राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क हादसों में 'गोल्डन आवर' के तहत बचेगी जिंदगियां; मायागंज अस्पताल (जेएलएनएमसीएच) को लेवल-1 या 2 ट्रॉमा सेंटर के रूप में अधिसूचित करने की तैयारी तेज
भागलपुर, मुख्य संवाददाता: देश भर के राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways) पर सफर करने वाले यात्रियों और सड़क दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल होने वाले पीड़ितों के लिए एक बेहद राहत भरी और बड़ी खबर सामने आ रही है। बिहार सरकार ने सड़क हादसों के दौरान होने वाली मौतों के आंकड़ों पर लगाम लगाने और दुर्घटना के बाद के शुरुआती अहम घंटों—यानी 'गोल्डन आवर' (Golden Hour)—में मरीजों को त्वरित और उच्च स्तरीय चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। इसके तहत भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल (JLNMCH / मायागंज अस्पताल) सहित राज्य के 29 प्रमुख अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों को 'लेवल-1' या 'लेवल-2' ट्रॉमा सेंटर के रूप में अधिसूचित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
इस बहुप्रतीक्षित पहल के धरातल पर उतरने से न केवल भागलपुर बल्कि पूरे अंग क्षेत्र और पूर्वी बिहार के लाखों लोगों को आपातकालीन चिकित्सा के क्षेत्र में एक नया जीवनदान मिलने की उम्मीद बंध गई है।
क्या है 'गोल्डन आवर' और क्यों पड़ी ट्रॉमा सेंटर की जरूरत?
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों और चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, किसी भी गंभीर सड़क दुर्घटना के बाद का पहला एक घंटा यानी 'गोल्डन आवर' मरीज की जान बचाने के लिए सबसे ज्यादा निर्णायक होता है। यदि इस दौरान घायल व्यक्ति को न्यूरोसर्जन, ऑर्थोपेडिक सर्जन, अत्याधुनिक वेंटिलेटर, डिजिटल सीटी स्कैन और तुरंत ऑपरेशन थिएटर (OT) जैसी उन्नत चिकित्सा सुविधाएं मिल जाएं, तो अधिकांश गंभीर मरीजों की जान बचाई जा सकती है।
लेकिन, अब तक संसाधनों के अभाव और विशेषीकृत ट्रॉमा सेंटरों की कमी के कारण भागलपुर और आसपास के इलाकों में सड़क हादसों के घायलों को समय पर उच्च स्तरीय इलाज नहीं मिल पाता था। मायागंज अस्पताल में हर साल सड़क दुर्घटनाओं के हजारों गंभीर मरीज पहुंचते हैं, जिनमें से समय पर न्यूरो या एडवांस सर्जरी न मिलने के कारण कई मरीजों को दम तोड़ना पड़ता है या फिर उन्हें मजबूरन पटना, सिलीगुड़ी या कोलकाता रेफर करना पड़ता है। इस नई प्रशासनिक योजना के लागू होने से इस विभीषिका पर बहुत हद तक अंकुश लग सकेगा।
राज्य के 29 अस्पतालों में शामिल है मायागंज अस्पताल (जेएलएनएमसीएच)
बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा बनाई गई इस विशेष योजना के तहत राज्य भर के कुल 29 प्रमुख अस्पतालों को चुना गया है, जो राष्ट्रीय राजमार्गों (NH) के नजदीक स्थित हैं और जहां बड़े पैमाने पर मरीजों का दबाव रहता है। चूंकि भागलपुर जिला प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों और व्यस्त सड़क मार्गों से जुड़ा हुआ है और यहाँ लगातार सड़क हादसों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए जेएलएनएमसीएच को इस योजना के केंद्र में रखा गया है।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, जेएलएनएमसीएच या इससे संबद्ध सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक में उपलब्ध चिकित्सीय बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करते हुए इसे 'लेवल-1' या 'लेवल-2' के मानकों के अनुरूप तैयार किया जाएगा, ताकि गंभीर से गंभीर ट्रॉमा केस (सिर में गंभीर चोट, आंतरिक रक्तस्राव, बहु-अंग फ्रैक्चर आदि) का इलाज यहीं सफलता पूर्वक किया जा सके।
अस्पतालों से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट, तय हो रहे हैं मानक
लेवल-1 या लेवल-2 ट्रॉमा सेंटर के रूप में आधिकारिक अधिसूचना जारी करने से पहले स्वास्थ्य विभाग ने जेएलएनएमसीएच प्रबंधन से बुनियादी सुविधाओं और संसाधनों का पूरा ब्योरा तलब किया है। अस्पताल प्रशासन को ईमेल के माध्यम से एक विस्तृत रिपोर्ट भेजने का निर्देश दिया गया है, जिसमें निम्नलिखित बिंदुओं पर मुख्य रूप से फोकस किया जा रहा है:
भागलपुर का जेएलएनएमसीएच केवल जिले के ही नहीं, बल्कि बांका, कटिहार, पूर्णिया, खगड़िया, मुंगेर और झारखंड के गोड्डा व देवघर जैसे पड़ोसी जिलों के मरीजों का भी मुख्य आसरा है। ऐसे में जब यह अस्पताल एक विधिवत अधिसूचित उच्च-स्तरीय ट्रॉमा सेंटर के रूप में कार्य करना शुरू कर देगा, तो सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को महंगे निजी अस्पतालों का चक्कर नहीं काटना पड़ेगा। गरीब और लाचार परिवार के लोग भी कम खर्च में अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे।
जेएलएनएमसीएच भागलपुर को लेवल-1 या लेवल-2 ट्रॉमा सेंटर के रूप में अधिसूचित करने की यह कवायद बिहार सरकार की सड़क सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यदि संबंधित औपचारिकताएं और रिपोर्टिंग प्रक्रिया पूरी होने के बाद इस पर जमीनी स्तर पर त्वरित अमल होता है, तो आने वाले दिनों में भागलपुर और आसपास के राष्ट्रीय राजमार्गों पर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में अनमोल जिंदगियों को बचाने में बहुत बड़ी सफलता मिलेगी।