नाबालिग से यौन अपराध में बाद का समझौता नहीं देगा आरोपी को राहत, POCSO अपराध समाज के विरुद्ध

पटना। नाबालिग से यौन अपराध के मामलों में पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि घटना के बाद पक्षकारों के बीच हुआ समझौता आरोपी के पक्ष में लागू वैधानिक अनुमान को खत्म नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) Act के तहत आने वाले अपराध को महज निजी विवाद नहीं माना जा सकता, क्योंकि ऐसे अपराध का असर व्यापक रूप से समाज पर पड़ता है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गैर-समझौतायोग्य अपराध को केवल आरोपी और पीड़ित पक्ष के बीच हुए समझौते के आधार पर हल्का नहीं किया जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ न्यायाधीश पूर्णेंदु सिंह ने अररिया महिला थाना कांड संख्या 47/2025 में आरोपित मो. सरताज आलम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

हाई कोर्ट का यह रुख बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की गंभीरता और POCSO कानून के उद्देश्य को रेखांकित करता है। अदालत के अनुसार, नाबालिग से संबंधित यौन अपराध को सामान्य निजी विवाद की श्रेणी में रखकर केवल समझौते के आधार पर कानूनी कार्रवाई को कमजोर नहीं किया जा सकता।

समझौता होने के बावजूद कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है

मामले की सुनवाई के दौरान पक्षकारों के बीच बाद में हुए समझौते का मुद्दा अदालत के सामने रखा गया। आरोपी की ओर से इस समझौते को राहत के लिए महत्वपूर्ण आधार के रूप में पेश किया गया।

हालांकि अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि POCSO के तहत दर्ज गंभीर आरोपों की प्रकृति ऐसी है, जिसमें बाद का निजी समझौता अपने आप आपराधिक कार्यवाही या कानून के प्रभाव को समाप्त नहीं कर सकता।

अदालत ने संकेत दिया कि किसी अपराध का कानूनी स्वरूप केवल इस आधार पर नहीं बदल जाता कि घटना के बाद दोनों पक्षों ने आपस में समझौता कर लिया है।

POCSO अपराध को निजी विवाद नहीं माना जा सकता

POCSO कानून विशेष रूप से बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया है। नाबालिगों की संवेदनशील स्थिति को ध्यान में रखते हुए कानून में कई विशेष प्रावधान किए गए हैं।

पटना हाई कोर्ट ने इसी संदर्भ में कहा कि POCSO के तहत अपराध को केवल आरोपी और पीड़ित के बीच का निजी विवाद नहीं माना जा सकता।

ऐसे अपराध बच्चों की सुरक्षा, उनके अधिकार और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़े होते हैं। इसलिए इनका प्रभाव केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं रहता।

गैर-समझौतायोग्य अपराध में निजी सहमति पर्याप्त नहीं

अदालत ने स्पष्ट किया कि गैर-समझौतायोग्य अपराधों में पक्षकारों के बीच हुआ समझौता अपने आप आपराधिक मामले को खत्म करने का आधार नहीं बन सकता।

ऐसे मामलों में अदालत को अपराध की प्रकृति, उपलब्ध सामग्री और लागू कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखना होता है।

यदि केवल समझौते के आधार पर गंभीर अपराधों में राहत मिलने लगे तो विशेष कानूनों के उद्देश्य और प्रभाव पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

अररिया महिला थाना कांड से जुड़ा मामला

यह मामला अररिया महिला थाना कांड संख्या 47/2025 से संबंधित है। मामले में आरोपित मो. सरताज आलम ने गिरफ्तारी से पहले जमानत यानी अग्रिम जमानत के लिए पटना हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

अग्रिम जमानत का उद्देश्य गिरफ्तारी की स्थिति में आरोपी को कुछ परिस्थितियों में न्यायिक संरक्षण उपलब्ध कराना होता है। लेकिन अदालत प्रत्येक मामले में आरोपों की प्रकृति और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेती है।

इस मामले में अदालत ने POCSO के तहत आरोपों की गंभीरता और समझौते के कानूनी प्रभाव को ध्यान में रखते हुए आरोपी को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।

न्यायाधीश पूर्णेंदु सिंह की टिप्पणी

मामले की सुनवाई न्यायाधीश पूर्णेंदु सिंह की अदालत में हुई। अदालत ने अपने रुख में स्पष्ट किया कि बाद में हुआ समझौता आरोपी के पक्ष में वैधानिक अनुमान को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता।

कोर्ट की टिप्पणी का महत्व इसलिए भी है क्योंकि POCSO कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ वैधानिक अनुमान का प्रावधान लागू हो सकता है।

ऐसी स्थिति में केवल निजी समझौते के आधार पर उस कानूनी प्रभाव को कमजोर नहीं किया जा सकता।

बच्चों की सुरक्षा कानून की प्राथमिकता

POCSO Act का मुख्य उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण और यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना है। यह कानून बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों को विशेष गंभीरता के साथ देखता है।

नाबालिगों को अक्सर सामाजिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में माना जाता है। ऐसे में कानून उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा देने का प्रयास करता है।

हाई कोर्ट की टिप्पणी इसी कानूनी सोच को मजबूत करती है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को सामान्य विवाद की तरह नहीं देखा जा सकता।

