टीएमबीयू में अतिथि शिक्षकों के मानदेय और बकाया भुगतान को लेकर बढ़ा आक्रोश; यूनिवर्सिटी विभागों और अंगीभूत कॉलेजों में संघ ने उठाई आवाज, प्रशासन पर टालमटोल का आरोप

भागलपुर, वरीय संवाददाता: सिल्क सिटी के प्रतिष्ठित तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) परिसर में एक बार फिर शिक्षकों का गुस्सा खुलकर सामने आ गया है। विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले विभिन्न अंगीभूत इकाइयों (Constituent Colleges), स्नातकोत्तर विभागों और अतिथि शिक्षक संघ (Guest Faculty Association) के बैनर तले एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई गई। अतिथि शिक्षकों ने प्रबंधन पर उनके लंबे समय से लंबित मानदेय भुगतान को लेकर गंभीर और तीखे आरोप लगाए हैं। शिक्षकों का कहना है कि महीनों से मानदेय न मिलने के कारण उनके समक्ष भुखमरी और गंभीर आर्थिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन सिर्फ कोरे आश्वासन देने तक सीमित है।

क्या है पूरा मामला? क्यों भड़के हैं अतिथि शिक्षक?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, TMBU के अंतर्गत संचालित विभिन्न कॉलेजों और विभागों में अध्यापन कार्य संभाल रहे अतिथि शिक्षकों की आर्थिक हालत बेहद दयनीय होती जा रही है:

महीनों से बकाया है मानदेय: अतिथि शिक्षकों का मुख्य दर्द यह है कि उन्हें पिछले कई महीनों से उनके पठन-पाठन कार्य के एवज में मिलने वाला मानदेय (Honorarium) नहीं मिला है। इस महंगाई के दौर में और त्योहारों के समय वेतन या मानदेय न मिलने से उनके परिवारों का गुजर-बसर करना अत्यधिक कठिन हो गया है।

बजट और कागजी पेचीदगियों का बहाना: शिक्षकों का आरोप है कि जब भी वे विश्वविद्यालय के वित्त विभाग या संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से अपने बकाया भुगतान के सिलसिले में मिलते हैं, तो उन्हें हमेशा बजट के आभाव या फाइलों के लंबित होने का रटा-रया जवाब देकर टरका दिया जाता है। बार-बार के आश्वासनों के बावजूद धरातल पर भुगतान की कोई ठोस प्रक्रिया शुरू नहीं हो पायी है।

संघ की बैठक में बनी आगे की आक्रामक रणनीति

हाल ही में हुई इस बैठक में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों और दूर-दराज के कॉलेजों से आए दर्जनों अतिथि शिक्षक शामिल हुए:

आर-पार की लड़ाई का ऐलान: बैठक के दौरान वक्ताओं ने एक स्वर में स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन ने जल्द से जल्द उनके बकाये मानदेय का भुगतान नहीं किया, तो वे शैक्षणिक कार्यों का पूर्ण बहिष्कार करने के लिए विवश होंगे।

ज्ञापन और अल्टीमेटम: संघ के प्रतिनिधियों ने निर्णय लिया है कि वे इस संबंध में एक अंतिम ज्ञापन कुलपति (Vice-Chancellor) और कुलसचिव (Registrar) को सौंपेंगे, जिसमें भुगतान के लिए एक सख्त और निश्चित समय-सीमा तय करने की मांग की जाएगी।

अतिथि शिक्षकों की शैक्षणिक व्यवस्था में रीढ़ की हड्डी जैसी भूमिका

शिक्षाविदों और जानकारों का मानना है कि TMBU के अधिकांश कॉलेजों और विभागों में नियमित शिक्षकों की भारी कमी है:

संचालित हो रही हैं कक्षाएं: वर्तमान में विश्वविद्यालय और उसके अंगीभूत कॉलेजों की पूरी शैक्षणिक व्यवस्था काफी हद तक इन्हीं अतिथि शिक्षकों के कंधों पर टिकी हुई है। नियमित नियुक्तियों के भारी अभाव के बावजूद ये शिक्षक यूजी और पीजी कक्षाओं का संचालन पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कर रहे हैं।

शोषण का गंभीर आरोप: शिक्षकों का कहना है कि एक तरफ तो यूनिवर्सिटी प्रशासन उनसे नियमित शिक्षकों की तरह पूरा शैक्षणिक कार्य और परीक्षा संबंधी ड्यूटी करवाता है, लेकिन जब पारिश्रमिक देने की बारी आती है, तो उनके साथ सौतेला और उदासीन व्यवहार किया जाता है, जो पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।

विश्वविद्यालय प्रशासन की प्रतिक्रिया और आश्वासन

मामले के तूल पकड़ने और शिक्षकों के तेवर कड़े होने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन हरकत में आया है:

शीघ्र भुगतान का दावा: TMBU के प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि अतिथि शिक्षकों के मानदेय भुगतान की फाइल प्रक्रियाधीन है और इस पर तेजी से काम चल रहा है। सरकार से मिलने वाले अनुदान और विश्वविद्यालय के आंतरिक स्रोतों से राशि प्राप्त होते ही सभी पात्र शिक्षकों के खातों में आरटीजीएस (RTGS) के माध्यम से बकाया राशि ट्रांसफर कर दी जाएगी।

संयम बरतने की अपील: विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने शिक्षकों से संयम और धैर्य बनाए रखने की अपील की है तथा यह भरोसा दिलाया है कि उनकी समस्याओं का समाधान सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर किया जा रहा है।

भागलपुर के टीएमबीयू में अतिथि शिक्षकों द्वारा मानदेय भुगतान को लेकर उठाया गया यह कदम विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था और लचर कार्यशैली पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाता है। यदि समय रहते प्रशासन ने इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला, तो आने वाले दिनों में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियां पूरी तरह ठप हो सकती हैं, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा सीधे तौर पर छात्र-छात्राओं के भविष्य को भुगतना पड़ेगा।