देश के कई हिस्सों में सरसों के तेल की कीमतों ने पार किए 200 रुपये का आंकड़ा महंगाई से आम आदमी की जेब पर भारी मार, खुदरा बाजारों में आसमान छू रहे दाम

नई दिल्ली/पटना (विशेष संवाददाता): देश भर के रसोईघरों से एक बार फिर महंगाई को लेकर चिंताजनक और परेशान करने वाली खबरें सामने आ रही हैं। खाने-पीने की जरूरी चीजों में शुमार होने वाले सरसों के तेल की कीमतें देश के कई हिस्सों में आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। स्थिति यह हो गई है कि कई राज्यों और स्थानीय खुदरा बाजारों में सरसों का तेल 200 रुपये प्रति लीटर के आंकड़े को पार कर चुका है। अचानक हुई इस बेतहाशा बढ़ोतरी के कारण मध्यम वर्गीय परिवारों और गरीब तबके के लोगों का रसोई का बजट पूरी तरह से चरमरा गया है। त्योहारी सीजन से पहले और जरूरी खाद्य तेलों के दाम बढ़ने से आम उपभोक्ताओं में भारी निराशा और आक्रोश देखा जा रहा है।

किन इलाकों में और कैसे पहुंचे दाम 200 रुपये के पार?

प्राप्त बाजार रिपोर्टों के अनुसार, देश के अलग-अलग राज्यों में सरसों के तेल के खुदरा मूल्य में भारी अंतर देखने को मिल रहा है:

सुदूर और ग्रामीण इलाकों का हाल: उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश के कई ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी बाजारों में ब्रांडेड के साथ-साथ खुले सरसों के तेल की कीमतें भी 180 से 200 रुपये प्रति लीटर तक बिक रही हैं। परिवहन लागत, स्थानीय कर (GST) और खुदरा दुकानदारों के मार्जिन के कारण उपभोक्ताओं को यह और अधिक महंगे दामों पर मिल रहा है।

पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्य: परिवहन की समस्याओं और ढुलाई खर्च अधिक होने के कारण पूर्वोत्तर के राज्यों और पहाड़ी क्षेत्रों (जैसे हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के दूरदराज के इलाके) में प्रीमियम क्वालिटी का सरसों का तेल पहले ही 200 से 210 रुपये प्रति लीटर के पार बिक रहा है।

शहरों और खुदरा दुकानों की स्थिति: बड़े महानगरों को छोड़कर टियर-2 और टियर-3 शहरों की खुदरा दुकानों पर डिब्बाबंद (Packaged) सरसों के तेल के दाम भी 170 से 190 रुपये प्रति लीटर के आसपास चल रहे हैं, जबकि फुटकर खुला तेल 200 रुपये तक वसूला जा रहा है।

सरसों के तेल की कीमतों में बेतहाशा उछाल के प्रमुख कारण

खाद्य तेल बाजार के जानकारों और जानकारों का मानना है कि सरसों के तेल की कीमतों में इस भारी तेजी के पीछे कई आर्थिक और भू-राजनीतिक कारण जिम्मेदार हैं:

आयातित खाद्य तेलों पर निर्भरता और वैश्विक रुख: भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 55-60%) पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लॉवर ऑयल के आयात के जरिए पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम और सोया तेल के दामों में तेजी आने के कारण घरेलू बाजार में भी खाद्य तेलों पर दबाव बढ़ गया है।

घरेलू मंडियों में सरसों की कम आवक: रबी सीजन के बाद जैसे-जैसे साल आगे बढ़ता है, थोक मंडियों में सरसों की आवक कम होने लगती है। इसका फायदा कई बार स्टॉकर्स (जमाखोरों) द्वारा उठाया जाता है, जिससे कृत्रिम किल्लत पैदा कर कीमतें बढ़ा दी जाती हैं।

उत्पादन लागत में वृद्धि: किसानों के लिए खाद, बीज, सिंचाई और कटाई की लागत में लगातार बढ़ोतरी होने के कारण इस बार सरसों की फसल का समर्थन मूल्य और बाजार भाव भी उच्च स्तर पर रहा है, जिससे मिलर्स और निर्माताओं को महंगे दाम पर कच्चा माल मिल रहा है।

रसोई का बजट बिगड़ा, आम जनता में बढ़ी चिंता

सरसों के तेल के दाम 200 रुपये के पार पहुँचने से सबसे बड़ी मार देश के गृहणियों और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ी है:

घरेलू बजट पर असर: एक तरफ जहाँ दाल, चीनी, आटा और सब्जियों के दाम पहले से ही उच्च स्तर पर बने हुए हैं, वहीं खाने के तेल का इस तरह महंगा होना रसोई के गणित को पूरी तरह बिगाड़ रहा है।

छोटे कारोबारियों और ढाबा संचालकों की मुश्किलें: छोटे रेस्टोरेंट, ढाबे, नमकीन निर्माताओं और पूरी-कचौड़ी का ठेला लगाने वाले छोटे व्यवसायियों के लिए भी उच्च लागत पर काम करना मुश्किल हो गया है। तेल महंगा होने से उनके मुनाफे पर सीधा असर पड़ रहा है।

सरकार और बाजार की निगाहें

बढ़ती महंगाई को थामने के लिए उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय और खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग द्वारा समय-समय पर आयात शुल्क (Import Duty) में बदलाव और स्टॉक सीमा तय करने जैसे कदम उठाए जाते हैं। हालांकि, खुदरा बाजारों में अभी भी उपभोक्ताओं को इसका सीधा लाभ मिलता नजर नहीं आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों के दाम नरम नहीं पड़ते और नई फसल की आवक शुरू नहीं होती, तब तक कीमतों में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद कम ही है।

देश के कुछ हिस्सों में सरसों के तेल के 200 रुपये प्रति लीटर के पार बिकने की खबर ने एक बार फिर महँगाई के मोर्चे पर सरकार और आम जनता की चिंता बढ़ा दी है। आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन जमाखोरों और मुनाफाखोरों पर कड़ी नजर रखे, ताकि आम उपभोक्ताओं को इस आवश्यक खाद्य वस्तु की उचित और नियंत्रित दरों पर उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।