PMCH में जूनियर डॉक्टर से मारपीट के विरोध में ढाई घंटे कार्य बहिष्कार, 65 ऑपरेशन टले; 750 मरीज बिना इलाज लौटे

पटना। पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) में जूनियर डॉक्टर के साथ मारपीट की घटना के विरोध में गुरुवार को जूनियर डॉक्टरों ने करीब ढाई घंटे तक कार्य बहिष्कार किया। सुबह करीब 9 बजे से 11:30 बजे तक चले इस कार्य बहिष्कार के कारण अस्पताल की इमरजेंसी, ओपीडी और ऑपरेशन थिएटर की सेवाएं प्रभावित रहीं। अस्पताल में इलाज कराने पहुंचे मरीजों और उनके परिजनों को इस दौरान काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।

कार्य बहिष्कार के दौरान निर्धारित 112 ऑपरेशनों में से 65 ऑपरेशन टालने पड़े, जबकि पंजीयन काउंटर बंद रहने के कारण करीब 750 मरीजों को बिना उपचार लौटना पड़ा। बाद में पंजीयन व्यवस्था शुरू होने के बाद कुछ मरीजों का इलाज किया गया। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, पूरे घटनाक्रम के दौरान कुल 1,325 मरीजों का उपचार किया गया।

जूनियर डॉक्टरों के कार्य बहिष्कार का सबसे अधिक असर इमरजेंसी, आईसीयू, शिशु रोग तथा स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में भर्ती मरीजों पर पड़ा। गंभीर मरीजों के उपचार में भी कुछ समय के लिए व्यवधान आया। स्थिति को देखते हुए वरिष्ठ चिकित्सकों को स्वयं दवाएं और इंजेक्शन लेकर मरीजों तक पहुंचना पड़ा।

जूनियर डॉक्टर से मारपीट के बाद शुरू हुआ विरोध

बताया जाता है कि बुधवार देर रात एक बुजुर्ग मरीज को अस्पताल में भर्ती कराने पहुंचे उनके स्वजनों और एक इंटर्न डॉक्टर के बीच विवाद हुआ। जूनियर डॉक्टरों का आरोप है कि इसी दौरान इंटर्न डॉक्टर के साथ मारपीट की गई।

घटना में डॉक्टर के सिर में गंभीर चोट आने की बात सामने आई है। साथी डॉक्टर के साथ हुई मारपीट से नाराज जूनियर डॉक्टरों ने विरोध जताते हुए काम बंद करने का फैसला लिया। गुरुवार सुबह बड़ी संख्या में जूनियर डॉक्टर कार्य से अलग हो गए।

डॉक्टरों का कहना था कि अस्पताल में चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। उनका आरोप था कि ड्यूटी के दौरान डॉक्टर के साथ मारपीट की घटना गंभीर विषय है और ऐसे मामलों में तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।

इमरजेंसी और ओपीडी सेवाएं प्रभावित

कार्य बहिष्कार का असर पीएमसीएच की महत्वपूर्ण चिकित्सा सेवाओं पर पड़ा। सुबह 9 बजे से 11:30 बजे तक इमरजेंसी, ओपीडी और ऑपरेशन थिएटर की व्यवस्था प्रभावित रही।

ओपीडी में मरीजों की संख्या पहले से ही अधिक रहती है। ऐसे में पंजीयन काउंटर बंद रहने के कारण बड़ी संख्या में मरीजों को परेशानी हुई। करीब 750 मरीजों को उस समय बिना उपचार लौटना पड़ा। बाद में पंजीयन प्रक्रिया शुरू होने पर कुछ मरीजों को अस्पताल में उपचार मिल सका।

अस्पताल में दूर-दराज के क्षेत्रों से भी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। कई मरीज सुबह-सुबह अस्पताल पहुंचकर पंजीयन कराते हैं और डॉक्टर से जांच कराने की प्रतीक्षा करते हैं। अचानक पंजीयन व्यवस्था प्रभावित होने से उन्हें लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा।

65 ऑपरेशन टालने पड़े

कार्य बहिष्कार के दौरान ऑपरेशन थिएटर की व्यवस्था भी प्रभावित हुई। निर्धारित 112 ऑपरेशनों में से 65 को टालना पड़ा। इससे उन मरीजों और उनके परिजनों को परेशानी हुई जिनका ऑपरेशन पहले से निर्धारित था।

