संघर्ष की भट्ठी से निकलकर चमके बिहार के लाल: ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने जीता कांस्य पदक
पटना/ग्लासगो: स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल (Commonwealth Games) के मंच पर भारत के लिए गर्व और ऐतिहासिक पल आया है। बिहार के नालंदा जिले के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाले दिव्यांग पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और कठोर संघर्ष के बल पर देश का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया है। झंडू ने पुरुषों के हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक (Bronze Medal) हासिल किया है और राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का खाता खोला है।
यह सिर्फ एक पदक भर नहीं है, बल्कि यह उस इंसान की कहानी है जिसने गरीबी, शारीरिक अक्षमता और सामाजिक ताने-बाने को पीछे छोड़ते हुए अपनी मेहनत के दम पर सफलता की एक नई इबारत लिखी है।
अभावों से भरा शुरुआती जीवन और पोलियो का संघर्ष
बिहार के नालंदा जिले के हरनौत क्षेत्र के रहने वाले झंडू कुमार का जीवन शुरू से ही संघर्षों की भट्ठी में तपता रहा है। बचपन में ही पोलियो की चपेट में आ जाने के कारण उनके पैरों की ताकत प्रभावित हुई, लेकिन उन्होंने अपनी इस लाचारी को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
झंडू का परिवार बेहद साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर है। उनके पिता रामानंद पासवान एक सब्जी विक्रेता हैं। परिवार का पेट पालने और घर की माली हालत सुधारने के लिए झंडू ने शुरुआती दिनों में अपने पिता का हाथ बंटाया। वे हरनौत बाजार में ठेले पर सब्जियां बेचने से लेकर तड़के सुबह उठकर मंडियों से सब्जियां लाने तक का काम करते थे।
गुजारे के लिए चलाई ई-रिक्शा, पैसों के लिए बेचना पड़ा एकमात्र सहारा
जिंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए झंडू ने हरसंभव मेहनत की। कोविड-19 महामारी और उसके बाद के कठिन दौर में जब आर्थिक संकट गहराया, तो परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्होंने सड़कों पर ई-रिक्शा तक चलाया। एक तरफ शरीर की दिव्यांगता और दूसरी तरफ पेट की आग बुझाने की जद्दोजहद, लेकिन इन सबके बीच उनके भीतर का खिलाड़ी कभी मरा नहीं।
खेल के प्रति उनका जुनून इतना गहरा था कि जब उन्हें अपने जिम, डायट और प्रतियोगिताओं के सफर के लिए पैसों की सख्त जरूरत पड़ी, तो उन्होंने साल 2023 में अपना ई-रिक्शा तक बेच दिया। जीवन के उस मोड़ पर यह एक बहुत बड़ा जुआ था, लेकिन उनके हौसले ने उन्हें टूटने नहीं दिया।
खेल जगत में प्रवेश और टर्निंग पॉइंट
झंडू ने अपने खेल करियर की शुरुआत साल 2017 में पैरा एथलेटिक्स से की थी। शुरुआत में उन्होंने शॉट पुट (गोला फेंक) और डिस्कस थ्रो (चक्र क्षेपण) जैसी स्पर्धाओं में हाथ आजमाया और जिला व राज्य स्तर पर अपनी पहचान बनाई। हालांकि, जिम में स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के दौरान उनकी शारीरिक ताकत को देखकर स्थानीय कोचों ने उन्हें पावरलिफ्टिंग की तरफ रुख करने की सलाह दी।
यहीं से उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ आया। देश के जाने-माने पैरालिम्पियन और मेडलिस्ट राजिंदर सिंह राहेलु की नजर जब झंडू की क्षमता पर पड़ी, तो उन्होंने उन्हें तराशने का बीड़ा उठाया। राहेलु के मार्गदर्शन में झंडू स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (SAI) के गांधीनगर स्थित नेशनल सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस पहुँचे, जहाँ उनके खेल को पेशेवर दिशा मिली।
इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। खेलो इंडिया पैरा गेम्स और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उन्होंने लगातार शानदार प्रदर्शन करते हुए कई राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़े। बीजिंग वर्ल्ड कप और एशिया-ओशिनिया चैंपियनशिप में भी पदक जीतकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाई।
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में ऐतिहासिक सफलता
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में पुरुषों के हेवीवेट वर्ग में खेलते हुए झंडू कुमार ने अपने शुरुआती प्रयासों में बेहतरीन नियंत्रण दिखाया। उन्होंने अपनी पहली कोशिश में 181 किलोग्राम और दूसरे प्रयास में 190 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाकर 130.9 अंक हासिल किए। हालांकि तीसरे प्रयास में उन्होंने 196 किलोग्राम वजन उठाने का जोखिम भरा और रिकॉर्ड प्रयास किया, जिसे वे पूरा नहीं कर सके, लेकिन उनका 190 किग्रा का प्रयास उन्हें पोडियम पर तीसरा स्थान दिलाने के लिए पर्याप्त साबित हुआ।
इस प्रकार उन्होंने कांस्य पदक जीतकर न केवल राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का खाता खोला, बल्कि पैरा पावरलिफ्टिंग में देश को ऐतिहासिक गौरव दिलाया।
देश भर में जश्न और प्रधानमंत्री मोदी की बधाई
इस ऐतिहासिक जीत के बाद बिहार के नालंदा से लेकर पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया के माध्यम से झंडू कुमार को बधाई देते हुए उनके संघर्ष और जज्बे को सलाम किया है। पीएम मोदी ने कहा कि झंडू की यह सफलता असीम दृढ़ संकल्प, अनुशासन और वर्षों की कड़ी मेहनत का परिणाम है, जो देश के करोड़ों युवाओं को प्रेरित करती है।
जीत के बाद भावुक हुए झंडू कुमार ने कहा, "जब मैं तिरंगे को देखता हूँ और पोडियम पर खड़ा होता हूँ, तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मानो मैं आसमान में उड़ रहा हूँ। यह मेरे जीवन का सबसे खूबसूरत पल है।" सब्जी बेचने और ई-रिक्शा चलाने से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों के पदक तक का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो हर मुश्किल को पार किया जा सकता है।