17 जुलाई को समाहरणालय के समक्ष होगा महाधरना, वेतन-पेंशन की मांग को लेकर आर-पार की लड़ाई

सन्हौला (भागलपुर): भागलपुर जिले के सन्हौला और आसपास के क्षेत्रों के वित्तरहित शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों ने अब अपनी मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अपनी वर्षों पुरानी लंबित मांगों के समर्थन में आगामी 17 जुलाई को जिले के सभी वित्तरहित शिक्षक और कर्मचारी भागलपुर समाहरणालय के समक्ष एक दिवसीय महाधरना देंगे। इस प्रदर्शन को लेकर सन्हौला क्षेत्र के शिक्षकों में भारी आक्रोश है और उन्होंने इसे 'अस्तित्व की लड़ाई' करार दिया है।

मुख्य मांगें: संघर्ष का आधार

शिक्षक संगठनों का कहना है कि वे पिछले कई दशकों से बिहार में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं, लेकिन सरकार की उपेक्षा के कारण उनका जीवन अभावों में बीत रहा है। इस महाधरना के माध्यम से वे सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाना चाहते हैं। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

वित्तरहित कॉलेजों का पूर्ण अधिग्रहण: शिक्षकों की सबसे बड़ी मांग प्रदेश के सभी वित्तरहित शिक्षण संस्थानों का सरकार द्वारा पूर्ण अधिग्रहण करना है, ताकि उन्हें पूर्णकालिक शिक्षक का दर्जा मिल सके।

अनुदान के बदले वेतनमान: वर्षों से चली आ रही अनुदान पद्धति को समाप्त कर, उन्हें समान कार्य के बदले समान वेतन (वेतनमान) देने की मांग की गई है। शिक्षकों का तर्क है कि अनुदान की राशि न केवल ऊंट के मुंह में जीरा के समान है, बल्कि इसका भुगतान भी कई वर्षों तक लंबित रहता है।

सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए पेंशन: जो कर्मचारी वर्षों तक अपनी सेवाएं देने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उनके बुढ़ापे का सहारा बनने के लिए सरकार से पेंशन निर्धारित करने की मांग की गई है।

सेवा शर्त नियमावली: शिक्षकों के लिए एक स्पष्ट सेवा शर्त नियमावली बनाने की मांग की गई है, ताकि भविष्य सुरक्षित हो सके।

सन्हौला के शिक्षकों में आक्रोश

बैठक के दौरान सन्हौला के शिक्षकों ने कहा कि सरकार हर बार आश्वासन देती है, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं होता। एक वरिष्ठ शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "हमारा जीवन आधी उम्र से ज्यादा शिक्षण कार्य में बीत गया है। हमारे बच्चे आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं क्योंकि हमें समय पर वेतन नहीं मिलता। क्या एक शिक्षक का सम्मान यही है कि वह अपनी ही मांगों के लिए सड़क पर उतरे?"

शिक्षकों का यह भी कहना है कि वे इस बार अपनी मांगों पर किसी भी प्रकार के 'खोखले आश्वासन' से संतुष्ट नहीं होंगे। जब तक सरकार ठोस कार्रवाई की घोषणा नहीं करती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

आंदोलन की रूपरेखा: समाहरणालय घेराव की तैयारी

17 जुलाई को होने वाले इस महाधरना में भागलपुर के विभिन्न प्रखंडों से सैकड़ों की संख्या में शिक्षक और कर्मचारी समाहरणालय पहुंचेंगे। संगठन के पदाधिकारियों ने बताया कि:

प्रदर्शन: समाहरणालय परिसर के बाहर शिक्षक जोरदार प्रदर्शन करेंगे और अपनी मांगों का ज्ञापन जिलाधिकारी (DM) को सौंपेंगे।

रणनीति: अगर प्रशासन की ओर से सकारात्मक पहल नहीं की गई, तो जिला स्तर के बाद राज्य स्तर पर बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी।

अनुशासन: धरने के दौरान शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी जाएगी, लेकिन सरकार को चेतावनी दी जाएगी कि यदि उनकी अनदेखी जारी रही, तो शिक्षण कार्य ठप करना उनकी मजबूरी होगी।

शिक्षा जगत पर प्रतिकूल प्रभाव

जानकारों का मानना है कि यदि सरकार ने वित्तरहित शिक्षकों की मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो इसका सीधा असर बिहार के उच्च शिक्षा पर पड़ेगा। बिहार में एक बड़ा वर्ग वित्तरहित कॉलेजों के माध्यम से ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहा है। ऐसे में शिक्षकों का हताश होना शिक्षा की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित कर रहा है।

प्रशासनिक रुख और उम्मीद

समाहरणालय के समक्ष होने वाले इस धरने की सूचना मिलते ही जिला प्रशासन भी सतर्क हो गया है। हालांकि, शिक्षकों का कहना है कि वे केवल अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से रखना चाहते हैं।

सम्मानजनक समाधान की दरकार

सन्हौला के इन कर्मचारियों का आंदोलन इस बात को दर्शाता है कि अब शिक्षा के क्षेत्र में भी 'बदलाव' की हवा बह रही है। कर्मचारी केवल अनुदान नहीं, बल्कि 'सम्मान और सुरक्षा' चाहते हैं। अब गेंद सरकार के पाले में है। क्या सरकार 17 जुलाई के इस प्रदर्शन से पहले कोई संवाद का रास्ता खोलेगी, या फिर शिक्षकों को भीषण गर्मी और अनिश्चितता के बीच सड़क पर ही डटे रहना पड़ेगा?

पूरा जिला, विशेषकर छात्र और अभिभावक भी इस आंदोलन पर नजरें टिकाए हुए हैं, क्योंकि शिक्षा व्यवस्था की सुदृढ़ता के लिए शिक्षकों का मनोबल और उनका आर्थिक रूप से सुरक्षित होना अनिवार्य है।