सहरसा के गौतमनगर निवासी सेवानिवृत्त गजेंद्र प्रसाद सिंह पीएफ भुगतान के लिए काट रहे दफ्तरों के चक्कर; स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद भी नहीं पसीजा जिम्मेदारों का दिल

सरकारी सेवा पूरी करने के बाद हर कर्मचारी को यह उम्मीद होती है कि उसके सेवानिवृत्ति (Retirement) के बाद मिलने वाले वित्तीय लाभ—जैसे भविष्य निधि (Provident Fund - PF), ग्रेच्युटी और पेंशन—से उसका बुढ़ापा सुकून से कटेगा। लेकिन जब यही जीवनभर की कमाई प्रशासनिक लालफीताशाही और उदासीनता की भेंट चढ़ जाती है, तो एक बुजुर्ग का जीवन किस प्रकार संघर्ष और जिल्लत में बदल जाता है, इसकी एक दर्दनाक और आँखें खोल देने वाली दास्तान सहरसा जिले से सामने आई है।

सहरसा जिले के गौतमनगर (Gautamnagar) निवासी गजेंद्र प्रसाद सिंह (Gajendra Prasad Singh), जो आज से ठीक तीस साल पहले यानी 1996 में अपनी सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे, पिछले तीन दशकों (30 वर्षों) से अपने हक के पीएफ (PF) भुगतान को पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। नब्बे के दशक में रिटायर होने वाले गजेंद्र प्रसाद सिंह ने पिछले तीस सालों में अनगिनत बार विभिन्न संबंधित अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर काटे, कागजी दस्तावेज जमा किए और न्याय की गुहार लगाई, लेकिन उन्हें आज तक सिर्फ कोरे आश्वासन और निराशा के अलावा कुछ नहीं मिला। आज की तारीख में उनकी उम्र और बिगड़ता स्वास्थ्य उन्हें दफ्तरों तक जाने की इजाजत नहीं देता, लेकिन उनके भीतर का यह दर्द और प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति रोष इस बात का जीता-जागता सबूत है कि हमारी व्यवस्था कितनी संवेदनशील हो चुकी है। आइए गजेंद्र प्रसाद सिंह के इस दर्दनाक संघर्ष, तीस साल के लंबे इंतजार, प्रशासनिक लापरवाही और एक बुजुर्ग की लाचारी का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।

प्रकरण की पृष्ठभूमि: 1996 की सेवानिवृत्ति और उम्मीदों का टूटना

किसी भी सरकारी या अर्ध-सरकारी कर्मचारी के लिए सेवानिवृत्ति का दिन उसके जीवन का एक नया अध्याय होता है, जहाँ वह अपने परिवार के साथ चैन की जिंदगी बिताना चाहता है।

सेवाकाल की समाप्ति और कागजी प्रक्रिया: गजेंद्र प्रसाद सिंह ने अपनी पूरी सक्रिय कार्य अवधि के दौरान पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ अपनी सेवाएँ दीं। वर्ष 1996 में जब वे सेवानिवृत्त हुए, तो उन्होंने नियमानुसार अपने भविष्य निधि (PF) और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान के लिए फाइलें जमा कराईं।

शुरुआती टालमटोल: शुरुआत में उन्हें लगा कि कुछ महीनों की औपचारिकता के बाद उनका पैसा उनके खाते में आ जाएगा। लेकिन वह कुछ महीने साल-दर-साल और फिर दशक-दर-दशक में बदलते चले गए। विभाग के चक्कर काटते-काटते उनके जूते घिस गए, लेकिन फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक नहीं पहुँच पाई।

तीस साल का लंबा संघर्ष: दफ्तरों के चक्कर और कोरे आश्वासन

तीन दशक यानी 30 साल का समय किसी भी इंसान की आधी जिंदगी या उसके जीवन का सबसे सक्रिय और लंबा हिस्सा होता है। इन तीस वर्षों में गजेंद्र प्रसाद सिंह ने क्या कुछ नहीं झेला।

