बृज बिहारी प्रसाद बनाम छोटन शुक्ला गैंग; वीकेंड की खूनी वारदातों से थर्रा उठा था बिहार का अंडरवर्ल्ड और सियासी गलियारा

भारतीय राजनीतिक और आपराधिक इतिहास में 1990 का दशक एक ऐसा कालखंड माना जाता है, जब राज्य की सत्ता, बाहुबल और अंडरवर्ल्ड की दुनिया के बीच की रेखाएं पूरी तरह धुंधली हो चुकी थीं। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में इस दशक के दौरान अपराध का एक नया और भयानक अध्याय लिखा गया, जिसे 'गैंगवार' (Gangwar) के नाम से जाना जाता है। इस खूनी खेल के केंद्र में था बिहार, और बिहार की राजधानी पटना से लेकर उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर, वैशाली और मोतिहारी तक का इलाका वर्चस्व की इस खूनी लड़ाई का अखाड़ा बन चुका था।

इस दौर की सबसे चर्चित, खौफनाक और बिहार की राजनीति की चूलें हिला देने वाली दुश्मनी थी—राजनेता सह बाहुबली बृज बिहारी प्रसाद और अपराध जगत के सरगना छोटन शुक्ला गैंग के बीच की खूनी जंग। इन दोनों धड़ों के बीच वर्चस्व की लड़ाई इतनी भीषण थी कि अक्सर वीकेंड (सप्ताहांत - शनिवार और रविवार) की शाम को होने वाली ताबड़तोड़ हत्याओं से बिहार का अंडरवर्ल्ड और प्रशासनिक तंत्र अंदर तक हिल जाता था। आइए नब्बे के दशक के उस खौफनाक दौर, बृज बिहारी प्रसाद और छोटन शुक्ला गैंग के संघर्ष, वीकेंड पर होने वाले सनसनीखेज मर्डर और उस दौर के राजनीतिक-अपराध गठजोड़ का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।

पृष्ठभूमि: नब्बे के दशक का बिहार और बाहुबल का उदय

नब्बे के दशक की शुरुआत में बिहार की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में भारी फेरबदल हो रहा था। जातियों के समीकरण बदल रहे थे और इसी दौर में राज्य के भीतर आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए हथियारों का खुला इस्तेमाल शुरू हुआ।

सत्ता और बंदूक का गठजोड़: सरकारी ठेके, टेंडर, कोयला, बालू और आरा मिलों के कारोबार पर कब्जा जमाने के लिए छोटे-छोटे गिरोह अब संगठित आपराधिक सिंडिकेट में बदल चुके थे। इन गिरोहों को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण भी मिल रहा था, जिससे उनके हौसले सातवें आसमान पर थे।

बृज बिहारी प्रसाद और छोटन शुक्ला का उभार: एक तरफ जहाँ बृज बिहारी प्रसाद ने छात्र राजनीति से होते हुए सहकारिता और ठेकेदारी के जरिए सियासत में अपनी मजबूत पकड़ बनाई और बाद में मंत्री बने, वहीं दूसरी तरफ छोटन शुक्ला और उसके साथियों ने उत्तर बिहार के इलाके में समानांतर सत्ता खड़ी कर दी थी। दोनों पक्षों के बीच अहंकार, ठेकों के वर्चस्व और राजनीतिक वर्चस्व की ऐसी आग भड़की जिसने कई हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया।

वीकेंड का खौफ: जब सप्ताहांत की शामें बन जाती थीं मौत का पैगाम

इस गैंगवार की सबसे डरावनी विशेषता यह थी कि इसके नायक या उनके ठिकाने अक्सर वीकेंड (शनिवार और रविवार) पर सबसे ज्यादा सक्रिय होते थे, और इसी दौरान कई सनसनीखेज हत्याओं को अंजाम दिया जाता था।

वीकेंड मर्डर का खौफनाक ट्रेंड: जब पूरा राज्य या शहर सप्ताहांत की छुट्टियों और आराम के मूड में होता था, तब पटना के पॉश इलाकों, डाक बंगला चौराहे, बोरिंग रोड या उत्तर बिहार के हाइवे पर गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठती थी। छोटन शुक्ला गैंग और बृज बिहारी प्रसाद के करीबियों के बीच होने वाली यह खूनी भिड़ंत अक्सर वीकेंड की शामों को ही अपनी गिरफ्त में लेती थी।

बदले की अंतहीन आग: एक पक्ष द्वारा शनिवार को किसी खास गुर्गे को ठिकाने लगाने के बाद, दूसरे पक्ष द्वारा रविवार की रात को या अगले वीकेंड पर उससे भी बड़ी वारदात को अंजाम देकर बदला लिया जाता था। इस 'Tit for Tat' (जैसे को तैसा) की संस्कृति ने बिहार के आम नागरिकों के मन में ऐसा खौफ पैदा कर दिया था कि लोग सूरज ढलते ही अपने घरों में दुबक जाते थे।