अपराध का असर पूरे समाज पर

अदालत ने POCSO अपराध को समाज के विरुद्ध अपराध बताते हुए इसके व्यापक प्रभाव की ओर ध्यान दिलाया।

बच्चों के खिलाफ यौन अपराध केवल एक व्यक्ति को प्रभावित नहीं करते, बल्कि समाज में बच्चों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था को लेकर विश्वास पर भी असर डालते हैं।

इसलिए ऐसे मामलों को केवल निजी सहमति या समझौते के आधार पर समाप्त करना उचित नहीं माना जा सकता।

समझौते की परिस्थितियों की भी जांच जरूरी

किसी मामले में पक्षकारों के बीच समझौता किन परिस्थितियों में हुआ, यह भी महत्वपूर्ण हो सकता है। विशेषकर नाबालिग से संबंधित मामलों में यह देखना आवश्यक हो सकता है कि पीड़ित या उसके परिवार पर किसी तरह का दबाव तो नहीं था।

हालांकि प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल समझौता होना POCSO के गंभीर आरोपों को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

न्यायिक प्रक्रिया में उपलब्ध साक्ष्य और कानून के प्रावधानों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।

अग्रिम जमानत याचिका खारिज

अदालत ने अंततः मो. सरताज आलम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। इसका अर्थ है कि इस स्तर पर अदालत ने आरोपी को गिरफ्तारी से पूर्व सुरक्षा देने से इनकार किया है।

हालांकि अग्रिम जमानत याचिका का खारिज होना मामले में आरोपी के दोषी होने की अंतिम घोषणा नहीं है। अपराध साबित करने के लिए जांच और न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की जांच की जाएगी।

अंतिम निर्णय सक्षम अदालत द्वारा मामले की पूरी न्यायिक प्रक्रिया के बाद लिया जाएगा।

जांच और मुकदमे की प्रक्रिया अलग

यह समझना महत्वपूर्ण है कि जमानत से जुड़ी कार्यवाही और मुख्य आपराधिक मुकदमे का अंतिम फैसला अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

अग्रिम जमानत पर अदालत मुख्य रूप से यह तय करती है कि संबंधित परिस्थितियों में आरोपी को गिरफ्तारी से पहले संरक्षण दिया जाना चाहिए या नहीं।

जबकि मुकदमे के दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आरोपों की सत्यता का परीक्षण किया जाता है।

इसलिए वर्तमान आदेश को मामले के अंतिम परिणाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

POCSO मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण

POCSO मामलों में अदालतों के सामने बच्चों की सुरक्षा और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित करने की दोहरी जिम्मेदारी होती है।

पीड़ित नाबालिग की पहचान और गरिमा की रक्षा, संवेदनशील तरीके से न्यायिक प्रक्रिया और कानून के विशेष प्रावधानों का पालन महत्वपूर्ण होता है।

पटना हाई कोर्ट की टिप्पणी यह दर्शाती है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को लेकर न्यायपालिका विशेष सतर्कता बरत रही है।

समाज और परिवार की भूमिका

अदालत के इस रुख से परिवार और समाज के लिए भी एक संदेश निकलता है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को सामान्य विवाद समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

ऐसे मामलों में कानून के तहत उचित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। किसी भी प्रकार के दबाव या निजी समझौते के बजाय बच्चे की सुरक्षा और अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करना केवल सरकार या अदालत की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार और समाज की भी साझा जिम्मेदारी है।

विशेष कानून की भावना बनाए रखना जरूरी

POCSO जैसे विशेष कानूनों का उद्देश्य सामान्य आपराधिक कानूनों से आगे बढ़कर बच्चों को अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा देना है।

यदि गंभीर अपराधों में केवल बाद में हुए समझौते को आधार बनाकर कानूनी कार्रवाई को कमजोर कर दिया जाए, तो इससे विशेष कानून की मूल भावना प्रभावित हो सकती है।

पटना हाई कोर्ट की टिप्पणी इसी बात पर जोर देती है कि कानून के तहत निर्धारित सुरक्षा और दायित्वों को निजी समझौते के कारण नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पटना हाई कोर्ट ने अररिया महिला थाना कांड संख्या 47/2025 से जुड़े मामले में स्पष्ट किया कि नाबालिग से यौन अपराध के बाद पक्षकारों के बीच हुआ समझौता आरोपी के पक्ष में लागू वैधानिक अनुमान को समाप्त नहीं कर सकता।

अदालत ने कहा कि POCSO के तहत अपराध केवल निजी विवाद नहीं है, बल्कि समाज के विरुद्ध अपराध की प्रकृति रखता है। ऐसे गैर-समझौतायोग्य अपराध को केवल पक्षकारों के बीच हुए समझौते के आधार पर हल्का नहीं किया जा सकता।

इसी टिप्पणी के साथ न्यायाधीश पूर्णेंदु सिंह ने आरोपित मो. सरताज आलम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

फैसला बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की गंभीरता को रेखांकित करता है और यह स्पष्ट संदेश देता है कि विशेष कानून के तहत दर्ज गंभीर मामलों में निजी समझौते को स्वतः कानूनी राहत का आधार नहीं माना जा सकता।

हालांकि, अग्रिम जमानत याचिका खारिज होना दोषसिद्धि नहीं है। मामले की आगे की जांच और सुनवाई में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के संबंध में अंतिम न्यायिक निर्णय लिया जाएगा।