पूर्णिया राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल: अल्ट्रासाउंड विशेषज्ञ की भारी कमी से जूझ रहा ओपीडी, रोजाना सिर्फ सौ मरीजों की हो पा रही जांच
पूर्णिया: बिहार के सीमांचल क्षेत्र के सबसे बड़े स्वास्थ्य केंद्र कहे जाने वाले पूर्णिया राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (GMC Purnia) में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और डॉक्टरों की कमी एक बार फिर गंभीर चर्चा का विषय बन गई है। अस्पताल के आउटडोर (OPD) और रेडियोलॉजी विभाग में अल्ट्रासाउंड जैसी बेहद जरूरी और बुनियादी जांच के लिए मरीजों को लंबी जद्दोजहद का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल में अल्ट्रासाउंड विशेषज्ञों की भारी कमी के कारण रोजाना केवल अधिकतम 100 मरीजों की ही जांच हो पा रही है, जबकि दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से पहुंचने वाले मरीजों की संख्या सैकड़ों में होती है।
अल्ट्रासाउंड कक्ष के बाहर लंबी कतारें और मरीजों का दर्द
पूर्णिया मेडिकल कॉलेज अस्पताल के ओपीडी परिसर में सुबह से ही मरीजों की भारी भीड़ जुट जाती है। इनमें गर्भवती महिलाओं से लेकर गंभीर बीमारियों से पीड़ित बुजुर्ग और युवा शामिल होते हैं। डॉक्टर द्वारा अल्ट्रासाउंड लिखे जाने के बाद मरीजों को घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के चलते कतार में खड़े आधे से ज्यादा मरीजों को बिना जांच कराए ही मायूस होकर वापस लौटना पड़ता है।
अस्पताल में रोजाना आने वाले मरीजों का कहना है कि सुबह सवेरे लाइन में लगने के बाद भी जब उनका नंबर नहीं आता, तो उन्हें या तो अगले दिन फिर से आने के लिए मजबूर होना पड़ता है या फिर अपनी जेब ढीली कर निजी डायग्नोस्टिक सेंटर्स (प्राइवेट अल्ट्रासाउंड सेंटर) का रुख करना पड़ता है। गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए बाहर महंगे दामों पर जांच कराना आर्थिक रूप से बेहद कष्टदायक साबित हो रहा है।
विशेषज्ञों की भारी कमी: मुख्य कारण
अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार, पूर्णिया मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों और विशेषकर रेडियोलॉजिस्ट (Radiologist) के स्वीकृत पदों के मुकाबले तैनाती बेहद कम है।
सीमित क्षमता: एक या दो उपलब्ध विशेषज्ञों के कंधों पर पूरे अस्पताल के ओपीडी, इनडोर (भर्ती मरीजों) और इमरजेंसी केस के अल्ट्रासाउंड का दबाव होता है।
दैनिक कोटा: अत्यधिक कार्यभार और तकनीकी सीमाओं के कारण अस्पताल में एक दिन में अधिकतम 100 मरीजों का ही अल्ट्रासाउंड करना संभव हो पा रहा है, जबकि ओपीडी में पर्ची कटाने वाले मरीजों की कुल संख्या हजारों में होती है।
मशीनों के होने के बावजूद लाभ नहीं: अस्पताल में आधुनिक जांच मशीनें और उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद कुशल मानव संसाधन (विशेषज्ञ डॉक्टरों) की कमी के कारण वे पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पा रही हैं।
गर्भवती महिलाओं और गंभीर रोगियों की बढ़ती मुश्किलें
इस समस्या का सबसे बुरा असर गर्भवती महिलाओं (Antenatal Care - ANC) पर पड़ रहा है। गर्भावस्था के दौरान समय पर अल्ट्रासाउंड कराना जच्चा और बच्चा दोनों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक होता है। लेकिन समय पर जांच न हो पाने के कारण कई बार जोखिम बढ़ जाता है। इसी प्रकार, पेट दर्द, लिवर, किडनी या अन्य अंदरूनी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीजों को भी सटीक रिपोर्ट के लिए हफ्तों इंतजार करना पड़ रहा है।
अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की प्रतिक्रिया
जब इस संबंध में अस्पताल के वरिष्ठ अधिकारियों से बात की गई, तो उन्होंने स्वीकार किया कि रेडियोलॉजिस्ट की कमी एक गंभीर समस्या है। अधिकारियों का कहना है कि इस समस्या से उच्चाधिकारियों और राज्य स्वास्थ्य विभाग को कई बार अवगत कराया गया है। विभाग से नए डॉक्टरों और विशेषकर रेडियोलॉजिस्ट की पदस्थापना की मांग लगातार की जा रही है।
प्रशासन का यह भी दावा है कि सीमित संसाधनों के बीच भी यह पूरी कोशिश की जा रही है कि अधिक से अधिक जरूरतमंद और आपातकालीन (Emergency) मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर जांच की सुविधा मुहैया कराई जाए।
पूर्णिया राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल जैसे बड़े संस्थान में यदि बुनियादी जांच सेवाएं इस तरह बाधित रहेंगी, तो आम जनता को सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा। स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मरीजों के परिजनों ने सरकार और स्वास्थ्य मंत्री से मांग की है कि जल्द से जल्द पूर्णिया मेडिकल कॉलेज में रिक्त पड़े विशेषज्ञ डॉक्टरों के पदों को भरा जाए, ताकि गरीब मरीजों को राहत मिल सके और उन्हें महंगे प्राइवेट सेंटरों के चंगुल से मुक्ति मिल सके।