मुजफ्फरपुर: पवित्र सावन महीने में बाबा गरीबनाथ धाम के आसपास के फुटपाथी दुकानदारों पर टूटा आर्थिक संकट का पहाड़; प्रशासनिक रोक के कारण स्थायी दुकानें नहीं लगा पाने से भुखमरी की कगार पर पहुंचे दुकानदार, रोजी-रोटी बचाने की गुहार

मुजफ्फरपुर (बिहार): बिहार के प्रसिद्ध देवघर के रूप में ख्याति प्राप्त बाबा गरीबनाथ धाम से एक बेहद गंभीर, मानवीय और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। सावन के पावन और पवित्र महापर्व के दौरान मुजफ्फरपुर के बाबा गरीबनाथ धाम मंदिर के आसपास जीवन-यापन करने वाले फुटपाथी दुकानदारों (Street Vendors) को भीषण आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। सावन मास में जब देश भर से लाखों कांवरिये और शिवभक्त बाबा गरीबनाथ का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं, तब इन छोटे दुकानदारों के लिए कमाई का यह मुख्य सीजन होता है। हालांकि, इस बार प्रशासन द्वारा सुरक्षा, विधि-व्यवस्था और सुगम आवागमन (Traffic Management) का हवाला देते हुए मंदिर परिसर और आसपास के मुख्य मार्गों पर फुटपाथी दुकानें लगाने पर रोक लगा दी गई है या पाबंदियां कड़ी कर दी गई हैं। प्रशासनिक रोक के कारण ये दुकानदार अपनी स्थायी या अस्थायी दुकानें नहीं सजा पा रहे हैं, जिसके चलते उनकी रोजी-रोटी छिन गई है और वे भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं।

सावन के इस महीने में जहां एक तरफ पूरा शहर बोल बम के जयकारों से गूंज रहा है, वहीं दूसरी तरफ गरीब दुकानदारों के घरों के चूहे ठंडे पड़े हैं। आइए इस पूरे प्रशासनिक प्रतिबंध, दुकानदारों के दर्द, उनकी समस्याओं और इस संकट के विभिन्न पहलुओं का एक विस्तृत, विश्लेषणात्मक और बिंदुवार विवरण समझते हैं।

 सावन महापर्व और फुटपाथी दुकानदारों की आजीविका का महत्व

बाबा गरीबनाथ धाम में सावन का महीना सिर्फ धार्मिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह स्थानीय छोटे कारोबारियों के लिए साल भर की सबसे बड़ी आर्थिक उम्मीद का समय होता है।

साल भर की कमाई का आधार: पूजा-पाठ की सामग्री (फूल-माला, बेलपत्र, पूजा की थाली), प्रसाद, फोटो, कांवरियों के कपड़े, खिलौने और खान-पान की छोटी-छोटी दुकानें लगाकर ये दुकानदार अपने पूरे साल का खर्च निकालते हैं।

खोंचे और ठेले वालों की स्थिति: मंदिर के आसपास सैकड़ों की संख्या में ऐसे परिवार हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन छोटे व्यवसायों पर निर्भर हैं। सावन के एक महीने में होने वाली कमाई से ही वे अपने बच्चों की पढ़ाई और परिवार का भरण-पोषण करते हैं।

इस बार की मायूसियां: प्रशासन की सख्ती और दुकानों को हटाने के आदेश के कारण इस बार ये दुकानदार अपनी दुकानें ठीक से सजा नहीं पा रहे हैं, जिससे उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है।

प्रशासनिक रोक और सुरक्षा व्यवस्था के अपने तर्क

प्रशासन और जिला प्रशासन की ओर से लगाई गई रोक के पीछे भी कुछ प्रशासनिक मजबूरियां और सुरक्षा संबंधी कारण हैं, जिन्हें समझना आवश्यक है।

