राजकीय बालिका इंटर स्कूल में करोड़ों की लागत से बनी एस्ट्रोनॉमी लैब 'सफेद हाथी' साबित, संचालन के अभाव में धूल फांक रहे आधुनिक उपकरण

भागलपुर: विज्ञान शिक्षा को नई ऊंचाइयों पर ले जाने और छात्राओं में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति रुचि जगाने के उद्देश्य से भागलपुर के राजकीय बालिका इंटर स्कूल में स्मार्ट सिटी कंपनी द्वारा निर्मित 'एस्ट्रोनॉमी लैब' आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। लाखों-करोड़ों की लागत से तैयार यह आधुनिक प्रयोगशाला, जो कभी छात्राओं के लिए ज्ञान का नया द्वार खोलने वाली थी, आज संचालन की उचित व्यवस्था न होने के कारण मात्र एक बंद कमरे तक सिमट कर रह गई है।

उद्देश्य और वास्तविकता में बड़ा अंतर

इस लैब का निर्माण बेहद महत्वाकांक्षी योजना के तहत किया गया था। इसका उद्देश्य छात्राओं को सौरमंडल, ग्रह-नक्षत्र और अंतरिक्ष विज्ञान की जटिलताओं को व्यावहारिक रूप से समझाना था। योजना तो यहाँ तक थी कि केवल अपने स्कूल की ही नहीं, बल्कि शहर के अन्य स्कूलों के छात्र-छात्राओं को भी यहाँ लाकर खगोल विज्ञान का ज्ञान दिया जाएगा।

लेकिन, लैब के निर्माण के बाद से ही इसके संचालन को लेकर जो लापरवाही बरती गई, उसका परिणाम यह हुआ कि यह प्रयोगशाला अधिकांश समय बंद ही रहती है। छात्राओं में जो उत्साह लैब के उद्घाटन के समय दिखा था, वह अब पूरी तरह ठंडा पड़ चुका है, क्योंकि उन्हें इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

डिमॉन्स्ट्रेटर की नियुक्ति न होना मुख्य कारण

इस पूरी समस्या की जड़ लैब के संचालन के लिए प्रशिक्षित 'डिमॉन्स्ट्रेटर' की नियुक्ति न होना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी प्रयोगशाला में उसे चलाने वाला तकनीकी विशेषज्ञ न हो, तो वहां रखे गए महंगे और संवेदनशील उपकरण धीरे-धीरे निष्क्रिय हो जाते हैं।

इस संबंध में विद्यालय के प्रधानाचार्य अमरनाथ ने बताया कि लैब के निर्माण के समय ही विभाग को प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता के बारे में अवगत कराया गया था, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। वर्तमान स्थिति यह है कि लैब के लिए किसी विशेष शिक्षक की नियुक्ति नहीं है। लैब निर्माण के दौरान विद्यालय के करीब सात शिक्षकों को प्रशिक्षण जरूर दिया गया था, लेकिन उनमें से कई का स्थानांतरण हो चुका है। अब केवल दो या तीन प्रशिक्षित शिक्षक ही बचे हैं, जो अपने सीमित समय में छात्राओं को लैब से संबंधित जानकारी देने का प्रयास करते हैं, लेकिन यह नियमित गतिविधियों के लिए पर्याप्त नहीं है।

भवन निर्माण कार्य और अव्यवस्था

लैब के बंद रहने के पीछे केवल डिमॉन्स्ट्रेटर का अभाव ही नहीं, बल्कि अन्य प्रशासनिक खामियां भी हैं। प्रधानाचार्य के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से लैब भवन में कुछ अन्य कार्य चल रहे हैं, जिसके कारण भी लैब को बंद रखा गया है। एक मॉडल स्कूल होने के बावजूद, जहाँ नियमित प्रयोगों और प्रयोगशाला के अधिकतम उपयोग की अपेक्षा की जाती है, वहां इस प्रकार की अव्यवस्था शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ और प्रशासन?

शिक्षाविदों का मानना है कि केवल ढांचा खड़ा कर देने (Infra-building) से शिक्षा में सुधार नहीं होता। जब तक संचालन की जिम्मेदारी किसी विशिष्ट तकनीकी विशेषज्ञ को नहीं दी जाएगी, तब तक सरकारी संपत्ति का यह नुकसान होता रहेगा। स्मार्ट सिटी कंपनी की ओर से लैब तो बना दी गई, लेकिन उसके रखरखाव और निरंतर संचालन की 'एग्जिट पॉलिसी' या 'ऑपरेशनल जिम्मेदारी' तय न करना इस परियोजना की सबसे बड़ी विफलता है।

 भविष्य की उम्मीदें

एस्ट्रोनॉमी लैब का यह मामला भागलपुर के शिक्षा विभाग के लिए एक सबक है। यदि समय रहते डिमॉन्स्ट्रेटर की नियुक्ति नहीं की गई और संचालन के लिए एक सुदृढ़ व्यवस्था नहीं बनाई गई, तो यह करोड़ों के उपकरण पूरी तरह कबाड़ में बदल जाएंगे। छात्राओं की वैज्ञानिक सोच को विकसित करने का सपना तब तक अधूरा ही रहेगा जब तक इस लैब के दरवाजे नियमित रूप से उनके लिए नहीं खुलते।

अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इस 'एस्ट्रोनॉमी लैब' को पुनर्जीवित करने के लिए कोई ठोस कदम उठाता है या फिर यह लैब भी केवल फाइलों और खबरों तक ही सीमित रह जाएगी?