अधिकारियों की चौखट पर गुहार: सहरसा के गौतमनगर से लेकर विभिन्न विभागीय दफ्तरों और जिला मुख्यालय के चक्कर काटते-काटते गजेंद्र प्रसाद सिंह के बाल सफेद हो गए और शरीर कमजोर हो गया। उन्होंने कई पीढ़ियों के अधिकारियों को बदलते देखा, अपनी अर्जी दी, गिड़गिड़ाए, लेकिन हर बार उन्हें केवल "फाइल प्रक्रियाधीन है" (File is under process) का रटा-रटाया जवाब मिला।

लालफीताशाही का शिकार: भ्रष्टाचार और सुस्त कार्यसंस्कृति की वजह से उनकी फाइल या तो गुम कर दी गई या फिर जानबूझकर दबा दी गई। एक बुजुर्ग नागरिक के लिए अपने ही पैसे पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटना किसी यातना से कम नहीं है।

स्वास्थ्य बिगड़ने और लाचारी का दौर: अब दफ्तर जाने की भी नहीं बची शक्ति

उम्र के इस पड़ाव पर पहुँचकर जहाँ बुजुर्गों को सहारे और आराम की जरूरत होती है, वहीं गजेंद्र प्रसाद सिंह आज शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुके हैं।

टूटता स्वास्थ्य: लगातार मानसिक तनाव, उम्र से जुड़ी बीमारियाँ और न्याय न मिलने की घुटन ने उनके स्वास्थ्य को बेहद गंभीर रूप से प्रभावित किया है। वे अब बिस्तर पर रहने को मजबूर हैं।

शक्ति का आभाव: अब स्थिति यह है कि उनके पैरों में वह ताकत नहीं बची है कि वे अधिकारियों के कार्यालयों में जाकर अपनी फरियाद सुना सकें। उनके परिवार के पास भी अब न तो भागदौड़ करने के लिए पर्याप्त संसाधन बचे हैं और न ही किसी अधिकारी की मिन्नतें करने की ऊर्जा। तीस साल का यह लंबा इंतजार अब एक भयानक त्रासदी में बदल चुका है।

प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़ा सवालिया निशान

यह मामला केवल एक व्यक्ति के पीएफ भुगतान का नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी प्रशासनिक और सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा कलंक है।

जवाबदेही का अभाव: यदि कोई कर्मचारी 1996 में रिटायर होता है और 2026 तक यानी 30 साल बीत जाने के बाद भी उसे उसका हक नहीं मिलता, तो इसे व्यवस्था की नाकामी के अलावा और क्या कहा जा सकता है? क्या संबंधित विभाग के अधिकारियों को इस बात का जरा भी अहसास नहीं है कि वे एक बुजुर्ग नागरिक के साथ कितना बड़ा अन्याय कर रहे हैं?

मानवीय संवेदनाओं का पतन: सरकारी दफ्तरों में बैठी मशीनरी किस तरह मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रख देती है, इसका यह सबसे जीवंत और वीभत्स उदाहरण है।

सहरसा के गौतमनगर निवासी गजेंद्र प्रसाद सिंह की यह व्यथा हर संवेदनशील नागरिक के दिल को झकझोर देने वाली है। तीस साल तक अपने ही पैसे के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद अब स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण घर पर लाचार बैठे गजेंद्र प्रसाद सिंह न्याय की अंतिम आस लगाए बैठे हैं। यह समय जिला प्रशासन, राज्य सरकार और संबंधित पीएफ विभाग के उच्चाधिकारियों के लिए नींद से जागने का है। आवश्यकता इस बात की है कि इस मामले में तत्काल संज्ञान लेते हुए विशेष टीम का गठन किया जाए, फाइलों के मकड़जाल को दरकिनार कर त्वरित गति से उनका संपूर्ण पीएफ भुगतान ब्याज सहित उनके खाते में भेजा जाए, ताकि इस बुजुर्ग को उनके जीवन के अंतिम पड़ाव पर थोड़ा सुकून मिल सके और व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास बहाल हो सके।