बरारी घाट का एकमात्र विद्युत शवदाह गृह 8 महीने से फांक रहा धूल, नगर निगम की लापरवाही से गरीब और असहाय परिवारों पर पड़ा अंतिम संस्कार का भारी आर्थिक बोझ

भागलपुर : बिहार के प्रमुख शहरों में शुमार भागलपुर में सिस्टम की संवेदनहीनता और प्रशासनिक उदासीनता का एक बेहद शर्मनाक और दर्दनाक पहलू सामने आया है। मोक्षदायिनी उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर स्थित ऐतिहासिक बरारी घाट पर मौजूद जिले का एकमात्र विद्युत शवदाह गृह (Electric Crematorium) पिछले आठ महीनों से पूरी तरह ठप पड़ा है। मशीन में आई तकनीकी खराबी के बाद इसके मुख्य द्वार पर जो ताला जड़ा गया, वह आज तक नहीं खुल सका है। नगर निगम की सामान्य बोर्ड बैठकों और स्थायी सशक्त समिति में इस मुद्दे को कई बार उठाया गया, बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन धरातल पर मरम्मत के नाम पर सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं। इस प्रशासनिक लापरवाही का सबसे बड़ा और सीधा खामियाजा उन गरीब, मजदूर और मध्यम वर्गीय परिवारों को भुगतना पड़ रहा है, जिनके लिए अपनों का सम्मानजनक अंतिम संस्कार करना अब एक बहुत बड़ा आर्थिक संकट बन गया है।

(मशीनों में जंग और लटकता ताला)

बरारी घाट भागलपुर जिले के साथ-साथ आसपास के कई जिलों (बांका, मुंगेर, खगड़िया आदि) के लिए अंत्येष्टि का मुख्य केंद्र है। हर दिन यहां दर्जनों शव दाह-संस्कार के लिए लाए जाते हैं।

मशीन पूरी तरह कबाड़ में तब्दील: करीब आठ महीने पहले विद्युत शवदाह गृह की कॉइल और चिमनी में खराबी आई थी। शुरुआती दिनों में कहा गया कि कुछ ही हफ्तों में इसे ठीक कर लिया जाएगा। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी मरम्मत का काम शुरू नहीं हुआ है।

कर्मचारी नदारद: शवदाह गृह के बंद होने के कारण वहां तैनात रहने वाले कर्मचारी भी अब नदारद रहते हैं। पूरा परिसर देखरेख के अभाव में खंडहर और कबाड़ का रूप लेता जा रहा है।

निराश लौटते हैं परिजन: जब कोई असहाय या गरीब परिवार अपने परिजन का शव लेकर इस उम्मीद से बरारी घाट पहुंचता है कि विद्युत शवदाह गृह में कम खर्च में अंतिम संस्कार हो जाएगा, तो वहां लटकता ताला देखकर उनकी उम्मीदें टूट जाती हैं।

गरीब परिवारों के लिए अंतिम संस्कार बना एक दुःस्वप्न (आर्थिक बोझ का गणित)

विद्युत शवदाह गृह के बंद होने से सबसे बड़ा प्रहार समाज के उस तबके पर हुआ है, जो रोजमर्रा की कमाई पर निर्भर है:

पारंपरिक दाह-संस्कार का भारी खर्च: जहां विद्युत शवदाह गृह में मात्र 300 से 500 रुपये के मामूली शुल्क (या कई बार नि:शुल्क) में अंतिम संस्कार हो जाता था, वहीं अब लकड़ी से पारंपरिक दाह-संस्कार करने में 5,000 से 8,000 रुपये तक का भारी खर्च आ रहा है।

लकड़ी और सामग्री की महंगाई: वर्तमान में घाट पर जलावन की लकड़ी 800 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है। एक सामान्य शव को जलाने के लिए कम से कम 3 से 4 क्विंटल लकड़ी की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त घी, तिल, डोम राजा का नेग और अन्य कर्मकांड की सामग्रियों का खर्च अलग से जुड़ जाता है।

कर्ज लेने को मजबूर लाचार परिजन: कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां झोपड़पट्टियों और दिहाड़ी मजदूरी करने वाले परिवारों को अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के लिए महाजनों से भारी ब्याज पर कर्ज लेना पड़ा है। अपनों को खोने के दुख के साथ-साथ यह आर्थिक चोट उनके लिए असहनीय होती जा रही है।