छोटन शुक्ला की हत्या और उसके दूरगामी परिणाम

इस वर्चस्व की लड़ाई में सबसे बड़ा भूचाल तब आया जब छोटन शुक्ला की हत्या कर दी गई, जिसने इस गैंगवार को एक बिल्कुल ही नए और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया।

हत्या का वह काला दिन: छोटन शुक्ला, जो उत्तर बिहार के एक ताकतवर और खौफनाक चेहरे के रूप में उभरे थे, की हत्या के बाद राज्य की राजनीति में भूचाल आ गया। छोटन शुक्ला के समर्थकों और उनके गिरोह का मानना था कि इस हत्याकांड के पीछे बृज बिहारी प्रसाद और उनके सिंडिकेट का हाथ है।

शव यात्रा में उमड़ा जनसैलाब और हिंसा: छोटन शुक्ला की अंतिम यात्रा के दौरान पटना की सड़कों पर जिस प्रकार का कोहराम मचा और हिंसा हुई, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि अब यह लड़ाई केवल दो गैंगों के बीच की नहीं रह गई है, बल्कि यह एक खुली सिविल वॉर जैसी स्थिति बन चुकी थी। छोटन शुक्ला की मौत के बाद उनके भाई भुअर शुक्ला और गिरोह के अन्य सदस्यों (जैसे भूपेंद्रनाथ दुबे या अन्य शार्पशूटर्स) ने कसम खाई कि वे इस खून का बदला लेकर रहेंगे।

बृज बिहारी प्रसाद की हत्या: इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) का वह खूनी कांड

छोटन शुक्ला की हत्या का बदला लेने के लिए रची गई साजिश का अंत उस घटना के साथ हुआ जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।

जेल से अस्पताल और फिर घात: बृज बिहारी प्रसाद एक मामले में आरोपी होने के कारण पटना के बेउर जेल में बंद थे और खराब स्वास्थ्य के कारण उन्हें पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS - शेखपुरा) के अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया था। पुलिस की भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद, हमलावरों को इस बात की पूरी टोह थी कि वे कब और कैसे हमला करेंगे।

गोलियों की बौछार: 13 जून 1998 की शाम (जो कि एक बार फिर सप्ताहांत के करीब का समय था) को जब बृज बिहारी प्रसाद अस्पताल परिसर में टहल रहे थे या सुरक्षाकर्मियों के साथ थे, तब अत्याधुनिक हथियारों से लैस अपराधियों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर उनकी और उनके एक अंगरक्षक की हत्या कर दी। इस सनसनीखेज हत्याकांड ने साबित कर दिया कि बिहार के अंडरवर्ल्ड में कानून और पुलिसिया सुरक्षा के कोई मायने नहीं रह गए थे।

प्रशासनिक नाकामी और शासन-प्रशासन पर सवाल

नब्बे के दशक के इन खूनी वीकेंड्स और गैंगवारों ने उस समय की सरकारों और पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए।

अपराधियों के आगे लाचार तंत्र: जब खुलेआम सड़कों, अस्पतालों और चौराहों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई जा रही थीं, तब पुलिस और खुफिया एजेंसियां या तो पूरी तरह विफल थीं या फिर राजनीतिक दबाव के कारण मूकदर्शक बनी हुई थीं।

न्यायपालिका और लंबी कानूनी लड़ाई: बृज बिहारी प्रसाद की हत्या के बाद चली लंबी अदालती लड़ाई में कई नाम सामने आए, जिनमें बाहुबली विधायक आनंद मोहन और अन्य लोगों के नाम चर्चा में रहे। हालांकि, इस पूरे दौर ने बिहार की छवि को देश और दुनिया भर में 'क्राइम कैपिटल' के रूप में स्थापित कर दिया था।

नब्बे के दशक में बृज बिहारी प्रसाद और छोटन शुक्ला गैंग के बीच वर्चस्व की लड़ाई और वीकेंड पर होने वाले मर्डर की घटनाएं बिहार के इतिहास का वह काला पन्ना हैं, जिसे कोई भी भूलाना नहीं चाहेगा। यह दौर केवल दो गिरोहों की आपसी रंजिश का नहीं था, बल्कि यह उस व्यवस्था का पतन था जहाँ कानून का राज कमजोर पड़ गया था और बारूद की गंध ने लोकतंत्र की हवा को जहरीला कर दिया था। आज भले ही बिहार उस दौर से काफी आगे निकल चुका है और आधुनिक पुलिसिंग व विकास ने राज्य की तस्वीर को बदला है, लेकिन नब्बे के दशक के वे खूनी वीकेंड और गैंगवार के घाव आज भी लोगों के जेहन में एक चेतावनी के रूप में जीवित हैं कि सत्ता और बाहुबल का मिलन समाज के लिए कितना विनाशकारी साबित हो सकता है।