मिर्गी, लो बीपी और सांस की गंभीर समस्याओं से जूझ रहे थे प्रदीप चौधरी; स्वास्थ्य व्यवस्था पर परिजनों ने उठाए सवाल

सुल्तानगंज/भागलपुर (विशेष संवाददाता): भागलपुर जिले के सुल्तानगंज स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में इलाज के दौरान एक 65 वर्षीय वृद्ध की मौत का मामला सामने आया है। मृतक की पहचान प्रदीप चौधरी (65 वर्ष) के रूप में हुई है। चिकित्सकों के अनुसार, वृद्ध को मिर्गी (Epilepsy), लो ब्लड प्रेशर (Low BP) और सांस लेने में गंभीर परेशानी (Breathing Problems) की शिकायत थी, जिसके चलते उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालांकि, अस्पताल में इलाज के दौरान अचानक उनकी तबीयत तेजी से बिगड़ी और चिकित्सकों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। इस घटना के बाद जहां एक तरफ चिकित्सकों ने उनकी पुरानी गंभीर बीमारियों का हवाला दिया है, वहीं दूसरी तरफ परिजनों ने अस्पताल की व्यवस्था और तत्परता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जिससे परिसर में कुछ देर के लिए तनाव की स्थिति बन गई।

क्या है पूरी घटना और कैसे बिगड़ी तबीयत?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रदीप चौधरी पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी कई पुरानी और जटिल समस्याओं से पीड़ित थे:

अचानक बिगड़ी स्थिति: गुरुवार को अचानक उनकी तबीयत अधिक खराब होने पर परिजनों ने उन्हें तुरंत सुल्तानगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया। अस्पताल पहुंचते ही आपातकालीन कक्ष (Emergency Ward) में चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मियों ने उन्हें फौरन ऑक्सीजन और प्राथमिक उपचार देना शुरू किया।

सांस लेने में अत्यधिक तकलीफ: परिजनों के मुताबिक, प्रदीप चौधरी को सीने में जकड़न और सांस लेने में भारी दिक्कत हो रही थी। इसके साथ ही उनका ब्लड प्रेशर भी काफी डाउन हो चुका था। अस्पताल के अंदर इलाज के दौरान ही उनकी स्थिति नाजुक होती चली गई और कुछ ही समय में उन्होंने दम तोड़ दिया।

चिकित्सकों का पक्ष: गंभीर बीमारियों से ग्रसित थे मरीज

मामले की जानकारी देते हुए अस्पताल के ड्यूटी पर मौजूद चिकित्सा पदाधिकारियों ने बताया कि वृद्ध की स्थिति अस्पताल पहुंचने से पहले ही बेहद नाजुक हो चुकी थी:

मल्टीपल हेल्थ इश्यूज़: चिकित्सकों के अनुसार, प्रदीप चौधरी पहले से ही मिर्गी के दौरे, अत्यधिक निम्न रक्तचाप (Low BP) और क्रॉनिक सांस की बीमारी से ग्रस्त थे। मेडिकल भाषा में इस तरह के 'कोमोरबिड कंडीशंस' (Comorbid Conditions) वाले मरीजों में कार्डियक या रेस्पिरेटरी फेलियर का खतरा बहुत अधिक होता है।

डॉक्टरों की सफाई: चिकित्सकों का कहना है कि अस्पताल की टीम ने बिना कोई वक्त गंवाए उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनकी शारीरिक स्थिति इतनी क्षीण हो चुकी थी कि दवाएं और उपचार अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।

परिजनों का आक्रोश और अस्पताल प्रबंधन की प्रतिक्रिया

वृद्ध की मौत के बाद अस्पताल परिसर में परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। गुस्साए परिजनों और स्थानीय लोगों ने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर कुछ सवाल भी उठाए:

समय पर डॉक्टर के नहीं मिलने का आरोप: परिजनों का आरोप था कि यदि आपातकालीन स्थिति में थोड़ी और तत्परता दिखाई जाती या ऑक्सीजन सपोर्ट तुरंत मिलता, तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी।

प्रशासनिक समझाइश: घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस और अस्पताल प्रबंधन के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे। उन्होंने आक्रोशित परिजनों को शांत कराया और पूरे मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उन्हें समझाया-बुझाकर स्थिति को संभाला।

सामग्री और संसाधनों की कमी पर फिर छिड़ी बहस

इस दुखद घटना ने एक बार फिर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की बुनियादी ढांचागत कमजोरियों को उजागर कर दिया है:

रेफरल सिस्टम की मजबूरी: जानकारों का मानना है कि छोटे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में गंभीर और बहु-जटिल बीमारियों (Multiple Complications) से जूझ रहे मरीजों के लिए आईसीयू या क्रिटिकल केयर यूनिट का अभाव अक्सर जानलेवा साबित होता है। यदि ऐसे मरीजों को समय रहते भागलपुर सदर अस्पताल या मायागंज मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाए, तो कई बार अनहोनी टल सकती है।

जागरूकता की जरूरत: स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बुजुर्गों में मिर्गी, बीपी और अस्थमा या सांस की पुरानी बीमारियों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। मौसम में बदलाव या ठंड-गर्मी के उतार-चढ़ाव के दौरान ऐसे मरीजों की विशेष देखभाल जरूरी होती है।

सुल्तानगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 65 वर्षीय प्रदीप चौधरी की मौत एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाली घटना है। हालांकि चिकित्सकों ने उनकी पुरानी और गंभीर बीमारियों को मौत का मुख्य कारण बताया है, लेकिन इस पूरी घटना ने स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और आपातकालीन प्रबंधन पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। एक बुजुर्ग व्यक्ति ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया, जो यह याद दिलाता है कि हमारे स्वास्थ्य तंत्र को ग्रामीण स्तर पर और अधिक सुदृढ़, साधन-सम्पन्न और संवेदनशील बनाने की कितनी आवश्यकता है।