अंग क्षेत्र में आस्था का महापर्व 'बारी कलश' स्थापना के साथ शुरू हुआ एक माह का विशेष मनसा महापूजन
भागलपुर/नवगछिया: अंग क्षेत्र (भागलपुर और नवगछिया सहित आसपास का इलाका) इन दिनों पूरी तरह से भक्तिमय हो चुका है। लोक आस्था के सबसे बड़े महापर्व के रूप में प्रसिद्ध 'बिहुला-विषहरी' और मनसा पूजा की तैयारियां अपने चरम पर हैं। परंपरा के अनुसार, 'बारी कलश' की स्थापना के साथ ही एक महीने तक चलने वाले विशेष मनसा महापूजन का शुभारंभ हो गया है।
क्या है 'बारी कलश' और इसका महत्व?
अंग क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत में 'बारी कलश' की स्थापना का विशेष महत्व है। यह अनुष्ठान केवल पूजा नहीं, बल्कि क्षेत्र की सुरक्षा और समृद्धि के लिए की जाने वाली एक गहन साधना है। बिहुला-विषहरी की गाथाओं से जुड़ी इस परंपरा के तहत, कुम्हार के घर कलश पूजन के बाद इसे विधिवत मंदिर में स्थापित किया जाता है। इस कलश को माता मनसा (विषहरी) के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है, और इसी के साथ एक महीने तक चलने वाले अनुष्ठानों की शुरुआत होती है।
एक माह की साधना और भक्ति का स्वरूप
17 जुलाई से आरंभ हुआ यह विशेष महापूजन आगामी एक माह तक चलता है। इस दौरान:
दैनिक पूजा-अर्चना: विषहरी मंदिरों में प्रतिदिन कलश पूजन और विशेष मंत्रों का पाठ किया जाता है।
सांस्कृतिक जुड़ाव: इस पर्व के माध्यम से अंग क्षेत्र की प्रसिद्ध 'मंजूषा कला' का भी प्रदर्शन होता है, जिसमें माता बिहुला और बाला लखेंद्र की अमर प्रेम कथा को दर्शाया जाता है।
लोक आस्था: भक्त अपनी सुख-समृद्धि, परिवार की सुरक्षा और सर्पदंश के भय से मुक्ति के लिए माता मनसा की आराधना करते हैं।
सर्पदंश के भय से मुक्ति और माता मनसा की महिमा
माता मनसा, जिन्हें नागों की देवी (नागमाता) कहा जाता है, की पूजा मुख्य रूप से वर्षा ऋतु के दौरान की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि सावन के इस पावन महीने में जब सर्पों का प्रकोप बढ़ जाता है, तब माता मनसा की पूजा भक्तों की रक्षा करती है। उन्हें भगवान शिव की पुत्री और शक्ति का स्वरूप माना गया है, जो न केवल विष का हरण करती हैं, बल्कि भक्तों को संतान और खुशहाली का आशीर्वाद भी देती हैं।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
यह एक माह का विशेष पूजा आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज को एक सूत्र में बांधने का माध्यम भी है। इस दौरान गांव-गांव में लोकगीतों और 'बिहुला-विषहरी' की गाथाओं का गायन होता है, जो अंग प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखता है।
समिति के सदस्यों और कलाकारों का कहना है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। आगामी 17-18 अगस्त तक चलने वाले इस उत्सव में शहर और ग्रामीण इलाकों में दीपदान, भव्य झांकियों और विसर्जन की रस्मों के साथ इसका समापन होगा।