चंपारण सत्याग्रह से पहले 1917 में पहली बार छात्र सम्मेलन में भाग लेने भागलपुर आए थे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी; बापू के ऐतिहासिक आगमन की गौरवशाली गाथा

भागलपुर (विशेष संवाददाता): इतिहास के पन्नों में जब भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम और उनके बिहार प्रवास का जिक्र होता है, तो सबसे पहले चंपारण सत्याग्रह (1917) का नाम ज़ुबान पर आता है। लेकिन बहुत कम लोगों को यह ऐतिहासिक तथ्य मालूम है कि चंपारण की ऐतिहासिक धरती पर कदम रखने से ठीक पहले, बापू साल 1917 में पहली बार छात्र सम्मेलन में भाग लेने के लिए बिहार के सिल्क सिटी यानी भागलपुर आए थे। भागलपुर की यह पावन धरती इस बात की गवाह है कि कैसे एक साधारण बैरिस्टर से 'महात्मा' बनने की राह पर अग्रसर गांधी ने यहां के युवाओं, छात्रों और बुद्धिजीवियों के बीच वैचारिक बीज बोए थे। आज भी भागलपुर के लोग बापू के उस पहले कदम और उनके चार ऐतिहासिक संस्मरणों व जुड़ाव को बेहद गर्व के साथ याद करते हैं। यह यात्रा न केवल भागलपुर के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है, बल्कि आधुनिक भारतीय राजनीतिक और सामाजिक इतिहास का एक मील का पत्थर भी है।

चंपारण से पहले क्यों आए थे बापू भागलपुर? (ऐसी थी पृष्ठभूमि)

वर्ष 1917 की शुरुआत में जब देश ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अंगड़ाई ले रहा था, तब नील की खेती करने वाले किसानों की पीड़ा ने गांधीजी का ध्यान अपनी ओर खींचा था। राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर जब बापू बिहार आने वाले थे, तो उसके ठीक पहले उन्हें भागलपुर के युवाओं और छात्रों द्वारा आयोजित एक प्रतिष्ठित छात्र सम्मेलन (Student Conference) में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने का निमंत्रण मिला था।

छात्रों को संदेश: बापू हमेशा से यह मानते थे कि देश का भविष्य युवाओं और विद्यार्थियों के हाथों में है। इसलिए, व्यस्त कार्यक्रमों के बावजूद उन्होंने भागलपुर के छात्रों के बीच जाने का निमंत्रण सहर्ष स्वीकार किया।

भागलपुर रेलवे स्टेशन पर ऐतिहासिक स्वागत: वर्ष 1917 के उस दौर में जब अंग्रेजों का खौफ चरम पर था, भागलपुर के रेलवे स्टेशन पर हजारों की संख्या में छात्र और आम नागरिक बापू की एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़े थे। बिना किसी आधुनिक संचार माध्यम के इतनी बड़ी भीड़ का इकट्ठा होना यह बताता था कि गांधीजी का व्यक्तित्व उस समय भी लोगों के दिलों पर राज करने लगा था।

बापू के भागलपुर आगमन से जुड़े चार प्रमुख ऐतिहासिक संस्मरण (The Four Pillars of Bapu's Bhagalpur Visit)

इतिहासकारों और स्थानीय अभिलेखागार के दस्तावेजों के अनुसार, बापू के इस पहले भागलपुर दौरे से जुड़ी चार ऐसी महत्वपूर्ण बातें या घटनाएं हैं, जिन्हें भागलपुर के लोग आज भी 'बापू के चार ऐतिहासिक धरोहर' के रूप में याद करते हैं:

पहला संस्मरण: छात्र सम्मेलन में वैचारिक क्रांति का शंखनाद

भागलपुर में आयोजित उस छात्र सम्मेलन में बापू ने छात्रों को केवल पढ़ाई तक सीमित न रहने, बल्कि देश की राजनीतिक और सामाजिक दशा पर मंथन करने का आह्वान किया था।

उन्होंने युवाओं से स्वदेशी अपनाने और अपनी मातृभाषा व संस्कृति से प्रेम करने की जो अपील की थी, उसने भागलपुर के युवा वर्ग में एक नई क्रांति की अलख जगा दी थी। यहीं से कई युवा स्वतंत्रता सेनानी निकलकर सामने आए जिन्होंने बाद में असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

