TMBU प्रशासन ने बिहुला विषहरी पूजा को लेकर विश्वविद्यालय में विशेष पहल, अंग क्षेत्र की लोकपरंपरा को मिलेगा मंच
भागलपुर। अंग क्षेत्र की समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं से जुड़े प्रमुख लोक पर्व बिहुला विषहरी (मनसा) पूजा को लेकर तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) प्रशासन ने विशेष पहल की है। विश्वविद्यालय प्रशासन का उद्देश्य इस लोक पर्व से जुड़ी धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और विश्वविद्यालय परिसर में अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती देना है।
बिहुला विषहरी पूजा भागलपुर और आसपास के अंग क्षेत्र की विशिष्ट लोक परंपराओं में शामिल है। इस पर्व से जुड़ी मान्यताएं, लोककथाएं, गीत, पूजा पद्धति और सांस्कृतिक आयोजन पीढ़ियों से लोगों के जीवन का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस लोक पर्व को महत्व दिया जाना क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
टीएमबीयू प्रशासन के स्तर पर बिहुला विषहरी पूजा को लेकर विश्वविद्यालय के शिक्षकों, विद्यार्थियों और कर्मचारियों को स्थानीय लोक संस्कृति से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि अंग क्षेत्र की लोक परंपराओं के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को समझना भी है।
अंग क्षेत्र की पहचान से जुड़ा है बिहुला विषहरी पर्व
बिहुला विषहरी पूजा अंग क्षेत्र की लोक आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भागलपुर और आसपास के इलाकों में इस पर्व के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु विषहरी माता की पूजा करते हैं।
लोक मान्यता के अनुसार विषहरी माता को नागों और सर्पदंश से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। पूजा के दौरान श्रद्धालु परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और सुरक्षा की कामना करते हैं।
इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें धार्मिक आस्था के साथ लोककला और लोक संस्कृति भी जुड़ी हुई है। बिहुला-विषहरी की कथा, लोकगीत और पारंपरिक पूजा पद्धति अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती है।
विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थान में इस लोक पर्व को महत्व मिलने से विद्यार्थियों को अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझने का अवसर मिल सकता है।
विश्वविद्यालय में लोक संस्कृति को बढ़ावा देने की कोशिश
टीएमबीयू भागलपुर और अंग क्षेत्र की सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों से लंबे समय से जुड़ा प्रमुख शैक्षणिक संस्थान है। विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थी बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों से आते हैं।
बिहुला विषहरी पूजा जैसे स्थानीय लोक पर्व के माध्यम से विद्यार्थियों को क्षेत्र की संस्कृति और परंपराओं से परिचित कराया जा सकता है। विश्वविद्यालय प्रशासन की पहल इसी दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
लोक पर्वों के संरक्षण के लिए केवल धार्मिक आयोजन पर्याप्त नहीं होते। इनके इतिहास, लोककथाओं, गीतों, परंपराओं और सामाजिक प्रभाव पर भी चर्चा आवश्यक है। विश्वविद्यालय इस दिशा में शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
नई पीढ़ी को लोक परंपरा से जोड़ना जरूरी
आधुनिक समय में युवाओं की जीवनशैली तेजी से बदल रही है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के बीच कई पारंपरिक लोकगीत, लोककथाएं और रीति-रिवाज धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं।
ऐसे समय में शिक्षण संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि विद्यार्थियों को स्थानीय लोक संस्कृति के बारे में जानकारी दी जाए तो वे अपनी सांस्कृतिक विरासत को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
