बहेड़ी के कमारपोखर में जलापूर्ति ठप होने पर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा: भीषण जलसंकट से जूझ रहे लोगों ने मुख्य सड़क को किया जाम, प्रशासन के खिलाफ जमकर की नारेबाजी

दरभंगा/बहेड़ी: बिहार सरकार के सात निश्चय योजना के तहत हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने के तमाम दावों की पोल दरभंगा जिले के बहेड़ी प्रखंड क्षेत्र से खुलती नजर आ रही है। प्रखंड के सुदूर ग्रामीण इलाके कमारपोखर गांव में मुख्यमंत्री ग्रामीण नल-जल योजना पूरी तरह से ठप पड़ी हुई है, जिसके कारण पिछले लंबे समय से पूरा गांव भीषण जलसंकट से जूझ रहा है। पीने के पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे आक्रोशित ग्रामीणों का सब्र आखिरकार जवाब दे गया और उन्होंने मजबूरन मुख्य सड़क को पूरी तरह जाम कर दिया।

सड़क पर उतरे ग्रामीणों के उग्र प्रदर्शन के कारण आवागमन पूरी तरह बाधित हो गया, जिससे दोनों तरफ वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग की उदासीनता के खिलाफ ग्रामीणों का यह गुस्सा इस बात का गवाह है कि जमीनी स्तर पर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में कितनी बड़ी लापरवाही बरती जा रही है।

जलसंकट की विकरालता: बूंद-बूंद को मोहताज हुए कमारपोखर के ग्रामीण

कमारपोखर गांव की आबादी आज जिस नारकीय स्थिति से गुजर रही है, उसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। गर्मी का मौसम हो या सामान्य दिन, पानी मानव जीवन की सबसे बुनियादी आवश्यकता है। लेकिन कमारपोखर गांव में इस बुनियादी जरूरत को पूरा करने वाला नल-जल योजना का संयंत्र महीनों से सफेद हाथी साबित हो रहा है।

ग्रामीणों ने बताया कि गांव में लगाई गई नल-जल योजना की टंकी और पाइपलाइन या तो तकनीकी खराबी के कारण बंद पड़ी है या फिर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। हालात यह हैं कि गांव के अधिकांश चापाकल (Handpumps) या तो सूख चुके हैं या फिर उनसे दूषित और गंदा पानी निकल रहा है। पीने के शुद्ध पानी के अभाव में महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को दूर-दूर से पानी ढोकर लाना पड़ रहा है। कई बार तो ग्रामीणों को खेतों या दूरदराज के निजी बोरिंगों से पानी का जुगाड़ करना पड़ता है, जिससे रोजमर्रा का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है।

प्रशासनिक उपेक्षा से बढ़ा आक्रोश: कई बार गुहार के बाद भी नहीं हुई सुनवाई

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने नल-जल योजना के चालू कराने और पानी की समस्या के समाधान के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लेकर प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) और लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) के अधिकारियों तक कई बार लिखित और मौखिक गुहार लगाई। परंतु, हर बार सिर्फ कोरे आश्वासन ही मिले, जमीन पर स्थिति जस की तस बनी रही।

जब पानी की समस्या के कारण लोगों का जीना मुहाल हो गया और अधिकारी उनकी सुध लेने को तैयार नहीं हुए, तो ग्रामीणों के पास सड़क पर उतरने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। महिलाओं और युवाओं ने बढ़-चढ़कर इस विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया और प्रशासन के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली।

मुख्य सड़क जाम: घंटों ठप रहा यातायात, मची अफरातफरी

कमारपोखर गांव के पास मुख्य सड़क पर ग्रामीणों द्वारा अचानक लगाए गए जाम के कारण यातायात पूरी तरह ठप हो गया। सड़क के दोनों ओर बसों, ट्रकों, और छोटे वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। स्कूल जाने वाले बच्चों और दफ्तर जाने वाले लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों ने हाथों में बैनर-पोस्टर लेकर सरकार और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। उनका साफ कहना था कि जब तक जलापूर्ति बहाल नहीं होगी, तब तक यह सड़क जाम समाप्त नहीं किया जाएगा।

गुस्साए ग्रामीणों ने आरोप लगाते हुए कहा, "सरकार कागजों पर तो जल जीवन हरियाली और हर घर नल का जल योजना की सफलता के बड़े-बड़े आंकड़े पेश करती है, लेकिन कमारपोखर गांव आकर देखिए कि लोग किस तरह पानी के लिए त्राहिमाम कर रहे हैं। क्या गरीबों की प्यास बुझाना प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है?"

प्रशासनिक अधिकारियों के आश्वासन पर शांत हुआ मामला

सड़क जाम की सूचना मिलते ही बहेड़ी थाने की पुलिस और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी तुरंत मौके पर पहुंचे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को समझाने-बुझाने का प्रयास किया।

प्रशासनिक अधिकारियों ने ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि अगले 24 से 48 घंटों के भीतर तकनीकी टीम भेजकर नल-जल योजना की कमियों को दूर कर दिया जाएगा और गांव में सुचारू रूप से जलापूर्ति बहाल कर दी जाएगी। अधिकारियों के इस लिखित और मौखिक आश्वासन के बाद ही ग्रामीण शांत हुए और सड़क जाम को हटाया गया, जिसके बाद यातायात सुचारू रूप से चालू हो सका

कमारपोखर गांव की यह घटना बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना की पोल खोलने के लिए काफी है। योजनाएं करोड़ों रुपये खर्च करके कागजों पर तो उतार दी जाती हैं, लेकिन रखरखाव और मॉनिटिरिंग के अभाव में वे कुछ ही दिनों में दम तोड़ देती हैं। यदि समय रहते प्रशासन ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले दिनों में जनता का यह आक्रोश और भी उग्र रूप ले सकता है। ग्रामीण अब सिर्फ आश्वासनों पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं, उन्हें जमीन पर पानी चाहिए।