सत्य सनातन वैदिक समाज एवं वैदिक संस्कृति मंच के संयुक्त तत्वावधान में विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर भव्य संगोष्ठी का आयोजन; पर्यावरण संरक्षण को बताया वेदों का मूल आधार
भागलपुर (नाथनगर), विशेष संवाददाता: सिल्क सिटी भागलपुर के ऐतिहासिक क्षेत्र नाथनगर स्थित चैती दुर्गा सामुदायिक भवन के प्रांगण में सनातन संस्कृति के संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जन-जागृति फैलाने के उद्देश्य से एक उच्चस्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सत्य सनातन वैदिक समाज एवं वैदिक संस्कृति मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य केंद्र-बिंदु 'विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस' रहा। इस अवसर पर क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों, वैदिक विद्वानों, पर्यावरण प्रेमियों और युवाओं ने भारी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चार और प्रकृति वंदना के साथ की गई, जिससे पूरा सभागार आध्यात्मिक और पर्यावरण-मय हो उठा।
दीप प्रज्ज्वलन और वैदिक मंत्रों के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ
संगोष्ठी का औपचारिक उद्घाटन उपस्थित प्रख्यात विद्वानों और वक्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया।
वेदों में प्रकृति की वंदना: कार्यक्रम के संयोजक ने अपने प्रारंभिक संबोधन में कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति और वेद-पुराणों में प्रकृति को ही ईश्वर का साक्षात रूप माना गया है। हमारे यहां वृक्षों, नदियों, पर्वतों और वन्यजीवों को पूजने की प्राचीन परंपरा रही है, जो इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति पर्यावरण संरक्षण की सबसे पुरानी और मजबूत पैरोकार है।
सामुदायिक भवन में गूंजा पर्यावरण का संदेश: चैती दुर्गा स्थान जैसे पवित्र और ऐतिहासिक स्थल पर आयोजित इस गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है, तब वेदों और प्राचीन भारतीय जीवनशैली की ओर लौटना ही एकमात्र समाधान है।
वक्ताओं के विचार: "प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि उसका संवर्द्धन आवश्यक है"
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए विभिन्न वक्ताओं ने प्रकृति और मानव के बीच के अटूट रिश्ते पर विस्तृत प्रकाश डाला:
ऋषि-मुनियों की परंपरा: वक्ताओं ने कहा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने वनों में रहकर ही ज्ञान की प्राप्ति की और प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए जीवनभर संदेश दिए। आज आधुनिकता की अंधी दौड़ में इंसान प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहा है, जिसके परिणाम हमारे सामने भयंकर सूखे, बाढ़ और बेमौसम बरसात के रूप में आ रहे हैं।
पंचतत्वों का संतुलन: वैदिक संस्कृति मंच के प्रतिनिधियों ने कहा कि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु—ये पांचों तत्व ही जीवन के आधार हैं। यदि इनमें से एक भी तत्व असंतुलित होता है, तो संपूर्ण मानवता संकट में पड़ जाएगी। इसलिए हम सबका यह नैतिक कर्तव्य बनता है कि हम जल बचाएं, अधिक से अधिक पौधे लगाएं और प्लास्टिक मुक्त पर्यावरण का संकल्प लें।
युवाओं और नागरिकों को ली गई पर्यावरण संरक्षण की शपथ
कार्यक्रम के अंत में एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें उपस्थित सभी युवाओं, विद्यार्थियों और स्थानीय नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई गई:
वे अपने जीवन के हर मांगलिक अवसर पर एक नया पौधा लगाएंगे और उसकी पूरी देखरेख करेंगे।
दैनिक जीवन में जल की एक-एक बूंद को सहेजेंगे और जल संरक्षण के पारंपरिक स्रोतों (जैसे कुओं और तालाबों) को बचाने का प्रयास करेंगे।
पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले प्लास्टिक और अन्य हानिकारक पदार्थों के उपयोग से तौबा करेंगे।
नाथनगर के चैती दुर्गा सामुदायिक भवन में सत्य सनातन वैदिक समाज और वैदिक संस्कृति मंच द्वारा आयोजित यह संगोष्ठी समाज को एक बेहद सकारात्मक और समयोचित संदेश देने में पूरी तरह सफल रही। इस आयोजन ने न केवल लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया, बल्कि यह भी याद दिलाया कि हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति में ही आधुनिक समय की तमाम बड़ी समस्याओं का समाधान छिपा हुआ है।