अस्पताल में ऑपरेशन के लिए मरीजों को कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। जांच, डॉक्टर की सलाह और ऑपरेशन की तारीख तय होने के बाद मरीज अस्पताल पहुंचते हैं। ऐसे में ऑपरेशन टलने से मरीजों को दोबारा तारीख मिलने का इंतजार करना पड़ सकता है।

हालांकि, कार्य बहिष्कार समाप्त होने के बाद अस्पताल की सेवाओं को सामान्य करने का प्रयास किया गया।

गंभीर मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी

कार्य बहिष्कार के दौरान इमरजेंसी और आईसीयू में भर्ती मरीजों की स्थिति सबसे अधिक संवेदनशील रही। गंभीर मरीजों को लगातार चिकित्सकीय निगरानी और समय पर दवा की जरूरत होती है।

हार्ट अटैक सहित अन्य गंभीर मामलों में उपचार प्रभावित होने की स्थिति बनी। मरीजों की गंभीर स्थिति को देखते हुए सीनियर डॉक्टरों ने जिम्मेदारी संभाली। उन्हें खुद दवा और इंजेक्शन लेकर मरीजों तक जाना पड़ा।

अस्पताल प्रशासन के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण रही क्योंकि गंभीर मरीजों की चिकित्सा सेवाओं में किसी भी प्रकार की देरी जोखिम बढ़ा सकती है।

शिशु और स्त्री-प्रसूति विभाग भी प्रभावित

जूनियर डॉक्टरों के कार्य बहिष्कार का असर शिशु रोग तथा स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग पर भी पड़ा। इन विभागों में भर्ती मरीजों को नियमित उपचार और निगरानी की आवश्यकता होती है।

बच्चों और प्रसूता मरीजों के इलाज में समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में सेवाएं प्रभावित होने से मरीजों के परिजनों में चिंता बढ़ गई।

वरिष्ठ डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन ने उपलब्ध संसाधनों के आधार पर स्थिति को संभालने की कोशिश की।

अधीक्षक और पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक

जूनियर डॉक्टरों के कार्य बहिष्कार के बाद अस्पताल प्रशासन और पुलिस अधिकारियों ने डॉक्टरों के साथ बातचीत की। अधीक्षक डॉ. राजीव कुमार सिंह और पुलिस अधिकारियों के साथ करीब दो घंटे तक बैठक चली।

बैठक में डॉक्टरों ने मारपीट की घटना पर नाराजगी जताई और आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। डॉक्टरों ने अस्पताल में चिकित्सकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी मांग रखी।

प्रशासन और पुलिस अधिकारियों की ओर से मामले में कार्रवाई का आश्वासन दिया गया। इसके बाद स्थिति सामान्य करने की दिशा में बातचीत आगे बढ़ी।

एक आरोपित की गिरफ्तारी के बाद समाप्त हुआ विरोध

जूनियर डॉक्टरों को कार्रवाई का आश्वासन मिलने के बाद पुलिस ने मामले में कार्रवाई शुरू की। एक आरोपित की गिरफ्तारी की सूचना मिलने के बाद जूनियर डॉक्टरों ने अपना कार्य बहिष्कार समाप्त कर दिया।

कार्य बहिष्कार समाप्त होने के बाद अस्पताल की चिकित्सा सेवाओं को सामान्य करने का प्रयास किया गया। ओपीडी और पंजीयन व्यवस्था को फिर से संचालित किया गया तथा ऑपरेशन से जुड़ी सेवाओं को भी सामान्य स्थिति में लाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

चार अज्ञात लोगों पर प्राथमिकी

पीरबहोर थानाध्यक्ष के अनुसार, अस्पताल अधीक्षक के बयान पर मामले में चार अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस घटना की जांच कर रही है और आरोपितों की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है।

पुलिस के स्तर से घटना से जुड़े लोगों के बयान लिए जा सकते हैं। अस्पताल परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है, ताकि घटना की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

जूनियर डॉक्टर के साथ मारपीट की घटना ने पीएमसीएच जैसे बड़े अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। अस्पताल में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज और उनके परिजन पहुंचते हैं। भीड़ के कारण कई बार डॉक्टरों और मरीजों के परिजनों के बीच विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

