टीएमबीयू में अतिथि शिक्षकों का फूटा गुस्सा; सेवा समाप्ति के खिलाफ 18 दिनों से लगातार धरना-प्रदर्शन जारी, कुलसचिव से मिलकर की समाधान की मांग

भागलपुर, वरीय संवाददाता: बिहार के प्रतिष्ठित तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) में प्रशासनिक फैसलों और नियुक्तियों को लेकर उपजा असंतोष थमने का नाम नहीं ले रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा पूर्व में नियुक्त किए गए करीब 70 अतिथि शिक्षकों की सेवाएं अचानक समाप्त किए जाने के बाद से शैक्षणिक गलियारों में भारी भूचाल आया हुआ है। इस एकतरफा प्रशासनिक फैसले और अपनी मांगों के समर्थन में आक्रोशित अतिथि शिक्षक पिछले 18 दिनों से लगातार विश्वविद्यालय परिसर में धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन के 18वें दिन इन शिक्षकों ने विश्वविद्यालय के कुलसचिव से मुलाकात कर अपनी समस्याओं के त्वरित समाधान की मांग की। शिक्षकों ने दोटूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनकी समस्याओं का समाधान और सेवा का नवीकरण नहीं किया गया, तो उनका यह आंदोलन और अधिक आक्रामक रूप ले लेगा।

क्या है पूरा मामला और क्यों की गई सेवा समाप्त?

प्राप्त विवरण के अनुसार, टीएमबीयू के विभिन्न विभागों में पिछले साल विधिवत प्रक्रिया के तहत लगभग 70 अतिथि शिक्षकों की बहाली की गई थी। इन शिक्षकों ने पूरी निष्ठा और academic standards के तहत महीनों तक अध्यापन कार्य किया। लेकिन अचानक विश्वविद्यालय प्रशासन ने आंतरिक आदेशों और प्रशासनिक बदलावों का हवाला देते हुए इन सभी अतिथि शिक्षकों की सेवाएं समाप्त करने का निर्णय ले लिया।

अचानक नौकरी से हटाए जाने के कारण इन शिक्षकों और उनके आश्रितों के समक्ष रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। शिक्षकों का आरोप है कि उन्होंने महीनों तक कक्षाओं में अपनी सेवाएं दीं, लेकिन इसके बदले न तो उन्हें समय पर मानदेय दिया गया और न ही सेवा विस्तार के संबंध में कोई न्यायसंगत नीति अपनाई गई। बिना किसी पूर्व सूचना के इस प्रकार सेवा समाप्त किया जाना पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और अन्यायपूर्ण है।

18 दिनों से धरना जारी, कुलपति कार्यालय पर मिला ताला

अपनी बहाली और पिछले महीनों के बकाया मानदेय भुगतान की मांग को लेकर अतिथि शिक्षक पिछले 18 दिनों से लगातार विश्वविद्यालय परिसर में खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठे हैं। इस लंबी अवधि के दौरान कई शिक्षक चिलचिलाती धूप, उमस और बारिश के कारण गंभीर रूप से बीमार भी पड़ चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके हौसले और संघर्ष की धार में कोई कमी नहीं आई है।

आंदोलन के दौरान जब शिक्षकों को यह सूचना मिली कि कुलपति प्रो. विमलेंदु शेखर झा कार्यालय में मौजूद हैं, तो वे अपनी पीड़ा लेकर सीधे उनके कक्ष के बाहर पहुंचे। परंतु आरोप है कि शिक्षकों के पहुंचते ही कुलपति कार्यालय के मुख्य दरवाजे पर अंदर से ताला जड़ दिया गया। प्रशासनिक स्तर पर इस तरह से मुंह फेरने और संवाद से बचने के रवैये ने शिक्षकों के गुस्से को और अधिक भड़का दिया है। मजबूरन शिक्षकों को बैरंग लौटकर अपने धरना स्थल पर ही वापस बैठना पड़ा।

कुलसचिव से मिले शिक्षक, रखी प्रमुख मांगें

परिस्थितियों के बीच शिष्टमंडल के रूप में पहुंचे अतिथि शिक्षकों ने विश्वविद्यालय के कुलसचिव से मुलाकात की और उन्हें अपनी समस्याओं से जुड़ा ज्ञापन सौंपा। शिक्षकों ने कुलसचिव के समक्ष मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगें रखीं:

सेवा समाप्ति का आदेश हो रद्द: शिक्षकों ने मांग की कि उनकी सेवा समाप्ति से संबंधित मनमाने और एकतरफा आदेश को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए तथा उन्हें उनके पूर्व पदों पर पुनः समायोजित किया जाए।

बकाया मानदेय का एकमुश्त भुगतान: अध्यापन कार्य करने के बावजूद पिछले कई महीनों से रोके गए मानदेय का बिना किसी विलंब के त्वरित भुगतान सुनिश्चित किया जाए।

पारदर्शी और न्यायसंगत नीति: विश्वविद्यालय प्रशासन पक्षपातपूर्ण रवैया छोड़े और तमाम प्रभावित शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सकारात्मक कदम उठाए।

आगे की रणनीति और आंदोलन की चेतावनी

शिक्षकों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनकी मांगों पर जल्द ही कोई ठोस और सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो वे चुप बैठने वाले नहीं हैं। वर्तमान में 18 दिनों से चल रहा यह धरना तब तक जारी रहेगा जब तक कि उनके नवीकरण और मानदेय भुगतान की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासनिक स्तर पर उनकी उपेक्षा का दौर यूं ही जारी रहा, तो वे आने वाले दिनों में आमरण अनशन और तीव्र जन-आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए बाध्य होंगे, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी टीएमबीयू प्रशासन की होगी।

भागलपुर के टीएमबीयू में अतिथि शिक्षकों की सेवा समाप्ति और उसके बाद उपजा यह 18 दिवसीय लंबा संघर्ष विश्वविद्यालय की प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाता है। उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन कार्य से जुड़े शिक्षकों को इस प्रकार सड़क पर धकेला जाना शैक्षणिक हित के प्रतिकूल है। यदि समय रहते विश्वविद्यालय प्रशासन ने संवाद स्थापित कर इस गतिरोध को नहीं सुलझाया, तो यह विवाद आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ सकता है, जिसका सीधा असर विश्वविद्यालय की साख और पठन-पाठन व्यवस्था पर पड़ेगा।