बिहार में महिलाएं क्यों चुकाती हैं ‘सेफ्टी टैक्स’? असुरक्षा और महंगी यात्रा से बढ़ रहा आर्थिक बोझ

बिहार में महिलाओं की सुरक्षा और सार्वजनिक परिवहन से जुड़ी चुनौतियां एक बार फिर चर्चा में हैं। महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलना केवल आने-जाने का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि सुरक्षित तरीके से यात्रा करना भी एक अतिरिक्त आर्थिक और सामाजिक चुनौती बनता जा रहा है। असुरक्षा की भावना, देर शाम यात्रा से बचने की मजबूरी और सुरक्षित परिवहन के लिए अधिक पैसे खर्च करने की जरूरत महिलाओं की गतिशीलता और अवसरों पर असर डाल सकती है।

हालांकि, उपलब्ध शोध में सालाना 18,800 रुपये अतिरिक्त खर्च का आंकड़ा बिहार की महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं के संदर्भ में सामने आया है। अर्थशास्त्री गिरिजा बोरकर के शोध के अनुसार, दिल्ली की छात्राएं सुरक्षित कॉलेज तक पहुंचने के लिए पुरुष छात्रों की तुलना में सालाना लगभग 18,800 रुपये अधिक खर्च करने को तैयार थीं। वे सुरक्षित रास्ते के लिए अतिरिक्त समय भी देने को तैयार थीं।

इस शोध का महत्व बिहार जैसे राज्यों के संदर्भ में भी इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी सीधे तौर पर सुरक्षित और सुलभ परिवहन से जुड़ी है।

सुरक्षा के लिए महंगा सफर चुनने की मजबूरी

महिलाओं के लिए यात्रा का सबसे बड़ा सवाल अक्सर यह होता है कि कौन-सा रास्ता सबसे सुरक्षित है। पुरुषों के लिए जहां कम समय और कम किराया प्राथमिकता हो सकता है, वहीं महिलाओं को कई बार सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए महंगे विकल्प का चुनाव करना पड़ता है।

उदाहरण के तौर पर, कम किराए वाली बस या साझा परिवहन उपलब्ध होने के बावजूद कोई महिला अकेले यात्रा करने में असहज महसूस कर सकती है। ऐसी स्थिति में वह ऑटो, कैब या निजी वाहन का विकल्प चुन सकती है। इससे यात्रा का खर्च बढ़ जाता है।

यही अतिरिक्त खर्च व्यापक अर्थ में ‘सेफ्टी टैक्स’ की तरह देखा जा सकता है। यानी ऐसी रकम जिसे महिला अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि सुरक्षित रहने की आवश्यकता के कारण खर्च करती है।

18,800 रुपये के आंकड़े का असली संदर्भ

सालाना 18,800 रुपये का आंकड़ा महिलाओं की सुरक्षा और परिवहन की लागत को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन इसे सही संदर्भ में देखना जरूरी है।

उपलब्ध शोध के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राएं सुरक्षित कॉलेज तक पहुंचने के लिए पुरुषों की तुलना में सालाना 18,800 रुपये तक अधिक खर्च करने को तैयार थीं। यह अतिरिक्त खर्च केवल परिवहन का मामला नहीं था, बल्कि सुरक्षित रास्ते और बेहतर शैक्षणिक विकल्प तक पहुंच से जुड़ा था। शोध में यह भी सामने आया कि छात्राएं सुरक्षित रास्ते के लिए अतिरिक्त समय खर्च करने को तैयार थीं। 

इसलिए इस आंकड़े को सीधे बिहार की सभी महिलाओं का वास्तविक वार्षिक परिवहन खर्च बताना सही नहीं होगा। लेकिन यह आंकड़ा यह जरूर दिखाता है कि असुरक्षा की आर्थिक कीमत कितनी बड़ी हो सकती है।

असुरक्षा महिलाओं की आजादी को करती है प्रभावित

महिलाओं की गतिशीलता पर असुरक्षा का असर केवल यात्रा तक सीमित नहीं रहता। अगर कोई महिला शाम के बाद अकेले बाहर जाने से बचती है, तो उसका असर नौकरी, पढ़ाई, प्रशिक्षण, सामाजिक गतिविधियों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर पड़ सकता है।

कई महिलाएं ऐसी जगहों या कार्यक्रमों में जाने से बचती हैं जहां से देर रात लौटना मुश्किल हो। कुछ महिलाएं नौकरी का चुनाव करते समय कार्यालय और घर के बीच की दूरी तथा यात्रा की सुरक्षा को प्राथमिकता देती हैं।