चिकित्सकों का कहना है कि इलाज के दौरान किसी भी तरह की हिंसा स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को सुरक्षित वातावरण में काम करने का अवसर मिलना जरूरी है।

वहीं, मरीजों के परिजन भी चाहते हैं कि उन्हें समय पर और बेहतर चिकित्सा सुविधा मिले। इसलिए अस्पताल प्रशासन के सामने डॉक्टरों की सुरक्षा और मरीजों की सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी है।

मरीजों को हुई परेशानी

कार्य बहिष्कार के कारण अस्पताल पहुंचे मरीजों और उनके परिजनों को काफी परेशानी हुई। कई मरीजों को पंजीयन नहीं हो पाने के कारण वापस लौटना पड़ा। कुछ मरीजों ने बाद में पंजीयन शुरू होने का इंतजार किया।

दूर-दराज से आने वाले मरीजों के लिए ऐसी स्थिति अधिक कठिन हो जाती है क्योंकि उन्हें अस्पताल तक पहुंचने में समय और पैसा खर्च करना पड़ता है। ऑपरेशन टलने से भी मरीजों और उनके परिजनों को अतिरिक्त परेशानी का सामना करना पड़ा।

हालांकि, जूनियर डॉक्टरों का कहना था कि विरोध का उद्देश्य मरीजों को परेशान करना नहीं, बल्कि चिकित्सकों की सुरक्षा और घटना में कार्रवाई की मांग को प्रशासन तक पहुंचाना था।

भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने की जरूरत

पीएमसीएच की घटना के बाद अस्पताल प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना है। चिकित्सकों और मरीजों के बीच बेहतर संवाद, पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था और विवाद की स्थिति में तत्काल हस्तक्षेप से हिंसा की घटनाओं को रोका जा सकता है।

अस्पताल में सुरक्षा कर्मियों की प्रभावी तैनाती, प्रवेश व्यवस्था की निगरानी और संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ाने जैसे कदम उपयोगी हो सकते हैं। साथ ही मरीजों और उनके परिजनों को भी अस्पताल की व्यवस्था और चिकित्सकीय प्रक्रिया के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी है।

सेवाएं सामान्य करने पर जोर

जूनियर डॉक्टरों के कार्य बहिष्कार समाप्त होने के बाद अस्पताल प्रशासन ने चिकित्सा सेवाओं को सामान्य करने पर ध्यान दिया। जिन मरीजों का पंजीयन नहीं हो सका था, उन्हें आगे इलाज का अवसर देने की कोशिश की गई। टाले गए ऑपरेशनों को भी उपलब्ध संसाधनों और चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार पुनर्निर्धारित किया जा सकता है।

अस्पताल प्रशासन के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में किसी विरोध या विवाद की स्थिति में इमरजेंसी और गंभीर मरीजों की चिकित्सा सेवा बाधित न हो।

कुल मिलाकर, पीएमसीएच में जूनियर डॉक्टर के साथ मारपीट के विरोध में करीब ढाई घंटे चले कार्य बहिष्कार से अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था प्रभावित हुई। सुबह 9 बजे से 11:30 बजे तक चले विरोध के दौरान 112 निर्धारित ऑपरेशनों में से 65 टालने पड़े और पंजीयन काउंटर बंद रहने के कारण करीब 750 मरीजों को बिना उपचार लौटना पड़ा। हालांकि, कुल 1,325 मरीजों का उपचार किया गया। इमरजेंसी, आईसीयू, शिशु रोग और स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में भर्ती मरीजों को सबसे अधिक परेशानी हुई। गंभीर मरीजों के उपचार में व्यवधान को देखते हुए वरिष्ठ चिकित्सकों ने खुद मरीजों तक दवा और इंजेक्शन पहुंचाए। पुलिस और अस्पताल प्रशासन के साथ करीब दो घंटे चली बैठक में कार्रवाई का आश्वासन मिलने तथा एक आरोपित की गिरफ्तारी के बाद जूनियर डॉक्टरों ने विरोध समाप्त कर दिया। पीरबहोर थानाध्यक्ष के अनुसार, अधीक्षक के बयान पर चार अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। घटना ने एक बार फिर बड़े सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की सुरक्षा और मरीजों को निर्बाध चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने के बीच संतुलन की आवश्यकता को सामने ला दिया है।