सीएचसी में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल; जेनरेटर नदारद, मरीजों को अंधेरे में 'डिजिटल एक्स-रे' का दंश

गोपालपुर (भागलपुर/नवगछिया): स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण के तमाम सरकारी दावों के बीच नवगछिया के गोपालपुर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) की हकीकत बेहद चौंकाने वाली है। पिछले कई महीनों से यह अस्पताल बिजली की आंख-मिचौनी और जनरेटर की अनुपलब्धता के कारण मरीजों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। अस्पताल की सबसे गंभीर समस्या यहां के 'डिजिटल एक्स-रे' विभाग से जुड़ी है। जेनरेटर की व्यवस्था न होने के कारण, बिजली कटते ही एक्स-रे मशीनें बंद हो जाती हैं और दर्जनों मरीजों को अपनी जांच के लिए प्राइवेट केंद्रों की ओर रुख करना पड़ता है।

मरीजों की मजबूरी: सरकारी अस्पताल में 'प्राइवेट' का सहारा

हाल ही में हुई एक घटना ने इस अव्यवस्था की पोल खोल दी है। गोपालपुर क्षेत्र की एक घायल महिला को गंभीर चोट के कारण परिजन आनन-फानन में सीएचसी लेकर पहुंचे। डॉक्टरों ने उसे तुरंत एक्स-रे करवाने की सलाह दी, ताकि हड्डी की स्थिति का पता चल सके। लेकिन, जब मरीज एक्स-रे रूम पहुंची, तो बिजली नदारद थी।

परिजनों ने अस्पताल कर्मियों से जनरेटर चालू करने का आग्रह किया, तो उन्हें जो जवाब मिला उसने अस्पताल प्रशासन की संवेदनहीनता को स्पष्ट कर दिया। कर्मियों ने बताया कि 'जेनरेटर पिछले कई महीनों से खराब पड़ा है' या 'उसमें तेल की व्यवस्था नहीं है'। अंततः, दर्द से कराहती उस घायल महिला को अस्पताल से बाहर निकलकर किसी महंगे निजी एक्स-रे सेंटर पर जाना पड़ा। यह महज एक इकलौता मामला नहीं है, बल्कि यहां आने वाले हर दूसरे-तीसरे मरीज की यही कहानी है।

डिजिटल मशीन पर 'अंधेरे' का पहरा

गोपालपुर सीएचसी में लगी डिजिटल एक्स-रे मशीन आधुनिक तकनीक का हिस्सा है, लेकिन इसे चलाने के लिए जिस बुनियादी ढांचे की जरूरत है, वह नदारद है।

बिजली संकट: ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण यहां बिजली की आपूर्ति अक्सर बाधित रहती है।

जेनरेटर की कमी: करोड़ों की मशीनें खरीदने वाले स्वास्थ्य विभाग ने पावर बैकअप (जेनरेटर) के प्रति उदासीनता बरती है, जिससे ये मशीनें शो-पीस बनकर रह गई हैं।

समय की बर्बादी: मरीज पहले डॉक्टर को दिखाने के लिए घंटों लाइन में लगते हैं, फिर एक्स-रे के लिए लंबी प्रतीक्षा करते हैं, और अंत में जब पता चलता है कि मशीन काम नहीं कर रही, तो उनका मानसिक और आर्थिक दोनों तरह से शोषण होता है।

आर्थिक बोझ: गरीब मरीजों पर दोहरी मार

सीएचसी में आने वाले अधिकांश मरीज गरीब और खेतिहर मजदूर होते हैं। सरकारी अस्पताल में इलाज का उद्देश्य ही यह होता है कि गरीब जनता को कम खर्च में स्वास्थ्य सुविधा मिले। लेकिन, जब उन्हें प्राइवेट सेंटर पर एक्स-रे के लिए भेजा जाता है, तो वहां उन्हें तीन से चार गुना अधिक पैसे चुकाने पड़ते हैं। यह उन परिवारों के लिए एक बड़ा आर्थिक बोझ है जो पहले से ही बीमारी के कारण तंगहाली से जूझ रहे हैं।

प्रशासनिक उदासीनता पर ग्रामीणों में आक्रोश

इस मामले को लेकर स्थानीय लोगों और बुद्धिजीवियों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी हर महीने निरीक्षण के नाम पर आते हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।

सवालिया निशान: एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के पास क्या इतनी क्षमता नहीं है कि वह एक जेनरेटर की व्यवस्था कर सके?

जवाबदेही का अभाव: बार-बार शिकायत करने के बावजूद स्थानीय अस्पताल प्रबंधन ने इस ओर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि फ्रैक्चर या गंभीर चोट की स्थिति में मरीज को इधर-उधर भटकने से उनकी चोट बिगड़ सकती है। ऐसे में अस्पताल परिसर के अंदर ही सारी सुविधाएं होना अनिवार्य है। डिजिटल एक्स-रे के लिए यदि मरीज को बाहर भेजा जा रहा है, तो यह स्पष्ट तौर पर स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता है।

भविष्य की राह: कब सुधरेगा सिस्टम?

नवगछिया के मुख्य चिकित्सा अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग के जिला स्तर के अधिकारियों को इस दिशा में तत्काल हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। केवल डिजिटल मशीनें लगवा देने से अस्पताल डिजिटल नहीं हो जाता, उसके लिए निरंतर बिजली और बैकअप की व्यवस्था सुनिश्चित करना अनिवार्य है।

क्षेत्र के निवासी अब मांग कर रहे हैं कि या तो अविलंब जेनरेटर की मरम्मत की जाए या वैकल्पिक पावर सोर्स (जैसे इनवर्टर या सोलर बैकअप) की व्यवस्था की जाए, ताकि मरीजों को दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें।

सीएचसी गोपालपुर की यह दुर्दशा स्वास्थ्य व्यवस्था के उन स्याह पहलुओं को दर्शाती है, जहां तकनीक तो है, लेकिन उसका लाभ उठाने वाली बुनियादी सुविधा नदारद है। यह देखना बाकी है कि क्या विभाग की नींद इस घटना के बाद खुलेगी या गरीब मरीज इसी तरह प्राइवेट सेंटरों के चक्कर काटते रहेंगे।