इस तरह सुरक्षा का सवाल करियर के फैसलों को भी प्रभावित कर सकता है। बेहतर नौकरी उपलब्ध होने के बावजूद अगर वहां तक पहुंचने का रास्ता असुरक्षित है या देर रात घर लौटना पड़ता है, तो महिला उस अवसर को छोड़ सकती है।

महंगा परिवहन बनता है विकल्प

सुरक्षित यात्रा के लिए महिलाओं को कई बार सामान्य सार्वजनिक परिवहन की जगह महंगे साधनों का सहारा लेना पड़ता है। कैब और ऑटो जैसे विकल्प अपेक्षाकृत महंगे हो सकते हैं, लेकिन सुरक्षा की चिंता के कारण महिलाएं इन्हें चुनती हैं।

2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में भी महिलाओं के ‘सेफ्टी टैक्स’ की चर्चा की गई है। इसमें बताया गया कि कई महिलाएं रात में कम खर्च वाली सार्वजनिक परिवहन सेवा के बजाय कैब या ऑटो का इस्तेमाल करती हैं क्योंकि उन्हें ज्यादा सुरक्षित महसूस होता है। रिपोर्ट में दिल्ली के संदर्भ में 18,800 रुपये के वार्षिक अतिरिक्त खर्च वाले शोध का उल्लेख किया गया है। 

इससे साफ होता है कि परिवहन की कीमत केवल टिकट या किराए तक सीमित नहीं है। सुरक्षा की चिंता यात्रा की वास्तविक लागत को बढ़ा सकती है।

समय की पाबंदी भी बड़ी समस्या

महिलाओं के लिए सुरक्षा की समस्या केवल पैसों की नहीं है। समय भी एक महत्वपूर्ण कारक है।

कई महिलाएं देर शाम या रात में यात्रा करने से बचती हैं। उन्हें समय से पहले घर लौटना पड़ सकता है। इसका अर्थ है कि वे ऐसी नौकरी, कार्यक्रम या गतिविधि से दूरी बना सकती हैं जो देर तक चलती हो।

कई बार महिला को आखिरी बस या ट्रेन छूटने से पहले निकलना पड़ता है। यदि सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध नहीं है, तो उसे अधिक महंगे निजी वाहन का विकल्प चुनना पड़ता है।

इस तरह असुरक्षा महिलाओं से दो तरह की कीमत वसूल सकती है—एक आर्थिक और दूसरी समय की।

शिक्षा पर भी पड़ता है असर

सुरक्षित परिवहन की कमी का सीधा प्रभाव लड़कियों और छात्राओं की शिक्षा पर पड़ सकता है। अगर किसी कॉलेज या संस्थान तक पहुंचने का रास्ता असुरक्षित माना जाता है, तो परिवार छात्रा को वहां भेजने से बच सकता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं पर किए गए शोध में यह सामने आया कि छात्राएं सुरक्षित रास्ते वाले कम रैंक के कॉलेज को भी प्राथमिकता दे सकती हैं। इसका मतलब यह है कि सुरक्षा की चिंता शिक्षा की गुणवत्ता के चुनाव को भी प्रभावित कर सकती है।

बिहार में भी उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए लड़कियों को अपने घर से बाहर जाना पड़ता है। ऐसे में सुरक्षित परिवहन और छात्राओं के लिए भरोसेमंद यात्रा व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

रोजगार के अवसरों पर भी असर

महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए रोजगार तक पहुंच जरूरी है। लेकिन अगर यात्रा असुरक्षित, महंगी या समय लेने वाली हो, तो महिलाओं के रोजगार के विकल्प सीमित हो सकते हैं।

एक महिला नौकरी चुनते समय केवल वेतन नहीं देखती। उसे यह भी देखना पड़ सकता है कि ऑफिस से घर कितनी दूरी पर है, काम कितने बजे खत्म होगा और घर लौटने के लिए परिवहन की क्या व्यवस्था होगी।

अगर किसी नौकरी के लिए हर दिन महंगी कैब लेनी पड़े तो कम वेतन वाली नौकरी में उसका वास्तविक आर्थिक लाभ काफी कम हो सकता है।

परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी दबाव

महंगे परिवहन का असर केवल महिला की व्यक्तिगत आय पर नहीं पड़ता। कम आय वाले परिवारों में अतिरिक्त यात्रा खर्च पूरे परिवार के बजट को प्रभावित कर सकता है।

यदि किसी छात्रा या कामकाजी महिला को सुरक्षित यात्रा के लिए रोजाना अतिरिक्त राशि खर्च करनी पड़े, तो महीने के अंत में यह रकम काफी बड़ी हो सकती है। इसी कारण कई परिवार लड़कियों की शिक्षा या नौकरी के लिए लंबी दूरी की यात्रा को लेकर चिंतित रहते हैं।

