बिहार में खाद्य सुरक्षा पर बड़ा खतरा: बाजार से लिए गए हल्दी के 31 प्रतिशत नमूने जांच में फेल, हर तीसरे घर में पहुंच रही है मिलावटी हल्दी
बिहार के रसोईघरों की शान और भारतीय व्यंजनों की जान मानी जाने वाली हल्दी को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और डरावनी रिपोर्ट सामने आई है। राज्य के विभिन्न बाजारों से खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा संग्रहित किए गए हल्दी के कुल नमूनों में से 31 प्रतिशत नमूने निर्धारित गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों की कसौटी पर पूरी तरह फेल हो गए हैं। इस चौंकाने वाले खुलासे का सीधा मतलब यह है कि आज बिहार के हर तीसरे घर में मिलावटी हल्दी पहुंच रही है, जो अनजाने में लोगों की सेहत के साथ गंभीर खिलवाड़ कर रही है। मसालों में मिलावट का यह काला कारोबार न केवल आम जनता के स्वास्थ्य को दीमक की तरह खोखला कर रहा है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। आइए इस विशेष रिपोर्ट के माध्यम से जानते हैं इस गंभीर समस्या के विभिन्न पहलुओं, इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों और इससे निपटने के उपायों के बारे में।
सर्वे और लैब जांच के चौंकाने वाले आंकड़े: 31% नमूने असुरक्षित
खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) तथा राज्य के खाद्य सुरक्षा विश्लेषण प्रयोगशालाओं द्वारा समय-समय पर बाजार से खाद्य पदार्थों के नमूने लेकर उनकी गुणवत्ता की जांच की जाती है।
नमूनों की फेल होने की दर: हाल ही में बिहार के विभिन्न जिलों के खुदरा और थोक बाजारों से हल्दी पाउडर तथा खड़ी हल्दी के नमूने एकत्र किए गए थे। जब इन नमूनों की गहन प्रयोगशाला जांच (Lab Testing) की गई, तो यह बात सामने आई कि लगभग 31% हल्दी के नमूने अमानक (Substandard) या असुरक्षित (Unsafe) पाए गए।
मिलावट का दायरा: यह स्थिति सिर्फ किसी एक जिले या शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर बड़े शहरी बाजारों तक बिकने वाली खुली और ब्रांडेड दोनों तरह की हल्दी में मिलावट का यह खेल चल रहा है। इसका परिणाम यह है कि सूबे के हर तीसरे परिवार की थाली तक यह ज़हर पहुंच रहा है।
हल्दी में किस तरह की मिलावट की जा रही है?
अक्सर मुनाफाखोर और बेईमान व्यापारी अधिक मुनाफे के चक्कर में मसालों में ऐसी खतरनाक चीजों की मिलावट करते हैं जो देखने में हल्दी जैसी लगें, लेकिन शरीर के लिए बेहद घातक हों।
लेड क्रोमेट (Lead Chromate) और मेटानील येलो: हल्दी को उसका चमकीला पीला और आकर्षक रंग देने के लिए उसमें खतरनाक केमिकल रंगों जैसे कि मेटानील येलो (Metanil Yellow) और लेड क्रोमेट का इस्तेमाल किया जाता है। लेड यानी सीसा एक भारी धातु है, जो शरीर में पहुंचकर नसों और अंगों को भारी नुकसान पहुंचाती है।
चावल का आटा, लकड़ी का बुरादा और ईंट का चूरा: वजन और मात्रा बढ़ाने के लिए पिसी हुई हल्दी में पीला पिसा हुआ चावल का आटा, मक्के का स्टार्च, लकड़ी का बारीक बुरादा या यहाँ तक कि पीली ईंट का पिसा हुआ चूरा तक मिलाया जा रहा है।
सेहत पर मिलावटी हल्दी का घातक असर: धीमी जहर जैसी मार
डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, मिलावटी हल्दी का नियमित सेवन मानव शरीर के लिए किसी धीमी जहर से कम नहीं है। इसके सेवन से कई गंभीर बीमारियां जन्म ले सकती हैं:
गंभीर बीमारियां और कैंसर का खतरा: हल्दी में मिलाए जाने वाले केमिकल रंग और लेड क्रोमेट जैसे तत्व शरीर में जाकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकते हैं। इसके अलावा यह लीवर (Liver) और किडनी (Kidney) की कार्यप्रणाली को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।
पेट की बीमारियां और बच्चों पर असर: इसके नियमित उपयोग से पाचन तंत्र खराब हो जाता है, पेट में अल्सर, गैस और आंतों से जुड़ी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए यह मिलावट सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा असर पड़ता है।
प्रशासनिक कदम और बाजार में सुधार की आवश्यकता
इस गंभीर खुलासे के बाद आम नागरिकों के मन में एक बड़ा डर बैठ गया है, जिसके समाधान के लिए प्रशासनिक स्तर पर कड़े कदम उठाने की मांग की जा रही है।
छापामारी अभियान और लाइसेंस की जांच: खाद्य सुरक्षा विभाग को निर्देश दिए गए हैं कि वे थोक मसाला निर्माताओं, गोदामों और खुदरा दुकानों पर औचक छापेमारी करें। बिना लाइसेंस या घटिया सामग्री बेचने वाले कारोबारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई (जैसे भारी जुर्माना और जेल) का प्रावधान होना चाहिए।
जागरूकता अभियान: उपभोक्ताओं को भी जागरूक होना होगा। खुली बिकने वाली चमकीले रंग की हल्दी के बजाय अच्छी और प्रमाणित ब्रांडेड पैकेज्ड हल्दी खरीदने या घर पर खड़ी हल्दी लाकर खुद पिसवाने को प्राथमिकता देनी चाहिए।
बिहार के बाजारों में हल्दी के 31 प्रतिशत नमूनों का फेल होना और हर तीसरे घर तक मिलावटी हल्दी का पहुंचना संपूर्ण समाज और प्रशासन के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते इस अवैध और खतरनाक कारोबार पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई गई, तो यह आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य को भारी संकट में डाल सकता है। शुद्ध खान-पान हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसे सुरक्षित रखना प्रशासन और समाज दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है।