बिहुला विषहरी पूजा के माध्यम से विद्यार्थियों को अंग क्षेत्र के इतिहास, लोकविश्वास और सामाजिक संरचना को समझने का अवसर मिल सकता है।
पूजा के साथ जुड़ी है बिहुला की लोककथा
बिहुला विषहरी पूजा का संबंध प्रसिद्ध लोककथा बिहुला-लखिंदर से भी जोड़ा जाता है। अंग क्षेत्र में यह कथा लोकजीवन में विशेष महत्व रखती है।
लोककथा में बिहुला के संघर्ष, साहस और अपने पति लखिंदर के जीवन के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन मिलता है। इस कथा का संबंध मनसा या विषहरी पूजा की परंपरा से जोड़ा जाता है।
अंगिका लोक संस्कृति में बिहुला की कथा गीतों और लोक प्रस्तुतियों के माध्यम से लंबे समय से सुनाई और गाई जाती रही है।
यही वजह है कि बिहुला विषहरी पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अंग क्षेत्र की लोक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी है।
लोकगीत और पारंपरिक कला का महत्व
बिहुला विषहरी पर्व के दौरान लोकगीतों की विशेष भूमिका होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस अवसर पर पारंपरिक शैली में गीत गाए जाते हैं और बिहुला की कथा का वर्णन किया जाता है।
लोकगीतों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कथाएं और परंपराएं पहुंचती रही हैं। लेकिन आधुनिक दौर में इन लोककलाओं के सामने संरक्षण की चुनौती भी है।
टीएमबीयू जैसे विश्वविद्यालय यदि लोकगीत, लोककथा और पारंपरिक कला को शैक्षणिक गतिविधियों से जोड़ते हैं तो इनके संरक्षण को नई दिशा मिल सकती है।
विद्यार्थी लोक कलाकारों से बातचीत कर सकते हैं, लोकगीतों का दस्तावेजीकरण कर सकते हैं और बिहुला विषहरी पर शोध भी कर सकते हैं।
शोध के लिए भी महत्वपूर्ण विषय
बिहुला विषहरी पूजा इतिहास, समाजशास्त्र, लोक साहित्य, मानवशास्त्र और संस्कृति अध्ययन के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण शोध विषय हो सकता है।
इस पर्व से जुड़े लोकगीत, कथाएं, पूजा पद्धतियां और सामाजिक मान्यताएं अंग क्षेत्र के समाज को समझने में मदद करती हैं।
विश्वविद्यालय में इस विषय पर शोध को प्रोत्साहन मिलने से स्थानीय संस्कृति से संबंधित महत्वपूर्ण सामग्री को संरक्षित किया जा सकता है।
बुजुर्गों और लोक कलाकारों से मौखिक इतिहास एकत्र करना भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
भागलपुर की सांस्कृतिक पहचान
भागलपुर केवल ऐतिहासिक और शैक्षणिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसकी पहचान समृद्ध लोक संस्कृति से भी जुड़ी हुई है।
अंगिका भाषा, लोकगीत, लोककथाएं, धार्मिक परंपराएं और विभिन्न पर्व इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं।
बिहुला विषहरी पूजा इसी सांस्कृतिक विरासत का एक प्रमुख हिस्सा है। इसके आयोजन के दौरान भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों में विशेष धार्मिक वातावरण देखने को मिलता है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस पर्व को महत्व दिए जाने से भागलपुर की सांस्कृतिक पहचान को संस्थागत मंच मिल सकता है।
विद्यार्थियों की भागीदारी से बढ़ेगा प्रभाव
यदि बिहुला विषहरी पूजा से जुड़े कार्यक्रमों में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है, तो इसका प्रभाव और व्यापक हो सकता है।
विद्यार्थी पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने के अलावा लोक संस्कृति से जुड़े विषयों पर चर्चा, पोस्टर प्रदर्शनी, लोकगीत प्रस्तुति और शोध गतिविधियां भी कर सकते हैं।
इससे छात्रों में स्थानीय इतिहास और संस्कृति के प्रति रुचि पैदा होगी।
इसके साथ ही स्थानीय कलाकारों और लोक परंपरा से जुड़े लोगों को विश्वविद्यालय के मंच पर बुलाकर उनके अनुभव साझा कराए जा सकते हैं।
सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की जरूरत
लोक संस्कृति को संरक्षित करने के लिए उसका दस्तावेजीकरण जरूरी है। बिहुला विषहरी पूजा से जुड़े लोकगीत, कथाएं, चित्र, पूजा पद्धति और मौखिक परंपराएं आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित की जानी चाहिए।
आज भी कई लोक परंपराएं लोगों की स्मृति और मौखिक परंपरा के सहारे जीवित हैं। यदि इन्हें लिखित, ऑडियो और वीडियो रूप में संरक्षित किया जाए तो भविष्य में शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हो सकती है।
टीएमबीयू इस दिशा में स्थानीय समुदाय, लोक कलाकारों और शोधकर्ताओं को जोड़कर एक प्रभावी मॉडल तैयार कर सकता है।
धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जुड़ाव
बिहुला विषहरी पूजा का महत्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक जुड़ाव में भी है। पूजा के अवसर पर विभिन्न समुदायों और परिवारों के लोग एक साथ आते हैं।
मेले और धार्मिक आयोजनों से स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ती हैं। पूजा सामग्री, प्रसाद और अन्य वस्तुओं की बिक्री से छोटे दुकानदारों और स्थानीय कारोबारियों को फायदा मिलता है।
इस प्रकार लोक पर्व स्थानीय समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था तीनों से जुड़ा हुआ है।
युवाओं के लिए सीखने का अवसर
विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए बिहुला विषहरी पूजा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र की पहचान को समझने का अवसर भी हो सकता है।
विद्यार्थी यह जान सकते हैं कि किसी लोक परंपरा का निर्माण कैसे हुआ, वह समाज में किस तरह विकसित हुई और समय के साथ उसमें क्या बदलाव आए।
ऐसे अध्ययन से छात्रों में शोध की क्षमता और स्थानीय इतिहास के प्रति समझ विकसित हो सकती है।
अंगिका संस्कृति को मिलेगा प्रोत्साहन
बिहुला विषहरी पूजा अंगिका सांस्कृतिक परंपरा से गहराई से जुड़ी है। इसके माध्यम से अंगिका लोकगीत और कथा परंपरा को भी बढ़ावा मिलता है।
विश्वविद्यालय स्तर पर अंगिका भाषा और साहित्य से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाने से क्षेत्रीय भाषा और लोक साहित्य को संरक्षण मिल सकता है।
बिहुला की कथा पर आधारित लोकगीतों और साहित्यिक रचनाओं का अध्ययन अंगिका संस्कृति को समझने में उपयोगी हो सकता है।
भागलपुर के टीएमबीयू प्रशासन की ओर से अंग क्षेत्र के लोक पर्व बिहुला विषहरी (मनसा) पूजा को महत्व देना स्थानीय लोक संस्कृति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा सकता है।
बिहुला विषहरी पूजा अंग क्षेत्र की धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोककथा, लोकगीत, भाषा और सामाजिक परंपराओं से जुड़ी हुई है। बिहुला-लखिंदर की कथा इस पर्व को विशेष सांस्कृतिक पहचान देती है।
विश्वविद्यालय में इस लोक पर्व को लेकर जागरूकता और शैक्षणिक गतिविधियां बढ़ने से विद्यार्थियों को अपनी क्षेत्रीय विरासत को समझने का अवसर मिलेगा। साथ ही लोक कलाकारों, शोधकर्ताओं और स्थानीय समुदाय के सहयोग से इस परंपरा का दस्तावेजीकरण भी किया जा सकता है।
आज जब तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में कई पारंपरिक लोककलाओं के सामने संरक्षण की चुनौती है, ऐसे में विश्वविद्यालयों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। बिहुला विषहरी पूजा को शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़कर अंग क्षेत्र की लोक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है।
इस पहल से न केवल स्थानीय संस्कृति को पहचान मिलेगी, बल्कि भागलपुर और पूरे अंग क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को व्यापक स्तर पर समझने और संरक्षित करने का रास्ता भी मजबूत होगा।