BTSC दंत चिकित्सक बहाली में लंबी प्रशासनिक सुस्ती से मेधावी युवाओं का भविष्य अधर में; दस्तावेज सत्यापन के महीनों बाद भी अंतिम मेधा सूची लंबित, पीजी सीटें छोड़ने वाले डॉक्टर सड़कों पर

भागलपुर, मुख्य संवाददाता: बिहार तकनीकी सेवा आयोग (BTSC) की लचर कार्यशैली और प्रशासनिक उदासीनता के कारण एक बार फिर राज्य के योग्य और मेधावी युवाओं का भविष्य खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। भागलपुर सहित पूरे बिहार में दंत चिकित्सक (Dental Surgeon) के पदों पर नियुक्ति के लिए आयोजित भर्ती प्रक्रिया के तहत दस्तावेज सत्यापन (Document Verification) का कार्य संपन्न हुए कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद अब तक अंतिम मेधा सूची (Final Merit List) और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह से लंबित है। इस अकारण हो रही देरी से परेशान अभ्यर्थियों में भारी रोष व्याप्त है। बेरोजगार घूम रहे युवा डॉक्टरों का दर्द है कि इस लंबी और अनिश्चित प्रशासनिक प्रक्रिया के चक्कर में उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा यानी एमडीएस (MDS - Master of Dental Surgery) की बेहद मूल्यवान पीजी सीटें तक छोड़ दी थीं, और अब वे न तो उच्च अध्ययन कर पा रहे हैं और न ही उन्हें सरकारी नौकरी मिल रही है, जिससे उनका पूरा करियर बर्बाद होने की कगार पर पहुंच गया है।

क्या है पूरा मामला और कब शुरू हुई थी प्रक्रिया?

बिहार तकनीकी सेवा आयोग (BTSC) द्वारा राज्य के सरकारी अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों और चिकित्सा महाविद्यालयों में दंत चिकित्सकों के रिक्त पदों को भरने के लिए विज्ञापन निकाला गया था। इस भर्ती प्रक्रिया के तहत लिखित परीक्षा या अकादमिक योग्यताओं के आधार पर शॉर्टलिस्ट किए गए अभ्यर्थियों का कागजी सत्यापन यानी डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन का कार्य महीनों पहले सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया था।

उस दौरान अभ्यर्थियों में इस बात की गहरी उम्मीद जगी थी कि सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के तुरंत बाद आयोग द्वारा अंतिम मेधा सूची जारी कर दी जाएगी और उन्हें नियुक्ति पत्र सौंप दिए जाएंगे।

लेकिन, महीनों बीत जाने के बाद भी आयोग की ओर से फाइनल मेरिट लिस्ट जारी करने को लेकर कोई आधिकारिक और स्पष्ट घोषणा नहीं की गई है, जिससे चयनित होने की उम्मीद लगाए बैठे डॉक्टरों में निराशा, हताशा और मानसिक तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

अभ्यर्थियों का दर्द: एमडीएस की पीजी सीटें छोड़ने का मलाल और पछतावा

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा और अमानवीय संकट उन डॉक्टरों के सामने खड़ा हो गया है जिन्होंने चयन की आस में अपने उच्च शैक्षणिक भविष्य का बलिदान दे दिया। पीड़ित अभ्यर्थियों ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया:

सीटें छोड़ने की विवशता: कई योग्य दंत चिकित्सकों का चयन उस समय देश या राज्य के विभिन्न प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों में एमडीएस (MDS) जैसे उच्च पीजी कोर्सेज के लिए भी हो चुका था। लेकिन बीटीएससी की इस भर्ती में चयन की पक्की उम्मीद और यह मानकर कि प्रक्रिया जल्द पूरी हो जाएगी, उन्होंने अपनी पीजी की सीटें छोड़ दीं।

करियर दांव पर लगना: चिकित्सा शिक्षा के नियमों के मुताबिक, एक बार पीजी की सीट छोड़ देने के बाद दोबारा उसी सत्र में प्रवेश पाना असंभव होता है। अब जबकि बीटीएससी की बहाली फाइलों में उलझकर रह गई है, तो वे न तो स्पेशलिस्ट डॉक्टर (पोस्ट ग्रेजुएट) बन पाए और न ही उन्हें सरकारी नौकरी मिल रही है।

बेरोजगारी और मानसिक शोषण का दंश: एक लंबी समयावधि से कोई आय न होने, उम्र की सीमा पार होने का डर और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के अवसर हाथ से निकलते देख युवा डॉक्टरों का मानसिक उत्पीड़न हो रहा है। परिवार और समाज के सामने उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है।

प्रशासनिक उदासीनता और आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के दावे भले ही बड़े-बड़े मंचों से किए जाते हों, लेकिन धरातल पर नियुक्ति प्रक्रियाओं की रफ्तार कछुए की चाल से भी धीमी है। जानकारों और शिक्षाविदों का मानना है कि यदि आयोग समय पर परीक्षाएं और सत्यापन के बाद परिणाम जारी कर दे, तो राज्य के अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी दूर होगी और युवाओं का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक कारणों या कागजी खानापूर्ति के नाम पर फाइलों को महीनों तक लटकाए रखना एक बेहद गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

भागलपुर और आसपास के जिलों से ताल्लुक रखने वाले कई अभ्यर्थियों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही बीटीएससी द्वारा अंतिम मेधा सूची जारी नहीं की गई, तो वे पटना जाकर आयोग के कार्यालय का जोरदार घेराव करेंगे और जरूरत पड़ने पर न्याय के लिए उच्च न्यायालय (High Court) का दरवाजा खटखटाएंगे।

भागलपुर सहित पूरे बिहार में बीटीएससी द्वारा दंत चिकित्सक भर्ती प्रक्रिया का महीनों से लंबित रहना प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। जिन युवाओं ने देश और राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को संभालने के लिए अपनी उच्च शिक्षा की सीटों का त्याग किया, आज उनके करियर पर तलवार लटक रही है। समय की मांग है कि स्वास्थ्य विभाग और बिहार तकनीकी सेवा आयोग इस अत्यंत संवेदनशील मामले का स्वतः संज्ञान ले, तत्काल अंतिम मेधा सूची जारी करे और पीड़ित दंत चिकित्सकों को उनका हक दिलाते हुए नियुक्ति प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करे।