स्मार्टफोन के दौर में भी कायम रेडियो का जादू, ग्रामीण विकास का मजबूत माध्यम बना सामुदायिक रेडियो

भागलपुर: स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बावजूद रेडियो की लोकप्रियता और उपयोगिता आज भी बरकरार है। समय के साथ रेडियो का स्वरूप जरूर बदला है, लेकिन इसकी भूमिका और प्रभाव पहले की तरह मजबूत बने हुए हैं। अब रेडियो केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि यह ग्रामीण विकास, कृषि जागरूकता और जनभागीदारी का एक प्रभावी माध्यम बन चुका है।

हर साल 23 जुलाई को राष्ट्रीय प्रसारण दिवस मनाया जाता है। यह दिन देश में रेडियो प्रसारण की समृद्ध परंपरा और समाज में इसके योगदान को याद करने का अवसर देता है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रेडियो आज भी लोगों तक जरूरी जानकारी पहुंचाने का भरोसेमंद माध्यम बना हुआ है।

रेडियो का बदला स्वरूप, बढ़ी उपयोगिता

एक समय था जब रेडियो घर-घर मनोरंजन का प्रमुख साधन हुआ करता था। परिवार के लोग एक साथ बैठकर रेडियो कार्यक्रम सुना करते थे। लेकिन डिजिटल युग में भी रेडियो ने खुद को समय के अनुसार बदला है।

अब रेडियो पर केवल गीत-संगीत और मनोरंजन कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, मौसम, रोजगार और सरकारी योजनाओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां भी प्रसारित की जा रही हैं।

विशेष रूप से सामुदायिक रेडियो ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है। यह स्थानीय भाषा और स्थानीय जरूरतों के अनुसार कार्यक्रम तैयार करता है, जिससे लोगों को सीधे लाभ मिलता है।

गांव की चौपाल तक पहुंच रहा ज्ञान

रेडियो आज खेत-खलिहानों से लेकर गांव की चौपालों तक ज्ञान पहुंचाने का काम कर रहा है। जिन क्षेत्रों में इंटरनेट की सुविधा सीमित है, वहां रेडियो किसानों और ग्रामीणों के लिए सूचना का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।

मौसम की जानकारी, खेती की नई तकनीक, फसल प्रबंधन, पशुपालन और सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी रेडियो के माध्यम से आसानी से लोगों तक पहुंच रही है।

किसानों के लिए यह माध्यम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे अपने काम के दौरान भी रेडियो सुनकर उपयोगी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

बीएयू सबौर के सामुदायिक रेडियो स्टेशन दे रहे योगदान

ग्रामीण विकास और कृषि जागरूकता के क्षेत्र में बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर के सामुदायिक रेडियो स्टेशन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

विश्वविद्यालय के अंतर्गत वर्तमान में चार प्रमुख सामुदायिक रेडियो स्टेशन सफलतापूर्वक संचालित किए जा रहे हैं। इनमें विश्वविद्यालय मुख्यालय सबौर का एफएम ग्रीन (FM Green) प्रमुख है।

इसके अलावा कृषि विज्ञान केंद्र गया, बाढ़ (पटना) और कटिहार से भी नियमित रूप से सामुदायिक रेडियो प्रसारण किया जा रहा है।

इन रेडियो स्टेशनों का उद्देश्य किसानों, ग्रामीणों और समाज के विभिन्न वर्गों तक उपयोगी जानकारी पहुंचाना है।

किसानों को मिल रही वैज्ञानिक सलाह

बीएयू के सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के माध्यम से किसानों को खेती से जुड़ी वैज्ञानिक सलाह दी जाती है। कृषि विशेषज्ञों द्वारा फसल उत्पादन, बीज चयन, खाद और उर्वरक के सही उपयोग, कीट नियंत्रण और आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी दी जाती है।

मौसम आधारित कृषि सलाह भी किसानों के लिए काफी उपयोगी साबित हो रही है। बारिश, तापमान और मौसम में बदलाव के अनुसार किसानों को फसल प्रबंधन के सुझाव दिए जाते हैं।

इससे किसानों को समय पर सही निर्णय लेने में मदद मिलती है और कृषि उत्पादन बढ़ाने में सहायता मिलती है।

कृषि से आगे सामाजिक मुद्दों पर भी कार्यक्रम

सामुदायिक रेडियो केवल कृषि तक सीमित नहीं है। इन रेडियो स्टेशनों से पशुपालन, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण, स्वच्छता और लोक संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम भी प्रसारित किए जाते हैं।

महिलाओं के लिए चलाए जाने वाले कार्यक्रमों में उन्हें आत्मनिर्भरता, स्वरोजगार और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाती है।

स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को बीमारियों से बचाव, पोषण और स्वास्थ्य जागरूकता के बारे में जानकारी मिलती है।

लोक संस्कृति और परंपराओं को मिल रहा संरक्षण

रेडियो ग्रामीण संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करने का भी काम कर रहा है। लोकगीत, लोककथाएं और स्थानीय कलाकारों से जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से क्षेत्रीय संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इससे नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर मिलता है।

आपदा और मौसम सतर्कता में अहम भूमिका

ग्रामीण क्षेत्रों में रेडियो आपदा प्रबंधन और मौसम सतर्कता का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। बाढ़, भारी बारिश, तूफान और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के समय रेडियो के माध्यम से लोगों तक जरूरी सूचनाएं पहुंचाई जा सकती हैं।

समय पर मिली जानकारी से लोग सावधानी बरत सकते हैं और नुकसान को कम किया जा सकता है।

डिजिटल युग में रेडियो की नई पहचान

आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में रेडियो ने भी डिजिटल माध्यमों को अपनाया है। कई सामुदायिक रेडियो स्टेशन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं।

इससे रेडियो कार्यक्रमों को सुनने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है और नई पीढ़ी भी इससे जुड़ रही है।

राष्ट्रीय प्रसारण दिवस के अवसर पर रेडियो की भूमिका और महत्व को एक बार फिर याद किया जाता है। बदलते समय के साथ रेडियो ने अपना स्वरूप बदला है, लेकिन समाज के प्रति इसकी जिम्मेदारी और प्रभाव आज भी कायम है।

बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के सामुदायिक रेडियो स्टेशन इसका उदाहरण हैं, जो किसानों और ग्रामीणों तक वैज्ञानिक जानकारी, जागरूकता और विकास का संदेश पहुंचा रहे हैं।

स्मार्टफोन और इंटरनेट के युग में भी रेडियो ग्रामीण भारत की आवाज बना हुआ है और आने वाले समय में भी जनहित और ग्रामीण विकास में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी।