फतेहपुर के रेंगनी और चरका पत्थर में खुलेंगे नए प्राथमिक विद्यालय: विधानसभा में सवाल उठने के बाद शिक्षा विभाग ने शुरू की कवायद, क्षेत्र में खुशी की लहर
गया/फतेहपुर: बिहार के गया जिले के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में शिक्षा के प्रसार को लेकर एक बहुत ही सकारात्मक और बड़ी खबर सामने आई है। शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और हर बच्चे तक बुनियादी शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। गया जिले के फतेहपुर प्रखंड के अंतर्गत आने वाले दो पिछड़े और सुदूर इलाकों—रेंगनी (Rengani) और चरका पत्थर (Charka Patthar)—में दो नए प्राथमिक विद्यालयों के खोले जाने की प्रशासनिक स्वीकृति मिलने की संभावना तेज हो गई है। विधानसभा सत्र के दौरान इस मामले को उठाए जाने के बाद अब जिला शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन पूरी तरह हरकत में आ गया है, और इन नए स्कूलों के संचालन को लेकर औपचारिक कवायद शुरू कर दी गई है।
विधानसभा में उठा था क्षेत्र की शिक्षा का मुद्दा
किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए बुनियादी शिक्षा का होना सबसे पहली शर्त है। फतेहपुर प्रखंड के कई इलाके ऐसे हैं जो भौगोलिक रूप से काफी दुर्गम हैं और वहां के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए भी कई किलोमीटर का लंबा सफर तय करना पड़ता था।
जनप्रतिनिधियों का प्रयास: स्थानीय नागरिकों और अभिभावकों की इस गंभीर समस्या को ध्यान में रखते हुए विधानसभा के पटल पर जनप्रतिनिधियों द्वारा पुरजोर तरीके से यह सवाल उठाया गया था कि रेंगनी और चरका पत्थर जैसे ग्रामीण टोलों में स्कूली बच्चों की संख्या को देखते हुए वहां तत्काल नए प्राथमिक विद्यालय खोले जाएं।
शासन-प्रशासन का संज्ञान: विधानसभा में तारांकित प्रश्न उठने के बाद शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया। विभाग ने संज्ञान लेते हुए जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) और संबंधित प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (BEO) को निर्देश दिया कि वे इस क्षेत्र का भौतिक सत्यापन करें और स्कूलों की आवश्यकता पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
जिला शिक्षा विभाग द्वारा शुरू की गई तीव्र कवायद
विधानसभा में मामला गूंजने और शासन स्तर से निर्देश मिलने के बाद जिला शिक्षा विभाग ने युद्धस्तर पर अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं।
स्थल निरीक्षण और सर्वे: शिक्षा विभाग की एक विशेष टीम ने फतेहपुर के रेंगनी और चरका पत्थर गांवों का दौरा किया। टीम ने वहां की भौगोलिक स्थिति, स्कूल जाने वाले बच्चों (नन्हे-मुन्नों) की अनुमानित संख्या और सरकारी जमीन की उपलब्धता का जायजा लिया। सर्वे में यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो गई कि इन दोनों जगहों पर स्कूल न होने के कारण छोटे बच्चों को शिक्षा से वंचित रहना पड़ रहा है या उन्हें भारी जोखिम उठाकर दूर जाना पड़ता है।
प्रस्ताव तैयार कर भेजने की प्रक्रिया: प्रारंभिक जांच और सर्वे रिपोर्ट के आधार पर विभाग अब इन दोनों स्थानों पर नए प्राथमिक विद्यालय खोलने का आधिकारिक प्रस्ताव तैयार कर रहा है। इस प्रस्ताव को अंतिम रूप देकर राज्य मुख्यालय को भेजा जा रहा है, ताकि जल्द से जल्द बजट आवंटन और भवनों के निर्माण या किराए के भवन में विद्यालय संचालन की अनुमति मिल सके।
शिक्षा से वंचित बच्चों को मिलेगा बड़ा संबल
रेंगनी और चरका पत्थर जैसे ग्रामीण अंचलों में नए प्राथमिक विद्यालय खुलने से वहां के गरीब, दलित, महादलित और पिछड़े वर्ग के परिवारों को सबसे बड़ा लाभ मिलेगा।
ड्रॉपआउट दर में आएगी कमी: दूर स्कूल होने के कारण अक्सर कम उम्र के बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते थे (ड्रॉपआउट)। गांव में ही स्कूल खुल जाने से बच्चे नियमित रूप से शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे।
मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) और अन्य लाभ: इन स्कूलों के शुरू होने से बच्चों को सरकार की ओर से मिलने वाली सभी शैक्षणिक सुविधाएं जैसे मुफ्त किताबें, पोशाक राशि, छात्रवृत्ति और पौष्टिक मध्याह्न भोजन का लाभ सीधे तौर पर मिलने लगेगा।
स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों में हर्ष का माहौल
जैसे ही यह खबर फैली कि फतेहपुर के रेंगनी और चरका पत्थर में नए प्राथमिक विद्यालय खोले जाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, वहां के ग्रामीणों और अभिभावकों में खुशी की लहर दौड़ गई।
सरकार और प्रशासन का आभार: स्थानीय लोगों ने विधानसभा में आवाज उठाने वाले जनप्रतिनिधियों, राज्य सरकार और जिला शिक्षा विभाग के प्रति आभार व्यक्त किया है। ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के इतने वर्षों बाद उनके बच्चों के लिए गांव में ही शिक्षा का द्वार खुलने जा रहा है, जो उनके भविष्य को एक नई दिशा देगा।
उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद: शिक्षाविदों का मानना है कि यदि इसी प्रकार हर सुदूर ग्रामीण इलाके में स्कूलों का जाल बिछ जाए, तो बिहार की साक्षरता दर और शैक्षणिक परिदृश्य में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलेगा। प्रशासन की इस त्वरित और सकारात्मक पहल से अब यह तय माना जा रहा है कि बहुत जल्द रेंगनी और चरका पत्थर के बच्चे अपने ही गांव में ककहरा सीखते नजर आएंगे।