दूसरा संस्मरण: स्थानीय बुद्धिजीवियों और वकीलों के साथ गुप्त मंत्रणा

भागलपुर अपने समय का एक प्रमुख न्यायिक और शैक्षणिक केंद्र था। यहां के प्रख्यात वकीलों और बुद्धिजीवियों (जैसे मदन मोहन झा और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों) ने बापू से मुलाकात की थी।

इस बैठक में बापू ने अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ कानूनी और वैचारिक रूप से लड़ने की रणनीति पर चर्चा की। इसी बैठक ने आगे चलकर चंपारण की रूपरेखा तैयार करने में भी अप्रत्यक्ष रूप से मदद की थी।

तीसरा संस्मरण: सादगी और आम जनता से जुड़ाव

भागलपुर प्रवास के दौरान बापू ने किसी शाही अतिथिगृह या विलासितापूर्ण स्थान पर ठहरने से इनकार कर दिया था। वे एक साधारण कार्यकर्ता के आवास पर रुके और बेहद सादपूर्ण भोजन ग्रहण किया।

स्टेशन से लेकर सभा स्थल तक जाने के दौरान उन्होंने जिस प्रकार आम रिक्शा चालकों, मजदूरों और गरीबों से संवाद किया, उसने यह साबित कर दिया कि वे महलों के नहीं बल्कि गरीबों के नेता हैं।

चौथा संस्मरण: चंपारण सत्याग्रह की मजबूत नींव

भागलपुर के इस छात्र सम्मेलन और जनसभा के दौरान बापू ने जो जनसमर्थन देखा, उसने उनके भीतर यह विश्वास और दृढ़ कर दिया कि पूरा बिहार उनके साथ खड़ा है।

यहां से प्रेरणा और ऊर्जा लेकर ही बापू सीधे चंपारण की ओर रवाना हुए थे, जहां उन्होंने नील किसानों के अधिकारों के लिए ऐतिहासिक 'चंपारण सत्याग्रह' का सफल नेतृत्व किया। इतिहासकार मानते हैं कि भागलपुर की इस यात्रा ने ही चंपारण आंदोलन की पृष्ठभूमि को सबसे मजबूत वैचारिक आधार दिया था।

भागलपुर की स्मृतियों में आज भी जीवित हैं बापू

आज भले ही 1917 का वह दौर गुजरे एक सदी से अधिक का समय बीत चुका हो, लेकिन भागलपुर की आबोहवा में आज भी महात्मा गांधी के उन पलों की महक महसूस की जा सकती है:

ऐतिहासिक इमारतें और स्थल: शहर के जिन स्थानों पर बापू ने बैठकें की थीं या जिन शैक्षणिक संस्थानों से उनका जुड़ाव रहा, वे आज भी शहर की ऐतिहासिक धरोहर हैं। हालांकि, समय के साथ कई इमारतें जीर्ण-शीर्ण हो चुकी हैं, लेकिन स्थानीय लोगों की स्मृतियों में वे आज भी अमर हैं।

युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा: भागलपुर के युवा आज भी जब यह जानते हैं कि चंपारण जाने से पहले बापू ने उनके शहर के छात्रों को संबोधित किया था, तो उनके भीतर देशप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा की एक नई ऊर्जा का संचार होता है।

महात्मा गांधी का 1917 में भागलपुर आना और छात्र सम्मेलन में शिरकत करना केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा स्वर्णिम पृष्ठ था जिसने बिहार के युवाओं को अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा दी। बापू के जीवन से जुड़े वे चार महत्वपूर्ण संस्मरण आज भी हमें यह याद दिलाते हैं कि नेतृत्व, सादगी और वैचारिक दृढ़ता से ही बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। सिल्क सिटी भागलपुर को इस बात पर हमेशा गर्व रहेगा कि राष्ट्रपिता ने उसके आंगन में कदम रखकर देश की आजादी की लड़ाई को एक नई दिशा और ऊर्जा प्रदान की थी।