बिहार की वित्तीय स्थिति पर सियासी घमासान: क्या सच में खाली है सरकार का खजाना? CAG और बजट के आंकड़ों से समझिए पूरी तस्वीर
पटना। बिहार की वित्तीय स्थिति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि राज्य का खजाना खाली हो चुका है और वित्तीय स्थिति बेहद खराब है। उनका आरोप है कि कर्मचारियों के वेतन और पेंशन के भुगतान के लिए भी सरकार को आपातकालीन फंड का सहारा लेना पड़ रहा है। जून 2026 में भी तेजस्वी यादव ने राज्य की वित्तीय स्थिति पर सवाल उठाते हुए दावा किया था कि वेतन और पेंशन भुगतान में परेशानी आ रही है और सरकार ने पेंशन के लिए करीब 3,662 करोड़ रुपये की आकस्मिक निधि से राशि निकालने का निर्णय लिया।
इन आरोपों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार वास्तव में वित्तीय संकट के ऐसे दौर में पहुंच गया है जहां सरकार के पास नियमित खर्च चलाने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है? या फिर यह विपक्ष की ओर से सरकार पर राजनीतिक हमला है? इसका जवाब केवल राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि बजट, राजस्व, राजकोषीय घाटे और सरकार के वास्तविक वित्तीय आंकड़ों को देखकर ही समझा जा सकता है।
बजट के आंकड़े क्या कहते हैं?
बिहार के 2026-27 के बजट के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर पूरी तरह "खजाना खाली" होने वाली नहीं दिखती। PRS Legislative Research के बजट विश्लेषण के अनुसार 2026-27 में राज्य की उधारी को छोड़कर कुल प्राप्तियां करीब 2.86 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। राज्य ने इस वित्त वर्ष में राजस्व खाते में करीब 1,143 करोड़ रुपये के मामूली सरप्लस का लक्ष्य रखा है। वहीं राजकोषीय घाटा यानी Fiscal Deficit करीब 39,112 करोड़ रुपये, या GSDP का लगभग 3 फीसदी, रखने का लक्ष्य है।
इससे स्पष्ट है कि सरकार ने बजट बनाते समय राज्य को ऐसे वित्तीय ढांचे में रखा है जिसमें आय और खर्च के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। इसलिए बजट के स्तर पर बिहार को दिवालिया या पूरी तरह खाली खजाने वाला राज्य कहना आंकड़ों से सीधे साबित नहीं होता।
लेकिन कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा 2025-26 के संशोधित अनुमानों में दिखाई देता है।
2025-26 में बढ़ा था राजकोषीय दबाव
PRS के विश्लेषण के मुताबिक 2025-26 के संशोधित अनुमानों में बिहार का राजस्व घाटा लगभग 76,315 करोड़ रुपये, यानी GSDP का 6.7 फीसदी अनुमानित किया गया था। इसी अवधि में राजकोषीय घाटा लगभग 11.8 फीसदी GSDP तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया, जो शुरुआती बजट अनुमान में रखे गए 3 फीसदी लक्ष्य से काफी अधिक था।
यही आंकड़ा विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक बहस में ताकत देता है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि बजट अनुमान, संशोधित अनुमान और वास्तविक खर्च अलग-अलग चीजें हैं। किसी वित्त वर्ष के दौरान योजनाओं, केंद्र से मिलने वाले संसाधनों, व्यय की गति और अन्य वित्तीय परिस्थितियों के कारण आंकड़े बदल सकते हैं।
इसलिए एक साल के संशोधित अनुमान को देखकर यह निष्कर्ष निकालना भी सही नहीं होगा कि राज्य की वित्तीय व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।
आकस्मिक निधि से पैसा निकालने का मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?
