गंगा का जलस्तर बढ़ने से टूटा दियारा का संपर्क मार्ग; नारायणपुर के किसानों और पशुपालकों के लिए आवागमन का एकमात्र सहारा बनी नाव
नारायणपुर (भागलपुर), संवाद सूत्र: भागलपुर जिले के नारायणपुर प्रखंड अंतर्गत गंगा दियारा क्षेत्र इन दिनों भीषण प्राकृतिक और भौगोलिक संकट से जूझ रहा है। भवानीपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले महत्वपूर्ण मधुरापुर जहाज घाट पर नदी का पानी भर जाने के कारण दियारा क्षेत्र को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला संपर्क मार्ग पूरी तरह टूट गया है। रास्ते का वजूद समाप्त हो जाने के कारण वहां के स्थानीय किसानों, पशुपालकों और आम ग्रामीण जनता की दैनिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। ऐसे विकट हालातों में जब सड़क मार्ग पूरी तरह से ठप हो चुका है, तब नाव ही इन मेहनतकश लोगों के लिए आवागमन का एकमात्र और आखिरी सहारा बची है।
लगभग 15 दिनों से जलभराव, ठप पड़ी दिनचर्या
स्थानीय गोताखोर व नाविक विजय मंडल ने स्थिति की गंभीरता को बयां करते हुए बताया कि मधुरापुर जहाज घाट पर पिछले लगभग 15 दिनों से लगातार पानी भरा हुआ है। गंगा नदी का जलस्तर बढ़ने और संपर्क मार्ग के जलमग्न होकर टूटने से दियारा क्षेत्र के भीतर का संपर्क कट गया है। आवागमन के सारे पारंपरिक साधन बंद हो चुके हैं, जिससे किसानों और पशुपालकों को रोजमर्रा के कार्यों के लिए भारी फजीहत का सामना करना पड़ रहा है। बच्चों की पढ़ाई, बाजार की जरूरतें और चिकित्सीय आपातकाल जैसी स्थितियों में यह दूरी और अधिक कष्टदायक बन जाती है।
पशुपालकों और किसानों की बढ़ी मुसीबतें
नारायणपुर का दियारा क्षेत्र अपनी उपजाऊ मिट्टी और पशुपालन के लिए दूर-दूर तक जाना जाता है। यहां के अधिकांश लोगों की आजीविका कृषि और पशुधन पर ही निर्भर है, लेकिन संपर्क मार्ग टूटने से उनकी मुश्किलें कई गुना बढ़ गई हैं:
चारे का संकट: पशुपालकों के सामने अपने मवेशियों के लिए चारे की व्यवस्था करना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। दियारा के खेतों से चारा लाना और उसे मुख्य बाजार तक पहुंचाना नाव के बिना असंभव हो गया है।
फसलों की ढुलाई बाधित: किसानों द्वारा उपजाए जाने वाले कृषि उत्पादों को समय पर बाजार में बेचना मुश्किल हो गया है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर ग्रामीण
कोई प्रशासनिक वैकल्पिक व्यवस्था या मजबूत पुल न होने के कारण ग्रामीण बिना किसी सुरक्षा और देखरेख के खतरनाक परिस्थितियों में घाट पार करने को विवश हैं। क्षमता से अधिक सामान और मवेशियों को नाव पर लादकर नदी पार करने के दौरान हमेशा जान-माल का भारी खतरा बना रहता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जरा सी भी लापरवाही एक बड़े हादसे का सबब बन सकती है, इसके बावजूद मजबूरी में उन्हें इसी जोखिम भरे सफर को चुनना पड़ रहा है।
40-45 वर्षों से सेवा दे रहे नाविक, पर सरकारी सहायता शून्य
इस संकट की घड़ी में पिछले चार दशकों से अधिक समय से अपनी सेवा दे रहे स्थानीय गोताखोर और नाविक क्षेत्र के लिए फरिश्ता बने हुए हैं। गोताखोर विजय मंडल ने दर्द साझा करते हुए बताया कि वे करीब 40-45 वर्षों से लगातार इस घाट पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सुबह से लेकर रात के 11 बजे तक उन्हें अपनी ड्यूटी निभानी पड़ती है ताकि कोई भी ग्रामीण आपात स्थिति में असहाय न रहे। दिन-रात मुस्तैद रहने के बावजूद उन्हें सरकारी स्तर पर किसी भी प्रकार का प्रोत्साहन, वेतन या मदद नहीं मिलती है, जो व्यवस्था की उदासीनता को उजागर करता है।
नारायणपुर के मधुरापुर जहाज घाट की यह तस्वीर ग्रामीण बुनियादी ढांचे की पोल खोलती है। हर साल बाढ़ और जलस्तर बढ़ने के दौरान दियारा वासियों को इस तरह की नरकीय पीड़ा से गुजरना पड़ता है। स्थानीय किसानों, पशुपालकों और पंचायत के लोगों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि इस संवेदनशील मार्ग पर आवागमन को सुगम बनाने के लिए तत्काल प्रभाव से सरकारी स्तर पर बड़ी नावों की पुख्ता व्यवस्था की जाए तथा भविष्य के लिए कोई स्थायी समाधान ढूंढा जाए, ताकि अन्नदाताओं को इस प्रकार की जानलेवा परेशानियों का सामना न करना पड़े।