पूर्णिया पूर्व प्रखंड में बिहुला-बिषहरी पूजा को लेकर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, नाग देवता को दूध-लावा अर्पित कर की सुख-समृद्धि की कामना
पूर्णिया। पूर्णिया पूर्व प्रखंड में तीन दिवसीय बिहुला-बिषहरी पूजा को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। पूजा को लेकर विभिन्न स्थानों पर धार्मिक माहौल बना हुआ है और बड़ी संख्या में लोग माता बिहुला-बिषहरी की पूजा-अर्चना करने पहुंच रहे हैं। श्रद्धालु परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और शांति की कामना के साथ माता की आराधना कर रहे हैं। पूजा के दौरान नाग देवता को दूध और लावा अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जा रही है।
बिहुला-बिषहरी पूजा क्षेत्र की लोक आस्था और परंपरा से गहराई से जुड़ा धार्मिक आयोजन माना जाता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में बड़ी संख्या में महिला और पुरुष श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। पूजा स्थलों पर सुबह से ही लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा करते हैं और माता से अपने परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
पूजा के दौरान स्थानीय स्तर पर धार्मिक गीत और भक्ति से जुड़े कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है। इससे पूरे इलाके में भक्तिमय वातावरण बना हुआ है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक लोग इस पारंपरिक पूजा में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं।
तीन दिनों तक चलता है धार्मिक आयोजन
बिहुला-बिषहरी पूजा तीन दिनों तक चलती है। इस दौरान पूजा स्थल पर विशेष तैयारी की जाती है। श्रद्धालुओं के लिए पूजा सामग्री की व्यवस्था की जाती है और लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार माता को प्रसाद चढ़ाते हैं।
पूजा में शामिल होने वाले श्रद्धालु परिवार के सदस्यों के साथ पूजा स्थल पर पहुंचते हैं। कई लोग अपनी पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। महिलाओं की भी इस आयोजन में विशेष भागीदारी देखने को मिलती है।
श्रद्धालुओं का मानना है कि माता बिहुला-बिषहरी की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। इसी आस्था के साथ लोग पूजा में शामिल होकर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।
नाग देवता को दूध और लावा चढ़ाने की परंपरा
बिहुला-बिषहरी पूजा के दौरान नाग देवता को दूध और लावा अर्पित करने की परंपरा विशेष रूप से देखने को मिलती है। श्रद्धालु पूजा सामग्री के साथ दूध और लावा लेकर पहुंचते हैं और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे नाग देवता को अर्पित करते हैं।
स्थानीय लोगों के लिए यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा भी है। परिवार के बुजुर्ग नई पीढ़ी को पूजा की परंपराओं और उससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में बताते हैं।
इस वजह से पूजा के दौरान बच्चों और युवाओं की भी भागीदारी देखने को मिलती है। नई पीढ़ी के लोग अपने परिवार के सदस्यों के साथ पूजा स्थल पर पहुंचकर परंपरा को समझने और उसे आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं।
परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना
बिहुला-बिषहरी पूजा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं की प्रमुख आस्था परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ी है। लोग माता के सामने परिवार के सदस्यों की खुशहाली, अच्छे स्वास्थ्य और शांति की कामना करते हैं।
कई श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के तहत हर साल पूजा में शामिल होते हैं। उनका कहना है कि यह आयोजन उन्हें अपनी लोक परंपरा और धार्मिक आस्था से जोड़ता है।
पूजा के दौरान श्रद्धालु माता के समक्ष दीप जलाते हैं, प्रसाद अर्पित करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। इसके बाद परिवार के सदस्यों के साथ प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
लोक आस्था का महत्वपूर्ण पर्व
बिहुला-बिषहरी पूजा को स्थानीय लोक आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण आयोजन माना जाता है। बिहार के कई क्षेत्रों में इस पूजा की अपनी अलग-अलग परंपराएं और मान्यताएं हैं। पूर्णिया क्षेत्र में भी लोग इसे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं।
ऐसे धार्मिक आयोजन स्थानीय समाज को एक-दूसरे के करीब लाने में भी भूमिका निभाते हैं। अलग-अलग परिवारों के लोग एक साथ पूजा में शामिल होते हैं। इससे सामाजिक मेलजोल बढ़ता है और सामुदायिक भावना मजबूत होती है।
पूजा के दौरान लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, प्रसाद का आदान-प्रदान करते हैं और धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। इस तरह यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जुड़ाव का माध्यम भी बनता है।