सुरक्षित और सस्ता सार्वजनिक परिवहन इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है।

केवल मुफ्त बस पर्याप्त समाधान नहीं

महिलाओं के लिए सार्वजनिक परिवहन को सस्ता या मुफ्त करना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, लेकिन केवल किराया कम कर देने से सुरक्षा की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती।

अगर बस में भीड़ बहुत अधिक है, छेड़खानी का डर है, स्टॉप तक पहुंचने का रास्ता सुरक्षित नहीं है या रात में बस सेवा उपलब्ध नहीं है, तो महिलाएं फिर भी वैकल्पिक परिवहन चुन सकती हैं।

इसलिए महिला-केंद्रित परिवहन नीति में किराए के साथ-साथ सुरक्षा, समय, उपलब्धता और अंतिम छोर तक पहुंच को भी शामिल करना जरूरी है।

बिहार में क्या किए जाने की जरूरत है?

बिहार में महिलाओं की सुरक्षित आवाजाही बढ़ाने के लिए कई स्तरों पर काम किया जा सकता है। प्रमुख बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और सार्वजनिक परिवहन केंद्रों पर पर्याप्त रोशनी, सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी बढ़ाई जा सकती है।

रात के समय प्रमुख मार्गों पर सार्वजनिक परिवहन की नियमितता बढ़ाना भी जरूरी है। महिलाओं को ऐसी व्यवस्था मिलनी चाहिए जिससे उन्हें केवल सुरक्षा के लिए महंगी कैब पर निर्भर न रहना पड़े।

इसके अलावा, बसों और सार्वजनिक परिवहन में शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था को आसान और प्रभावी बनाया जाना चाहिए।

सुरक्षित शहर से बढ़ेगी महिलाओं की भागीदारी

किसी भी राज्य के आर्थिक विकास में महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण होती है। अगर महिलाएं सुरक्षित तरीके से शिक्षा, नौकरी और व्यवसाय तक पहुंच सकती हैं, तो इससे परिवार के साथ-साथ पूरी अर्थव्यवस्था को फायदा होता है।

सुरक्षित परिवहन महिलाओं को अधिक स्वतंत्रता देता है। वे बेहतर कॉलेज चुन सकती हैं, नौकरी के अधिक विकल्प तलाश सकती हैं और शाम के बाद भी आवश्यक गतिविधियों में हिस्सा ले सकती हैं।

इसके विपरीत, असुरक्षा उन्हें सीमित विकल्पों तक बांध सकती है।

‘सेफ्टी टैक्स’ को खत्म करने की जरूरत

महिलाओं से सुरक्षा के नाम पर अतिरिक्त आर्थिक और समय की कीमत वसूलना किसी भी समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है। सुरक्षित यात्रा किसी सुविधा की तरह नहीं बल्कि बुनियादी आवश्यकता की तरह देखी जानी चाहिए।

18,800 रुपये का शोध-आधारित आंकड़ा यह समझने में मदद करता है कि महिलाएं केवल डर के कारण किस तरह अतिरिक्त आर्थिक कीमत चुकाने को तैयार हो जाती हैं। हालांकि यह आंकड़ा बिहार की महिलाओं के लिए प्रत्यक्ष आंकड़ा नहीं है, लेकिन इससे समस्या की व्यापकता को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार मिलता है।

बिहार में महिलाओं की स्थिति को समझने के लिए राज्य-विशिष्ट सर्वेक्षण और आंकड़ों की जरूरत है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अलग-अलग शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं परिवहन, सुरक्षा और समय की पाबंदियों के कारण कितनी अतिरिक्त लागत वहन कर रही हैं।

महिलाओं की सुरक्षित आवाजाही केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है। यह शिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक भागीदारी से भी सीधे जुड़ा हुआ है।

जब कोई महिला सुरक्षित महसूस न होने के कारण सस्ता परिवहन छोड़कर महंगा साधन चुनती है, जल्दी घर लौटती है, किसी नौकरी को ठुकराती है या बेहतर कॉलेज के बजाय सुरक्षित रास्ते वाले संस्थान को चुनती है, तो इसका असर उसके भविष्य पर पड़ सकता है।

इसलिए बिहार में महिलाओं के लिए सुरक्षित, सस्ता और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन विकसित करना जरूरी है। सड़क से लेकर बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन से लेकर अंतिम गंतव्य तक सुरक्षा की पूरी श्रृंखला मजबूत करनी होगी।