तेजस्वी यादव ने खास तौर पर सरकार द्वारा आकस्मिक निधि से राशि लेने को मुद्दा बनाया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पेंशन भुगतान के लिए करीब 3,662 करोड़ रुपये की राशि आकस्मिक निधि से लेने के फैसले पर उन्होंने सवाल उठाया और इसे वित्तीय संकट का संकेत बताया।
आकस्मिक निधि सरकार के पास उपलब्ध एक ऐसी व्यवस्था है जिसका इस्तेमाल अप्रत्याशित या तत्काल जरूरतों में किया जा सकता है। इसलिए केवल आकस्मिक निधि से राशि लेने का मतलब यह नहीं है कि राज्य दिवालिया हो गया है। लेकिन यदि नियमित बजटीय प्रावधानों के बजाय बार-बार ऐसी व्यवस्था का सहारा लेना पड़े, तो यह सरकार के नकदी प्रबंधन और खर्च की समयबद्धता पर सवाल जरूर खड़े कर सकता है।
यही वजह है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस इतनी तेज हुई है।
क्या वेतन और पेंशन के भुगतान में संकट है?
तेजस्वी यादव का दावा है कि कर्मचारियों के वेतन और पेंशन के भुगतान में संकट की स्थिति बनी हुई है। जून में सामने आई रिपोर्टों में उन्होंने दावा किया था कि पिछले कई महीनों से वेतन और पेंशन भुगतान प्रभावित हुआ है।
हालांकि, ऐसे दावों की गंभीरता को समझने के लिए सरकार की ओर से भुगतान की वास्तविक स्थिति, विभागवार बकाया और ट्रेजरी से जारी भुगतान के आंकड़ों को देखना जरूरी होगा।
किसी राज्य की वित्तीय स्थिति खराब होने का एक संकेत यह हो सकता है कि सरकार नियमित खर्चों को समय पर पूरा नहीं कर पा रही हो। लेकिन केवल राजनीतिक बयान के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरे राज्य का खजाना खाली है।
CAG की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
राज्य की वित्तीय स्थिति समझने में Comptroller and Auditor General of India यानी CAG की रिपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण होती है। CAG सरकार की आय, खर्च, कर्ज, घाटे और वित्तीय प्रबंधन की जांच करता है।
बिहार की पुरानी CAG रिपोर्टों में राजस्व और वित्तीय प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख मिलता रहा है। उदाहरण के लिए, एक CAG रिपोर्ट में राज्य के प्राथमिक घाटे और गैर-कर्ज प्राप्तियों की स्थिति पर टिप्पणी की गई थी।
लेकिन यहां यह अंतर समझना भी जरूरी है कि पुरानी CAG रिपोर्ट को सीधे 2026 की वर्तमान वित्तीय स्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। किसी भी निष्कर्ष के लिए नवीनतम उपलब्ध CAG रिपोर्ट और संबंधित वित्त वर्ष के वास्तविक खातों को देखना जरूरी है।
बिहार की अर्थव्यवस्था में एक विरोधाभास
बिहार की वित्तीय स्थिति में एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ राज्य का बजट आकार लगातार बड़ा हो रहा है और सरकार बड़े पैमाने पर विकास योजनाओं पर खर्च कर रही है। दूसरी तरफ राजस्व संग्रह, प्रतिबद्ध खर्च, वेतन-पेंशन और कर्ज से जुड़े दायित्व सरकार पर लगातार दबाव डालते हैं।
2026-27 में राज्य ने करीब 3 फीसदी GSDP के आसपास राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखा है। यह संकेत देता है कि सरकार वित्तीय अनुशासन बनाए रखने का लक्ष्य लेकर चल रही है।
वहीं 2025-26 के संशोधित अनुमानों में घाटे के काफी ऊपर जाने का अनुमान यह दिखाता है कि वास्तविक वित्तीय प्रबंधन में चुनौतियां मौजूद हैं।
कर्ज और ब्याज भुगतान भी बड़ी चुनौती
राज्य की वित्तीय स्थिति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि सरकार के खाते में कितनी राशि है। सरकार पर कितना कर्ज है और उस कर्ज के ब्याज के भुगतान में कितनी राशि जा रही है, यह भी महत्वपूर्ण है।
