उच्च शिक्षा जगत में हलचल नवस्थापित डिग्री कॉलेजों में प्राचार्य तैनाती के मामलों पर फंसा पेंच, कई प्राचार्यों ने बीमारी व व्यक्तिगत समस्याओं का हवाला देकर पदस्थापन रोकने की लगाई गुहार
भागलपुर: भागलपुर के तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) समेत राज्यभर के नवस्थापित प्रखंड स्तरीय डिग्री कॉलेजों में प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था को पटरी पर लाने की कवायद के बीच एक नया पेंच फंस गया है। हाल ही में राज्य के विभिन्न नए डिग्री कॉलेजों में जिन प्राचार्यों की तैनाती की गई थी, उनमें से कई प्राचार्यों ने अपनी व्यक्तिगत समस्याओं, गंभीर बीमारियों और सेवाकाल की अंतिम अवधि का हवाला देते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को आवेदन सौंपकर वहां योगदान देने में असमर्थता जताई है। इन आवेदन पत्रों में प्राचार्यों ने अपनी शारीरिक और पारिवारिक कठिनाइयों को खुलकर सामने रखा है, जिसके बाद विश्वविद्यालय स्तर पर इन मामलों को लेकर मंथन का दौर तेज हो गया है।
क्या है पूरा मामला और क्यों किया गया विरोध?
राज्य सरकार और विश्वविद्यालयों द्वारा उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए लगातार नए प्रखंड स्तरीय डिग्री कॉलेज खोले जा रहे हैं:
तैनाती के आदेश पर आपत्ति: जब हाल ही में टीएमबीयू और अन्य विश्वविद्यालयों के अधीन आने वाले नवस्थापित डिग्री कॉलेजों में प्राचार्यों की नई पदस्थापना सूची जारी की गई थी, तो कई वरिष्ठ शिक्षकों और प्राचार्यों ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी।
बीमारी और सेवानिवृत्ति की नजदीकियां: कई प्राचार्यों ने अपने लिखित आवेदनों में स्पष्ट किया है कि वे गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं या फिर उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि बेहद नजदीक है, ऐसी स्थिति में दूर-दराज के नए ग्रामीण इलाकों में जाकर कॉलेज संभालना उनके स्वास्थ्य के लिहाज से अनुकूल नहीं है।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव: चर्चा यह भी है कि कई नए कॉलेजों में बुनियादी भवनों, प्रयोगशालाओं और लाइब्रेरी जैसी व्यवस्थाओं का सुचारू रूप से न होना भी प्राचार्यों की इस हिचकिचाहट का एक बड़ा कारण रहा है।
विकल्प के तौर पर 'प्राचार्य-इन-चार्ज' की व्यवस्था पर विचार
प्राचार्यों द्वारा लगातार मिल रहे इन आवेदनों और पदस्थापन पर असमर्थता जताए जाने के बाद अब विश्वविद्यालयों और उच्च स्तर पर नए विकल्पों पर विचार किया जा रहा है:
लोकभवन की बैठक और निर्देश: उच्च स्तर पर हुई बैठकों में यह बात सामने आई है कि जिन कॉलेजों में अब तक प्राचार्यों ने अपने पदों पर योगदान नहीं दिया है या वैध कारणों से पुनर्विचार का अनुरोध किया है, वहां वैकल्पिक व्यवस्था लागू की जा सकती है.
प्रभारी व्यवस्था की तैयारी: इसके तहत यह निर्णय लिया गया है कि ऐसे नवस्थापित कॉलेजों में अंगीभूत (कॉन्सिलिएटेड) कॉलेजों के वरिष्ठ प्राचार्यों या एसोसिएट प्रोफेसरों को 'प्राचार्य-इन-चार्ज' (प्रभारी प्राचार्य) के रूप में जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है, ताकि पठन-पाठन का कार्य बाधित न हो।
शैक्षणिक सत्र और छात्रों के भविष्य पर असर
प्राचार्यों की तैनाती के पेंच में फंसने से नवस्थापित कॉलेजों के छात्रों की चिंताएं बढ़ गई हैं:
प्रशासनिक शून्यता: नियमित प्राचार्य के योगदान न देने से कॉलेजों में प्रशासनिक फैसले, छात्रवृत्ति के कार्य, नामांकन और परीक्षा से जुड़े जरूरी कागजात समय पर सत्यापित नहीं हो पा रहे हैं।
विकास कार्यों पर ब्रेक: फंड का सही इस्तेमाल और कॉलेजों के भौतिक विकास की रफ्तार भी इस असमंजस की स्थिति के कारण धीमी पड़ गई है।
नवस्थापित डिग्री कॉलेजों में प्राचार्यों की तैनाती को लेकर खड़े हुए इस गतिरोध ने एक बार फिर उच्च शिक्षा के प्रबंधकीय तंत्र के सामने चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। जहां एक ओर कई प्राचार्यों ने बीमारी और पारिवारिक समस्याओं का हवाला देकर तैनाती रोकने का अनुरोध किया है, वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन अब 'प्रभारी प्राचार्य' जैसी वैकल्पिक व्यवस्था के जरिए इस संकट से निपटने की फिराक में है. आने वाले दिनों में विवि द्वारा इन आवेदनों पर लिए जाने वाले फैसले से ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि इन नए कॉलेजों का संचालन किस दिशा में आगे बढ़ता है।