नगर निगम की बैठकों में सिर्फ गूंजते हैं मुद्दे, कार्रवाई शून्य

इस पूरी समस्या की जड़ में भागलपुर नगर निगम का लचर रवैया और नौकरशाही की लालफीताशाही है:

बैठकों में कागजी खानापूर्ति: पिछले आठ महीनों में नगर निगम की कई बोर्ड बैठकें आयोजित हुईं। कई वार्ड पार्षदों ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। हर बार मेयर और नगर आयुक्त की ओर से यह आश्वासन दिया गया कि मरम्मत के लिए टेंडर (निविदा) निकाला जा रहा है या संबंधित एजेंसी को नोटिस भेजा गया है, लेकिन हकीकत में एक ईंट भी नहीं हिली है।

एजेंसी और निगम के बीच खींचतान: सूत्रों का कहना है कि जिस एजेंसी को इसके रखरखाव का जिम्मा सौंपा गया था, उसके और नगर निगम के बीच बकाये भुगतान और तकनीकी शर्तों को लेकर विवाद चल रहा है। इस खींचतान की सजा शहर की गरीब जनता भुगत रही है।

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: मौत जैसे संवेदनशील और अपरिहार्य विषय पर भी स्थानीय प्रशासन का इतना ढुलमुल रवैया यह साबित करता है कि आम जनता की परेशानियों से उन्हें कोई विशेष सरोकार नहीं है।

पर्यावरण पर भी पड़ रहा है गंभीर दुष्प्रभाव

विद्युत शवदाह गृह की स्थापना के पीछे एक बहुत बड़ा उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और गंगा को प्रदूषण मुक्त रखना भी था, जो अब पूरी तरह विफल हो रहा है:

पेड़ों की अंधाधुंध कटाई: रोजाना दर्जनों शवों को पारंपरिक तरीके से जलाने के लिए टनों लकड़ियों की जरूरत पड़ रही है, जिसका सीधा असर पेड़ों की कटाई और हरियाली पर पड़ रहा है।

गंगा और वायु प्रदूषण में वृद्धि: चिताओं से उठने वाले धुएं से घाट के आसपास वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ गया है। इसके अलावा, कई बार लकड़ियों की कमी या गरीबी के कारण अधजले शवों को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है, जिससे पवित्र गंगा नदी का जल अत्यधिक प्रदूषित हो रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों में पनपता भारी आक्रोश

बरारी घाट की इस बदहाली को लेकर शहर के सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवी संस्थाओं और आम नागरिकों में नगर निगम के खिलाफ भारी रोष है:

"जीते जी तो कष्ट है ही, मरने के बाद भी राहत नहीं": घाट पर मौजूद कई लोगों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार गरीबों को मुफ्त राशन देने का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन जब कोई गरीब मर जाता है, तो उसे दो गज कफन और सम्मानजनक चिता तक नसीब नहीं हो पाती।

आंदोलन की चेतावनी: कई स्थानीय संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि अगले 15 दिनों के भीतर विद्युत शवदाह गृह की मरम्मत कराकर उसे चालू नहीं किया गया, तो वे नगर निगम कार्यालय का घेराव करेंगे और उग्र प्रदर्शन करने को बाध्य होंगे।

भागलपुर के बरारी घाट पर आठ महीने से बंद पड़ा विद्युत शवदाह गृह केवल एक मशीन की खराबी का मामला नहीं है; यह हमारे सिस्टम की उस मृत होती संवेदना का प्रतीक है जो गरीबों के आंसुओं को देखने में अक्षम है। किसी भी व्यक्ति को मृत्यु के बाद सम्मानजनक अंतिम विदाई देना एक मूलभूत मानवीय अधिकार है। अब समय आ गया है कि भागलपुर के जिलाधिकारी (DM) और राज्य का नगर विकास विभाग इस मामले का स्वतः संज्ञान लें। नगर निगम की लालफीताशाही और ठेकेदारों के विवाद को दरकिनार करते हुए, आपातकालीन फंड का उपयोग कर इस शवदाह गृह को अविलंब चालू कराया जाना चाहिए, ताकि गरीब परिवारों को कर्ज के बोझ तले दबने से बचाया जा सके और पर्यावरण की भी रक्षा हो सके।