बिहार जैसे राज्य के लिए विकास योजनाओं को जारी रखने के साथ-साथ वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और अन्य अनिवार्य खर्चों का प्रबंधन करना बड़ी चुनौती है।
यदि राजस्व की तुलना में प्रतिबद्ध खर्च तेजी से बढ़ता है तो सरकार के पास नई योजनाओं और विकास कार्यों के लिए उपलब्ध वित्तीय गुंजाइश सीमित हो सकती है।
विपक्ष का आरोप बनाम बजट का दावा
तेजस्वी यादव का आरोप है कि राज्य गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रहा है। दूसरी ओर बजट के आधिकारिक लक्ष्यों को देखें तो सरकार ने 2026-27 में राजस्व सरप्लस और लगभग 3 फीसदी राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखा है।
इसलिए दोनों तस्वीरों को साथ रखकर देखना जरूरी है।
इससे साफ है कि "वित्तीय दबाव" और "खजाना पूरी तरह खाली" दो अलग-अलग बातें हैं।
असली चुनौती नकदी प्रबंधन की हो सकती है
राज्य सरकार के लिए केवल सालाना बजट संतुलित रखना पर्याप्त नहीं है। उसे साल के हर महीने अपने खर्च और प्राप्तियों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
यदि किसी समय सरकारी प्राप्तियां अपेक्षा के अनुसार नहीं आतीं, लेकिन वेतन, पेंशन और अन्य अनिवार्य खर्च समय पर करने होते हैं, तो सरकार को नकदी प्रबंधन के लिए उपलब्ध विभिन्न वित्तीय व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।
इसलिए आकस्मिक निधि का इस्तेमाल यदि हुआ भी है, तो उसके पीछे की पूरी वित्तीय प्रक्रिया और बाद में उसका समायोजन देखना आवश्यक होगा।
क्या बिहार दिवालिया होने की स्थिति में है?
उपलब्ध बजटीय आंकड़ों के आधार पर अभी यह कहना उचित नहीं होगा कि बिहार दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच गया है। 2026-27 के बजट में सरकार ने राजस्व सरप्लस और लगभग 3 फीसदी राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखा है।
लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि राज्य की वित्तीय चुनौतियां नहीं हैं। 2025-26 के संशोधित अनुमानों में राजस्व घाटे और राजकोषीय घाटे में बड़ा उछाल दिखता है।
इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यह होगा कि बिहार वित्तीय दबाव और प्रबंधन की चुनौतियों से जूझ रहा है, लेकिन उपलब्ध बजटीय आंकड़े अपने आप में राज्य को "खाली खजाने" या दिवालिया स्थिति में नहीं दिखाते।
तेजस्वी यादव के बयान ने बिहार की वित्तीय स्थिति पर महत्वपूर्ण बहस जरूर छेड़ दी है। वेतन और पेंशन भुगतान के लिए आकस्मिक निधि से राशि लेने का मुद्दा सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़े करता है और इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है। वहीं 2026-27 के बजट के आंकड़े बताते हैं कि सरकार ने राजस्व सरप्लस और लगभग 3 फीसदी राजकोषीय घाटे का लक्ष्य निर्धारित किया है।
दूसरी ओर, 2025-26 के संशोधित अनुमानों में राजस्व और राजकोषीय घाटे का काफी बढ़ जाना यह जरूर दिखाता है कि राज्य के वित्त पर दबाव रहा है। इसलिए इस पूरे मुद्दे को केवल "खजाना खाली है" या "कोई वित्तीय समस्या नहीं है" जैसे दो अतिवादी दावों में बांटना सही नहीं होगा।
बिहार की वास्तविक वित्तीय तस्वीर को समझने के लिए तीन चीजें सबसे महत्वपूर्ण होंगी—नवीनतम CAG के वास्तविक खाते, सरकार की ट्रेजरी और भुगतान स्थिति तथा 2025-26 के अंतिम वास्तविक आंकड़े। इन्हीं से यह तय होगा कि मौजूदा समस्या वास्तव में संरचनात्मक वित्तीय संकट है या कुछ समय के लिए पैदा हुई नकदी प्रबंधन की चुनौती।