शाहकुंड में मानसूनी बेरुखी से किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें; बारिश की भारी कमी से धान की रोपनी पिछड़ी, अब तक महज 47 प्रतिशत ही हो पाया काम, मायूस अन्नदाता कर रहे भगवान से आस
भागलपुर, विशेष संवाददाता: सिल्क सिटी भागलपुर के अंतर्गत आने वाले शाहकुंड प्रखंड क्षेत्र में इस वक्त कृषि व्यवस्था एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। खरीफ सीजन की सबसे मुख्य फसल यानी धान की खेती पर बादलों की बेरुखी और अपर्याप्त बारिश का साया मंडरा रहा है। स्थिति यह है कि शाहकुंड के किसान समय पर पर्याप्त वर्षा न होने के कारण खेती-किसानी में भारी समस्याओं और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। किसानों का दर्द साफ झलक रहा है कि यदि इस वर्ष मानसून समय पर मेहरबान रहता, तो अब तक धान की रोपनी का कार्य अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका होता, परंतु विडंबना यह है कि इस साल मौसम की बेरुखी के कारण अब तक केवल 47 प्रतिशत ही रोपनी का काम पूरा हो पा रहा है।
क्या है शाहकुंड में खेती की वर्तमान स्थिति?
पारंपरिक रूप से शाहकुंड क्षेत्र कृषि के लिहाज से उपजाऊ माना जाता है और यहां के किसानों की आजीविका पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है:
लक्ष्य से कोसों दूर रोपनी: कृषि विभाग के आंकड़ों और स्थानीय किसानों के बयानों के अनुसार, इस साल धान की खेती के लिए निर्धारित कुल लक्ष्य के मुकाबले बारिश की लुकाछिपी के कारण मात्र 47 प्रतिशत हिस्से में ही बिछड़ा (धान का बीज) रोपा जा सका है। शेष बंजर और सूखे पड़े खेत मानसूनी फुहारों का इंतजार कर रहे हैं।
सूख रहे हैं बिचड़े (Nurseries): किसानों ने बताया कि उन्होंने कर्ज लेकर और साहूकारों से पैसे उधार मांगकर धान के बिचड़े तैयार किए थे, लेकिन समय पर बारिश न होने और सिंचाई के अन्य साधन सुलभ न होने के कारण अब वे बिचड़े भी धूप की तपिश से पीले पड़कर सूखने लगे हैं। यदि अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो किसानों को दोबारा बीज डालकर नर्सरी तैयार करने की दोहरी मार झेलनी पड़ेगी।
सिंचाई के वैकल्पिक साधनों की लाचारी और महंगाई की मार
मानसून के धोखा देने के बाद किसानों के पास बोरवेल, पंपसेट या अन्य निजी सिंचाई माध्यमों का ही सहारा बचता है, लेकिन यह रास्ता भी कांटों भरा है:
डीजल और बिजली के बढ़ते दाम: निजी पंपसेट या बोरवेल से खेतों की सिंचाई करने के लिए किसानों को महंगे दामों पर डीजल खरीदना पड़ रहा है या फिर बिजली की अघोषित कटौती का सामना करना पड़ रहा है। एक बीघा खेत की सिंचाई में ही किसानों की जेब पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
छोटे और सीमांत किसानों की बेबसी: क्षेत्र के छोटे और सीमांत किसानों के पास महंगे पंपसेट या सिंचाई के निजी संसाधन खरीदने के पैसे नहीं हैं। वे पूरी तरह से आसमान की तरफ ताक रहे हैं कि कब इंद्रदेव प्रसन्न हों और उनके सूखे खेतों को जीवनदान मिले।
किसानों का दर्द: "वक्त पर पानी मिलता तो आज होती बंपर फसल"
क्षेत्र के वरिष्ठ और अनुभवी किसानों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि हर साल मानसून के वक्त वे ऐसी ही अनिश्चितताओं के बीच अपनी किस्मत आजमाते हैं:
बर्बादी के कगार पर परिवार: किसानों का कहना है कि धान की रोपाई का यह सुनहरा वक्त (सावन का महीना) हाथ से निकलता जा रहा है। अगर समय पर रोपनी नहीं हुई, तो धान के पौधे का विकास रुक जाएगा, जिससे आने वाले समय में फसल की पैदावार में भारी गिरावट दर्ज की जाएगी। इससे किसानों के सामने अपने परिवार का भरण-पोषण करने और बैंक का कर्ज चुकाने का संकट खड़ा हो गया है।
प्रशासनिक मदद की गुहार: शाहकुंड के अन्नदाताओं ने जिला प्रशासन और कृषि विभाग से मांग की है कि इस क्षेत्र को 'सूखाग्रस्त' घोषित करने की दिशा में विचार किया जाए या फिर किसानों को रियायती दरों पर डीजल अनुदान और सिंचाई के लिए निर्बाध बिजली उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे किसी तरह अपनी आधी-अधूरी खेती को बचा सकें।
शाहकुंड क्षेत्र में बारिश की कमी के कारण धान की रोपनी का मात्र 47 प्रतिशत तक ही सिमट जाना भागलपुर के कृषि जगत के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अन्नदाता जो देश का पेट भरता है, आज खुद पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रहा है। यदि आने वाले कुछ दिनों में प्रकृति ने अपनी कृपा नहीं बरसाई और प्रशासन ने आपातकालीन सहायता प्रदान नहीं की, तो शाहकुंड के किसानों की यह आर्थिक और मानसिक बदहाली एक बड़े सामाजिक संकट का रूप ले सकती है। समय आ गया है कि सरकार और संबंधित महकमा त्वरित कदम उठाते हुए किसानों को इस विकट परिस्थिति से बाहर निकाले।