पूजा स्थलों पर बनी रहती है चहल-पहल
तीन दिवसीय आयोजन को लेकर पूजा स्थलों पर लगातार चहल-पहल बनी हुई है। सुबह से श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। दिन बढ़ने के साथ लोगों की संख्या में भी वृद्धि देखने को मिलती है।
पूजा स्थल पर पहुंचने वाले श्रद्धालु पहले पूजा की तैयारी करते हैं और फिर निर्धारित स्थान पर माता की आराधना करते हैं। परिवार के छोटे-बड़े सभी सदस्य इसमें शामिल होते हैं।
श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए स्थानीय स्तर पर व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत भी महसूस की जाती है। पूजा स्थलों पर आने वाले लोगों को सुविधा उपलब्ध कराने के लिए स्थानीय लोग भी सहयोग करते हैं।
महिलाओं की विशेष भागीदारी
बिहुला-बिषहरी पूजा में महिलाओं की विशेष भागीदारी देखने को मिलती है। बड़ी संख्या में महिलाएं परिवार के सदस्यों के साथ पूजा स्थल पर पहुंचती हैं और धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होती हैं।
महिलाएं पूजा सामग्री तैयार करने से लेकर प्रसाद की व्यवस्था और पूजा-अर्चना तक में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। कई परिवारों में पूजा की तैयारी पहले से शुरू कर दी जाती है।
महिलाओं के लिए यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ अपनी पारंपरिक संस्कृति से जुड़ने का अवसर भी है। वे परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हुए माता की पूजा करती हैं।
नई पीढ़ी तक पहुंच रही परंपरा
आधुनिक दौर में लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में बिहुला-बिषहरी पूजा जैसे आयोजन बच्चों और युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
परिवार के बुजुर्ग पूजा के दौरान बच्चों को धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के बारे में जानकारी देते हैं। बच्चे भी उत्सुकता के साथ पूजा में शामिल होते हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि जब परिवार की नई पीढ़ी ऐसे आयोजनों में भाग लेती है तो परंपराएं आगे भी जीवित रहती हैं। धार्मिक आयोजन के माध्यम से लोक संस्कृति और सामाजिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।
भक्ति और आस्था से सराबोर माहौल
पूजा के दौरान पूरे इलाके में भक्ति और आस्था का माहौल बना हुआ है। श्रद्धालु माता की आराधना करते हुए परिवार के लिए मंगलकामना कर रहे हैं। पूजा स्थलों पर धार्मिक गतिविधियों के कारण वातावरण भक्तिमय नजर आ रहा है।
लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा सामग्री अर्पित कर रहे हैं। नाग देवता को दूध और लावा चढ़ाने के बाद श्रद्धालु परिवार के लिए सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
कई श्रद्धालु इस आयोजन को अपनी पारिवारिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। उनके लिए हर वर्ष होने वाली पूजा अपनी आस्था को दोहराने और परिवार के साथ धार्मिक परंपरा निभाने का अवसर है।
सामाजिक एकता का भी संदेश
ऐसे आयोजनों का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक एकता भी है। पूजा में अलग-अलग परिवारों के लोग एक साथ शामिल होते हैं। इससे लोगों के बीच आपसी संपर्क और सहयोग की भावना मजबूत होती है।
धार्मिक आयोजन के दौरान स्थानीय लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं। पूजा स्थल की व्यवस्था से लेकर श्रद्धालुओं की सुविधा तक लोग सामूहिक रूप से सहयोग करते हैं।
बिहुला-बिषहरी पूजा इस तरह धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करती है। आयोजन में शामिल होने वाले लोग अपनी परंपरा के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए इसे आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं।
आस्था के साथ परंपरा को बचाने की कोशिश
पूर्णिया पूर्व प्रखंड में चल रहे तीन दिवसीय बिहुला-बिषहरी पूजा आयोजन ने एक बार फिर क्षेत्र की लोक आस्था और पारंपरिक संस्कृति की झलक प्रस्तुत की है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का पूजा स्थल पर पहुंचना बताता है कि आज भी लोग अपनी पुरानी धार्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़े हुए हैं।
माता बिहुला-बिषहरी की पूजा, नाग देवता को दूध और लावा अर्पित करने की परंपरा तथा परिवार की खुशहाली की कामना इस आयोजन के प्रमुख पहलुओं में शामिल हैं। तीन दिनों तक चलने वाला यह धार्मिक आयोजन लोगों को भक्ति, परंपरा और सामाजिक जुड़ाव से जोड़ रहा है।
पूर्णिया पूर्व प्रखंड में पूजा को लेकर श्रद्धालुओं का उत्साह बना हुआ है। लोग पूरे श्रद्धाभाव से माता की पूजा कर रहे हैं और अपने परिवार के लिए सुख, शांति और समृद्धि की कामना कर रहे हैं। साथ ही, नई पीढ़ी की भागीदारी यह उम्मीद जगाती है कि बिहुला-बिषहरी से जुड़ी लोक परंपराएं आने वाले वर्षों में भी इसी तरह श्रद्धा और उत्साह के साथ आगे बढ़ती रहेंगी।