी के हर डॉक्टर को आपातकालीन चिकित्सा में पूरी तरह दक्ष करना अनिवार्य है। यदि समय रहते डॉक्टरों की स्किल ट्रेनिंग पर जोर नहीं दिया गया, तो ग्रामीण इलाकों के मरीजों की जान पर मंडराता खतरा यूं ही बना रहेगा।