भीड़ नियंत्रण और भगदड़ से बचाव: सावन के दौरान लाखों की संख्या में उमड़ने वाली भीड़ के कारण सड़कों पर पैर रखने की जगह नहीं होती। ऐसे में यदि फुटपाथी दुकानें भी सड़क पर लगी रहें, तो रास्तों के संकरा होने से भारी भगदड़ या दुर्घटना का खतरा बन सकता है।

सुगम यातायात (Traffic Flow): कांवरियों की लंबी कतारों और वीवीआईपी मूवमेंट को ध्यान में रखते हुए मंदिर के आसपास के इलाकों को 'नो-वेंडिंग जोन' (No-Vending Zone) या प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया गया है, ताकि एम्बुलेंस और आपातकालीन वाहन आसानी से आ-जा सकें।

स्वच्छता और व्यवस्था: मंदिर क्षेत्र में स्वच्छता बनाए रखने और अतिक्रमण हटाने के नाम पर जिला प्रशासन ने सख्ती बरती है, जिसका सीधा असर इन छोटे दुकानदारों पर पड़ा है।

दुकानदारों का दर्द: "रोटी का संकट और कर्ज के जाल में फंसने का डर"

दुकानदारों का कहना है कि प्रशासन को सुरक्षा के साथ-साथ गरीबों की आजीविका का भी विकल्प ढूंढना चाहिए था।

साहूकारों से कर्ज: कई दुकानदारों ने सावन के सीजन में दुकान सजाने के लिए ऊंचे ब्याज दरों पर साहूकारों या रिश्तेदारों से कर्ज (Loan) लिया है। सामान खरीदकर आ जाने के बाद जब दुकान लगाने पर रोक लग गई, तो उनका सामान सड़ने लगा है और कर्ज चुकाने की चिंता उन्हें सता रही है।

वैकल्पिक जगह की मांग: दुकानदारों का एक प्रतिनिधिमंडल जिला प्रशासन से मिलकर गुहार लगा चुका है कि उन्हें मंदिर के मुख्य मार्ग से हटाकर किसी नजदीकी मैदान या निर्धारित वेंडिंग जोन में अस्थाई रूप से दुकान लगाने की अनुमति दी जाए।

परिवार के सामने भुखमरी: दुकानदारों का दर्द छलकते हुए कहना है कि यदि प्रशासन ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की, तो उनके बच्चों के भूखों मरने की नौबत आ जाएगी।

 जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया

इस गंभीर आर्थिक संकट को लेकर अब स्थानीय स्तर पर सुगबुगाहट और राजनीतिक-सामाजिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं।

मानवीय दृष्टिकोण की अपील: कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं ने जिला प्रशासन से मांग की है कि सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त रखते हुए भी इन गरीब दुकानदारों के हितों का ध्यान रखा जाए और उन्हें सीमित जगह पर व्यवसाय करने की छूट दी जाए।

प्रशासनिक समन्वय की जरूरत: प्रशासन और दुकानदारों के बीच सामंजस्य बैठाकर एक ऐसा रास्ता निकाला जाना चाहिए जिससे कांवरियों को भी असुविधा न हो और गरीबों का चूल्हा भी जलता रहे।

मुजफ्फरपुर के बाबा गरीबनाथ धाम के आसपास सावन के पवित्र महापर्व पर फुटपाथी दुकानदारों को झेलना पड़ रहा आर्थिक संकट एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मानवीय मुद्दा है। हालांकि प्रशासन की प्राथमिकता श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुगम व्यवस्था सुनिश्चित करना है, लेकिन इसके साथ ही उन सैकड़ों गरीब परिवारों की रोजी-रोटी को बचाना भी प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी है। समय की मांग है कि जिला प्रशासन और नगर निगम मिलकर इन दुकानदारों के लिए कोई उपयुक्त वैकल्पिक वेंडिंग जोन या स्थान निर्धारित करे, ताकि बाबा गरीबनाथ के दरबार में आने वाले शिवभक्तों की सेवा के साथ-साथ इन गरीबों के घरों में भी सावन की खुशियां और दीवाली जैसा उजियारा लौट सके।