सहरसा: कागजों पर सिमटी हरियाली! जीविका के तहत लगाए गए लाखों पौधे देखरेख के अभाव में सूखे; प्रशासनिक दावों की खुली पोल

सहरसा (बिहार): बिहार के सहरसा जिले में पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण को हरा-भरा बनाने के लिए बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। जिले में कागजों पर तो भारी संख्या में पौधे लगाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर हरियाली की भारी कमी साफ दिखाई दे रही है। विशेषकर 'जीविका' (Jeevika) योजना के तहत विभिन्न क्षेत्रों में लाखों पौधे लगाए गए थे, लेकिन उचित देखभाल, पानी और सुरक्षा के अभाव में इनमें से अधिकांश पौधे या तो सूख चुके हैं या पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं।

प्राप्त विस्तृत विवरण के अनुसार, सरकारी योजनाओं के तहत पानी की तरह बहाया गया धन और प्रशासनिक उदासीनता पर्यावरण संरक्षण पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर रही है। आइए जानते हैं इस स्थिति के मुख्य बिंदुओं और जमीनी सच्चाई का एक विस्तृत विश्लेषण।

कागजी आंकड़े बनाम धरातल की हकीकत

प्रशासनिक स्तर पर पौधारोपण के आंकड़े भले ही बड़े-बड़े दिखाए जा रहे हों, लेकिन जमीन पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है।

लाखों पौधों की बर्बादी: जीविका और अन्य प्रशासनिक अभियानों के तहत जिले भर में लाखों की संख्या में पौधे रोपे गए थे, जिनका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संतुलन को बनाए रखना था।

देखभाल का घोर अभाव: रोपण के बाद पौधों की नियमित सिंचाई, निराई-गुड़ाई और सुरक्षा के लिए ट्री-गार्ड या अन्य इंतजाम नहीं किए गए, जिसके चलते तेज धूप और संरक्षण के बिना अधिकांश पौधे दम तोड़ चुके हैं।

 प्रशासनिक योजनाओं की लचर कार्यशैली

योजनाएं तो करोड़ों रुपये खर्च कर शुरू कर दी जाती हैं, लेकिन उनकी मॉनिटरिंग (निगरानी) न होने के कारण इनका अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाता।

फंड का दुरुपयोग: जानकारों का मानना है कि यदि पौधों की सही से देखरेख की जाती, तो आज सहरसा की तस्वीर कुछ और होती। सिर्फ पौधे लगा देने भर से जिम्मेदारी पूरी नहीं होती, बल्कि उनके बड़े होने तक उनकी सुरक्षा जरूरी है।

स्थानीय लोगों में निराशा: पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि सरकारी कागजों में तो हरियाली लहलहा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर सिर्फ सूखी लकड़ियां और गड्ढे ही नजर आ रहे हैं।

सहरसा जिले में पौधरोपण अभियान के नाम पर प्रशासनिक लापरवाही का यह हाल बेहद चिंताजनक है। सिर्फ योजनाएं बना देना और कागजों में आंकड़े दर्ज करना पर्यावरण को बचाने के लिए काफी नहीं है। यदि समय रहते प्रशासन ने मृतप्राय योजनाओं की सुध नहीं ली और जीवित बचे पौधों के संरक्षण के साथ नए पौधों की सही देखभाल सुनिश्चित नहीं की, तो पर्यावरण संतुलन सुधारने का यह सपना कागजों तक ही सिमटकर रह जाएगा।