साहित्यिक संस्था 'साहित्य सफर' द्वारा महान लेखिका महाश्वेता देवी की 10वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन; वक्ताओं ने उनके विद्रोही तेवर और शोषितों की आवाज बने साहित्य को किया याद

भागलपुर, विशेष संवाददाता: सिल्क सिटी भागलपुर में साहित्य और संस्कृति के संवर्धन के लिए सक्रिय प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था 'साहित्य सफर' के तत्वावधान में आधुनिक भारतीय साहित्य की पुरोधा, रमन मैग्सेसे और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित महान लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी की 10वीं पुण्यतिथि अत्यंत गरिमामय और वैचारिक माहौल में मनाई गई। शहर के एक प्रमुख सभागार में आयोजित इस श्रद्धांजलि सह विचार गोष्ठी की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार एवं रचनाकार जगतराम साह 'कर्णपुरी' ने की। इस अवसर पर भागलपुर के कई नामचीन साहित्यकार, बुद्धिजीवी, लेखक और युवा रचनाकार उपस्थित रहे, जिन्होंने महाश्वेता देवी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी और उनके विद्रोही तथा जनपक्षीय साहित्य पर विस्तार से चर्चा की।

दीप प्रज्ज्वलन और महाश्वेता देवी के व्यक्तित्व को नमन

कार्यक्रम की शुरुआत महाश्वेता देवी के तैल चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई।

साहित्य सफर की पहल: संस्था के सदस्यों ने अपने संबोधन में कहा कि महाश्वेता देवी केवल एक लेखिका नहीं थीं, बल्कि वे देश के हाशिए पर रह रहे आदिम जनजातियों, दलितों, शोषितों और मूलवासियों की मुखर आवाज थीं। उनकी लेखनी में वह ताकत थी जो सत्ता के गलियारों तक वंचितों की चीख को पहुंचा देती थी।

अध्यक्षीय उद्बोधन: कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार जगतराम साह 'कर्णपुरी' ने अपने अध्यक्षीय भाषण में महाश्वेता देवी के जीवन संघर्ष और उनके साहित्यिक अवदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि "महाश्वेता जी ने अपनी कला को केवल मनोरंजन या बौद्धिक विलास का साधन नहीं बनाया, बल्कि उसे सामाजिक न्याय और बदलाव का एक सशक्त हथियार बनाया।"

महाश्वेता देवी की कृतियां और बहुमुखी प्रतिभा पर विस्तृत चर्चा

विचार गोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने महाश्वेता देवी की प्रसिद्ध कृतियों और उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला:

'हजार चूर्णिवि की माँ' और 'अरण्येर अधिकार': वक्ताओं ने उनके उपन्यासों विशेषकर बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास 'अरण्येर अधिकार' (जंगल का अधिकार) और नक्सलबाड़ी आंदोलन की पृष्ठभूमि पर रचित मर्मस्पर्शी उपन्यास 'हजार चूर्णिवि की माँ' की चर्चा करते हुए कहा कि ये कृतियां भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। इन उपन्यासों में व्यवस्था की क्रूरता और आम इंसान के प्रतिरोध की जो गाथा मिलती है, वह साहित्य में दुर्लभ है।

पत्रकारिता और सामाजिक सक्रियता: वक्ताओं ने याद किया कि महाश्वेता देवी ने सिर्फ कलम नहीं चलाई, बल्कि वे आदिवासी अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरीं। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, बांकुड़ा और मेदिनीपुर के लोधा और शबर आदिवासियों के हक की लड़ाई में उन्होंने जिस तन्मयता से काम किया, वह लेखकों की एक नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।

शोषितों और उपेक्षितों की मसीहा थीं महाश्वेता देवी

गोष्ठी में शामिल वक्ताओं ने कहा कि महाश्वेता देवी का साहित्य इस बात का गवाह है कि जब-जब समाज में अन्याय और असमानता बढ़ेगी, तब-तब उनकी रचनाएं व्यवस्था को आईना दिखाने का काम करती रहेंगी।

उन्होंने आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति और उनके जल-जंगल-जमीन की लड़ाई को राष्ट्रीय फलक पर मुख्यधारा के साहित्य में जगह दिलाई।

आज के दौर में जब वैचारिक स्वतंत्रता और जनपक्षीय पत्रकारिता व साहित्य पर संकट मंडरा रहा है, महाश्वेता देवी के जीवन और उनके विद्रोही तेवर की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है।

श्रद्धांजलि सभा में इनकी रही प्रमुख उपस्थिति

कार्यक्रम के अंत में दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। इस वैचारिक और साहित्यिक आयोजन को सफल बनाने में भागलपुर के कई प्रतिष्ठित साहित्य प्रेमियों और 'साहित्य सफर' के कार्यकर्ताओं का विशेष योगदान रहा। इस अवसर पर शहर के उभरते युवा कवियों ने महाश्वेता देवी को समर्पित अपनी कुछ कविताएं भी पाठ कीं, जिसने पूरे माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया।

भागलपुर में 'साहित्य सफर' द्वारा महाश्वेता देवी की 10वीं पुण्यतिथि पर आयोजित यह स्मरणोत्सव इस बात का प्रतीक है कि महान रचनाकार कभी मरते नहीं, वे अपने विचारों और कृतियों के जरिए हमेशा जीवित रहते हैं। यह आयोजन नई पीढ़ी के लेखकों और पाठकों को समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराने में पूरी तरह सफल रहा।