भागलपुर में लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान का असर कच्ची कांवरिया पथ और आसपास के इलाकों को बनाया जा रहा ‘स्वच्छता मॉडल’, मिशन मोड में काम
भागलपुर : बिहार सरकार के महत्वाकांक्षी 'लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान' (LSBA) के तहत भागलपुर प्रशासन ने अब सुल्तानगंज से देवघर तक जाने वाले सुप्रसिद्ध कच्ची कांवरिया पथ और उसके आसपास के क्षेत्रों में स्वच्छता का एक नया अध्याय लिखने की ठान ली है। श्रावणी मेला और कांवरियों के आवागमन को ध्यान में रखते हुए, इस पूरे रूट को न केवल कचरा मुक्त रखने, बल्कि इसे एक 'स्वच्छता मॉडल' के रूप में विकसित करने की दिशा में युद्धस्तर पर कार्य शुरू कर दिया गया है। जिला प्रशासन ने इस मिशन को सफल बनाने के लिए स्वच्छता दूतों और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय स्थापित कर निगरानी बढ़ा दी है।
अभियान का मुख्य उद्देश्य: 'स्वच्छ कांवरिया पथ, स्वस्थ यात्रा'
कच्ची कांवरिया पथ का विशेष महत्व है, जहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु नंगे पैर अपनी यात्रा पूरी करते हैं। इस मार्ग की स्वच्छता सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती और जिम्मेदारी दोनों है:
कचरा मुक्त मार्ग: इस अभियान के अंतर्गत कच्ची कांवरिया पथ के दोनों किनारों से हर प्रकार के प्लास्टिक, डिस्पोजेबल और अन्य कचरे को हटाने के लिए विशेष टीमों का गठन किया गया है।
प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध: कांवरिया पथ के आसपास प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए प्रशासन ने कड़े निर्देश जारी किए हैं। दुकानों और सेवा शिविरों को निर्देश दिया गया है कि वे केवल पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) सामग्रियों का उपयोग करें।
ठोस और तरल कचरा प्रबंधन: लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत रूट पर स्थित गांवों में ठोस और तरल कचरा प्रबंधन की व्यवस्था को सुदृढ़ किया जा रहा है। इसके लिए प्रत्येक निश्चित दूरी पर कचरा संग्रहण बिंदु (Waste Collection Points) बनाए गए हैं।
मिशन मोड में कार्ययोजना: प्रशासन की मुस्तैदी
जिला प्रशासन ने इस स्वच्छता अभियान को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए त्रि-स्तरीय कार्ययोजना बनाई है:
स्वच्छता कर्मियों की तैनाती: कांवरिया पथ के पूरे मार्ग पर सफाई कर्मियों की तैनाती की गई है, जो तीन पालियों (Shifts) में कार्य कर रहे हैं। विशेष रूप से रात के समय जब श्रद्धालुओं की भीड़ कम होती है, तब गहन सफाई अभियान चलाया जाता है।
जागरूकता अभियान: स्वच्छता के प्रति श्रद्धालुओं और स्थानीय ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए जगह-जगह होर्डिंग्स, पोस्टर और लाउडस्पीकर के माध्यम से संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं। लोगों से अपील की जा रही है कि वे रास्ते में कहीं भी गंदगी न फैलाएं।
निगरानी और फीडबैक: अभियान की मॉनिटरिंग के लिए एक विशेष कंट्रोल रूम बनाया गया है। स्वच्छता दूतों को तैनात किया गया है जो हर दिन कचरा उठाव और सफाई व्यवस्था की रिपोर्ट जिला मुख्यालय को सौंप रहे हैं।
स्थानीय निकायों और स्वयंसेवकों की भूमिका
इस अभियान में केवल सरकारी तंत्र ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं का भी बड़ा योगदान है:
ग्राम पंचायतों का सहयोग: कांवरिया पथ के किनारे बसे गांवों की पंचायतों को 'मॉडल गांव' बनाने का लक्ष्य रखा गया है। ग्राम पंचायतों को सफाई के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं।
सेवा शिविरों की जिम्मेदारी: मार्ग पर चलने वाले विभिन्न सेवा शिविरों को यह निर्देश दिया गया है कि वे अपने शिविर से निकलने वाले कचरे का निपटारा स्वयं करें। प्रशासन ने शिविर संचालकों को डस्टबिन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
चुनौतियां और समाधान
इतने विशाल स्तर पर स्वच्छता बनाए रखना सरल नहीं है, विशेषकर जब श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में हो:
चुनौती: भारी भीड़ के दौरान रास्तों पर डिस्पोजेबल बर्तनों और पानी की बोतलों का ढेर लग जाता है।
समाधान: प्रशासन ने इसे देखते हुए 'जीरो वेस्ट' (Zero Waste) मॉडल की ओर कदम बढ़ाए हैं। श्रद्धालुओं को स्टील के बर्तनों या पत्तलों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
जिला प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान का उद्देश्य केवल सफाई करना नहीं, बल्कि स्वच्छता को अपनी संस्कृति बनाना है। कच्ची कांवरिया पथ पर देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं, ऐसे में यह मार्ग स्वच्छ होना न केवल हमारी धार्मिक जिम्मेदारी है बल्कि यह बिहार की छवि का भी प्रश्न है। हम अगले कुछ हफ्तों में इस मार्ग को पूरी तरह कचरा मुक्त देखने के प्रति आश्वस्त हैं।”
भागलपुर जिला प्रशासन की यह पहल निश्चित रूप से सराहनीय है। कच्ची कांवरिया पथ को लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान से जोड़कर न केवल पर्यावरण की रक्षा की जा रही है, बल्कि लाखों शिव भक्तों की यात्रा को भी सुगम और सुखद बनाया जा रहा है। यह स्वच्छता मिशन यदि अपनी निरंतरता बनाए रखता है, तो यह आने वाले समय में अन्य तीर्थ मार्गों के लिए भी एक आदर्श साबित होगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि आगामी त्योहारों के सीजन में यह स्वच्छता मॉडल कितना प्रभावी सिद्ध होता है।