मुजफ्फरपुर मॉडल अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं का संकट: पैथोलॉजी जांच ठप होने से मरीजों की बढ़ी मुसीबतें

मुजफ्फरपुर के मॉडल अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं का एक दुखद और चिंताजनक पहलू सामने आया है। अस्पताल के पैथोलॉजी जांच केंद्र में हेपेटाइटिस बी, यूरिन और ब्लड ग्रुप जैसी महत्वपूर्ण जांचें पिछले कुछ दिनों से पूरी तरह बंद पड़ी हैं। इस अव्यवस्था का खामियाजा उन मरीजों और गरीब परिवारों को भुगतना पड़ रहा है, जो सरकारी अस्पताल से मुफ्त या सस्ती स्वास्थ्य सेवा की उम्मीद लेकर आते हैं।

संकट का विवरण: 150 मरीजों की दिनभर की दौड़-भाग

मॉडल अस्पताल में रोज सैकड़ों की संख्या में मरीज इलाज के लिए आते हैं। आंकड़ों के अनुसार, केवल एक दिन में लगभग 150 गर्भवती महिलाओं और अन्य गंभीर रोगियों को जांच न हो पाने के कारण बैरंग वापस लौटना पड़ा। हेपेटाइटिस बी, यूरिन और ब्लड ग्रुप जैसी जांचें किसी भी मरीज के उपचार, विशेषकर प्रसव के दौरान, अत्यंत आवश्यक होती हैं। इनके बिना डॉक्टर न तो दवा लिख सकते हैं और न ही सर्जरी या डिलीवरी की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते हैं।

मरीजों पर आर्थिक बोझ: मजबूरी में निजी पैथोलॉजी का रुख

सरकारी अस्पताल में सुविधाएं न मिलने के कारण मरीजों के पास निजी पैथोलॉजी सेंटरों के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। निजी केंद्रों पर यही जांचें कई गुना अधिक दरों पर की जा रही हैं।

गरीबी बनाम उपचार: अस्पताल आने वाले अधिकांश मरीज निम्न आर्थिक वर्ग से हैं। निजी केंद्रों के महंगे दामों ने उनकी कमर तोड़ दी है।

समय और स्वास्थ्य की बर्बादी: जांच के लिए बाहर जाने में मरीजों का समय बर्बाद हो रहा है और उनकी शारीरिक स्थिति पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। कई मामलों में गर्भवती महिलाओं को कमजोरी की स्थिति में भी पैदल या ऑटो से बाहर की दुकानों पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

प्रशासनिक विफलता और संसाधनों का अभाव

अस्पताल के पैथोलॉजी केंद्र में जांच बंद होने के पीछे मुख्य कारणों में रीएजेंट्स (Reagents) और जरूरी केमिकल की कमी को माना जा रहा है। अस्पताल प्रशासन की ओर से इस समस्या का त्वरित समाधान न करना कई सवाल खड़े करता है:

अनुमान का अभाव: क्या अस्पताल प्रशासन को इन जरूरी केमिकल की समाप्ति का पहले से अंदाजा नहीं था?

खरीद प्रक्रिया में देरी: सरकारी खरीद प्रक्रिया की धीमी गति मरीजों के स्वास्थ्य से ऊपर कैसे हो सकती है?

जवाबदेही का संकट: मरीजों की इतनी बड़ी संख्या के प्रभावित होने के बावजूद किसी भी अधिकारी द्वारा वैकल्पिक व्यवस्था (जैसे अन्य सरकारी केंद्रों से सामंजस्य) क्यों नहीं की गई?

मरीजों और परिजनों का आक्रोश

अस्पताल परिसर में दिनभर भारी गहमागहमी और मरीजों का आक्रोश देखने को मिला। गर्भवती महिलाओं के परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए कहा कि जब अस्पताल में जांच ही नहीं हो सकती, तो मॉडल अस्पताल का दर्जा किस काम का? मरीजों का आरोप है कि उन्हें जानबूझकर बाहर निजी केंद्रों की ओर धकेला जा रहा है ताकि दलालों को लाभ मिल सके।

स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल

मॉडल अस्पताल का उद्देश्य जिले में बेहतर और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करना था। लेकिन, पैथोलॉजी जैसी बुनियादी सेवा का ठप हो जाना इस मॉडल के दावों की पोल खोलता है।

प्रसव संबंधी चुनौतियां: गर्भवती महिलाओं के लिए ब्लड ग्रुप की जांच अत्यंत अनिवार्य है। बिना ब्लड ग्रुप जाने डिलीवरी करना जोखिम भरा होता है। जांच बंद होने से जच्चा-बच्चा की जान जोखिम में पड़ सकती है।

निजी माफिया का दबदबा: अस्पताल के ठीक बाहर स्थित निजी पैथोलॉजी केंद्र सरकारी मशीनरी की नाकामी का फायदा उठा रहे हैं।

समाधान की ओर: प्रशासन को क्या करना चाहिए?

इस स्थिति को देखते हुए निम्नलिखित कदम तत्काल उठाए जाने की आवश्यकता है:

तत्काल केमिकल आपूर्ति: अस्पताल प्रबंधन को स्थानीय स्तर या जिला स्वास्थ्य समिति के माध्यम से तत्काल रीएजेंट्स की खरीद कर जांच केंद्र को पुनर्जीवित करना चाहिए।

वैकल्पिक केंद्र का सहारा: जब तक अस्पताल में व्यवस्था ठीक नहीं होती, तब तक पास के सदर अस्पताल या अन्य सरकारी लैब से मरीजों को जोड़कर नि:शुल्क जांच की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

उच्च स्तरीय जांच: इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ जवाबदेही तय होनी चाहिए कि क्यों जांच केंद्र में स्टॉक खत्म होने से पहले व्यवस्था नहीं की गई।

निजी केंद्रों पर नकेल: स्वास्थ्य विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस संकट के समय निजी लैब मनमाने दाम न वसूलें।

मुजफ्फरपुर का मॉडल अस्पताल इस समय एक प्रशासनिक संकट से गुजर रहा है। स्वास्थ्य सेवा का मतलब केवल भवन या डॉक्टर नहीं, बल्कि समय पर उपलब्ध जांच और उपचार भी है। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं निकाला गया, तो यह लापरवाही किसी बड़े स्वास्थ्य हादसे का कारण बन सकती है। आम जनता अब केवल यह चाहती है कि अस्पताल में जांच की मशीनें और जरूरी दवाएं निर्बाध रूप से उपलब्ध रहें ताकि उन्हें अपनी मेहनत की कमाई निजी केंद्रों के लुटेरे हाथों में न सौंपनी पड़े।