भागलपुर में 24-25 अक्टूबर को होगा भव्य 'अंगिका महोत्सव', भाषा के सम्मान और अधिकार के लिए छिड़ी नई अलख

भागलपुर: कला, संस्कृति और सभ्यता की पावन धरा भागलपुर एक बार फिर अपनी माटी की भाषा 'अंगिका' के जयघोष से गूंजने के लिए तैयार है। अंग प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और समृद्ध विरासत को सहेजने के उद्देश्य से आगामी 24 और 25 अक्टूबर को दो दिवसीय 'अंगिका महोत्सव' का आयोजन किया गया है। यह आयोजन न केवल एक उत्सव है, बल्कि अंगिका भाषा को उसका संवैधानिक और सामाजिक अधिकार दिलाने की एक दृढ़ कोशिश है।

चिंतन से निकली महोत्सव की राह

यह महोत्सव अचानक आयोजित नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे एक लंबी वैचारिक यात्रा है। कुछ समय पूर्व अंगिका भाषा के विद्वानों, साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों की एक महत्वपूर्ण चिंतन बैठक आयोजित की गई थी। उस बैठक में भाषा की उपेक्षा, उसके गिरते स्तर और भविष्य को लेकर गंभीर चर्चा हुई। वहीं से यह निर्णय लिया गया कि अंगिका को मुख्यधारा में लाने के लिए एक बड़े मंच की आवश्यकता है। यह महोत्सव उसी चिंतन का मूर्त रूप है, जो अंगिका की अस्मिता को नई पहचान दिलाने के लिए समर्पित है।

डॉ. अमरेन्द्र का आह्वान: "अंगिका हमारा मान है"

इस महोत्सव की रूपरेखा तैयार करने में मुख्य भूमिका निभा रहे प्रख्यात विद्वान डॉ. अमरेन्द्र ने अंगिका के भविष्य पर जोर देते हुए कहा:

"अंगिका केवल एक बोली नहीं है, यह अंग प्रदेश के करोड़ों लोगों की धड़कन है। हमने लंबे समय तक इसे नजरअंदाज किया है, लेकिन अब समय आ गया है कि हम अपनी भाषा के अधिकारों के लिए मुखर हों। अंगिका को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाना हमारा अंतिम लक्ष्य है, और यह महोत्सव उस दिशा में हमारा पहला बड़ा कदम है।"

उन्होंने कहा कि भाषा का सम्मान तभी होता है जब उसे शिक्षा, प्रशासन और साहित्य के क्षेत्र में सम्मानजनक स्थान मिलता है। डॉ. अमरेन्द्र ने युवा पीढ़ी से आह्वान किया है कि वे सोशल मीडिया और दैनिक जीवन में अपनी मातृभाषा का गर्व से प्रयोग करें।

महोत्सव का स्वरूप: क्या होगा खास?

दो दिवसीय इस अंगिका महोत्सव को कई सत्रों में विभाजित किया गया है, जो अंगिका संस्कृति के हर पहलू को उजागर करेगा:

साहित्यिक गोष्ठी: पहले दिन अंगिका साहित्य, कविता और गद्य पर गहन विमर्श होगा। इसमें राज्य भर के वरिष्ठ साहित्यकार अपनी रचनाएं साझा करेंगे।

लोक कला और संगीत: अंगिका की पारंपरिक लोक गायकी, जैसे 'बिहुला-विषहरी' की गाथाएं और स्थानीय लोक गीतों की प्रस्तुति महोत्सव का मुख्य आकर्षण होगी।

युवा प्रतिभा मंच: युवा पीढ़ी को जोड़ने के लिए अंगिका स्किट, वाद-विवाद प्रतियोगिता और लघु फिल्म प्रदर्शन का आयोजन किया जाएगा।

भाषा सम्मान: इस दौरान अंगिका भाषा के लिए उल्लेखनीय कार्य करने वाले विशिष्ट व्यक्तियों को 'अंगिका रत्न' से सम्मानित किया जाएगा।

सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण

अंगिका भाषा का इतिहास बेहद प्राचीन है। चंपा नगरी से लेकर आधुनिक भागलपुर तक, इसकी अपनी एक गौरवशाली परंपरा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंगिका को समय रहते सहेजा नहीं गया, तो नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कट जाएगी। यह महोत्सव उन तमाम लोगों के लिए एक साझा मंच है जो मानते हैं कि एक भाषा की मृत्यु का अर्थ एक पूरी संस्कृति का अंत है।

प्रशासनिक और सामाजिक भागीदारी

महोत्सव की सफलता के लिए स्थानीय नागरिकों, बुद्धिजीवियों और स्वयंसेवी संस्थाओं का सहयोग लिया जा रहा है। आयोजन समिति का प्रयास है कि यह कार्यक्रम केवल किसी सभागार तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे शहर में अंगिका का रंग घुले। इसके लिए शहर के मुख्य चौराहों पर होर्डिंग्स, सोशल मीडिया अभियान और स्कूलों-कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

क्यों जरूरी है यह महोत्सव?

अंगिका महोत्सव के आयोजन के पीछे के कारणों को यदि संक्षेप में समझा जाए, तो वे इस प्रकार हैं:

अधिकारों की मांग: केंद्र और राज्य सरकार से अंगिका को उचित स्थान देने की मांग को बुलंद करना।

साहित्यिक सृजन: नई पीढ़ी के लेखकों को प्रोत्साहित करना ताकि अंगिका साहित्य का विस्तार हो सके।

पहचान का संकट: वैश्वीकरण के दौर में अपनी क्षेत्रीय पहचान को बनाए रखने की चुनौती का सामना करना।

 एक नई सुबह की उम्मीद

24 और 25 अक्टूबर को होने वाला यह महोत्सव केवल दो दिनों का खेल नहीं है, बल्कि यह अंगिका भाषा के संघर्ष का एक नया अध्याय है। डॉ. अमरेन्द्र जैसे भाषाविदों की अगुवाई में भागलपुर के लोग एक ऐसी मशाल जला रहे हैं, जिसकी रोशनी दूर-दूर तक जाएगी।

यदि आप अंग प्रदेश की संस्कृति से प्यार करते हैं, तो यह महोत्सव आपके लिए एक अनिवार्य गंतव्य है। उम्मीद है कि यह आयोजन अंगिका को उसके खोए हुए सम्मान को वापस दिलाने में सफल सिद्ध होगा। आने वाले समय में, यह मंच अंगिका के विकास के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है।

अंगिका प्रेमियों के लिए यह महोत्सव एक उत्सव है, एक आंदोलन है और एक गौरव की अनुभूति है। अब देखना यह है कि यह दो दिवसीय महाकुंभ भाषा के प्रति सरकारी और सामाजिक रुख में कितना बड़ा बदलाव ला पाता है।